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Remembering Dr Ambedkar: बाबा साहब अम्बेडकर के बारे में कुछ रोचक बातें, जो कम लोग जानते हैं

1955 में बीबीसी को इंटरव्यू देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि गांधी रूढ़िवादी हिन्दू थे। मुझे इस बात पर काफी हैरानी होती है कि पश्चिमी देश गांधी में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं?

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Remembering Dr Ambedkar: भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। मध्य प्रदेश सरकार ने 2003 में महू का नाम बदलकर डॉ. अम्बेडकर नगर रख दिया। भीमराव अम्बेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान डॉ. अम्बेडकर जन्म से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।

कहा जाता है कि भीमराव को उनके पिता ने स्कूल में उनका उपनाम 'सकपाल' की बजाय 'आंबडवेकर' लिखवाया। वे कोंकण के आंबडवे गांव के मूल निवासी थे और उस क्षेत्र में अपना उपनाम गांव के नाम पर रखने का प्रचलन था। एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्ण महादेव अम्बेडकर को बाबा साहब से विशेष लगाव था। इस स्नेह के चलते ही उन्होंने उनके नाम से 'आंबडवेकर' हटाकर अपना उपनाम 'अम्बेडकर' जोड़ दिया। अम्बेडकर के पिता ब्रिटिश भारत की सेना की मऊ छावनी में सेवारत थे और यहां काम करते हुए उन्होंने सूबेदार का पद भी संभाला।

अम्बेडकर की शिक्षा-दीक्षा

बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 1907 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और अगले वर्ष उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया। इस स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने समुदाय के वे पहले व्यक्ति थे।

1912 तक उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में कला स्नातक (बी.ए.) प्राप्त की और बड़ौदा राज्य सरकार के साथ काम करने लगे। बडौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ की फेलोशिप लेकर अम्बेडकर ने 1912 में मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की।

अम्बेडकर की रुचि संस्कृत पढ़ने में थी, लेकिन संस्कृत पढ़ने पर मनाही होने के कारण वे फारसी से पास हुए। बीए के बाद एमए की पढ़ाई के लिए बड़ौदा नरेश से दोबारा फेलोशिप लेकर उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में अपना नामांकन कराया। 1915 में उन्होंने स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की।

इसके बाद कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से 'डॉक्टर ऑफ साइंस' डिग्री प्राप्त की।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. बी.आर. अम्बेडकर 64 विषयों के जानकार थे। उन्हें 9 भाषाओं का ज्ञान था। साथ ही उनके पास 32 डिग्रियां भी थीं।

अखबार एवं पत्रिकाओं का संपादन

अम्बेडकर ने कमजोर, अशिक्षित और गरीब लोगों को जागरूक बनाने के लिए 'मूकनायक' और 'बहिष्कृत भारत' जैसी साप्ताहिक पत्रिकाओं का भी संपादन किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'समता', 'जनता' और 'प्रबुद्ध भारत' का संपादन, लेखन और सलाहकार के तौर पर काम करने के साथ इन प्रकाशनों का मार्गदर्शन भी किया।

अम्बेडकर द्वारा लिखित महत्वपूर्ण पुस्तकें

बाबा साहब अम्बेडकर की प्रमुख रचनाओं में 'एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट्स', 'फेडरेशन वर्सेस फ्रीडम', 'पाकिस्तान ओर द पार्टिशन ऑफ़ इंडिया', 'रानाडे, गांधी एंड जिन्ना', 'हू वर द शूद्राज', 'द बुद्धा एंड कार्ल मार्क्स', 'द बु़द्धा एंड हिज धम्मा', 'रिडल्स इन हिन्दुइज्म' शामिल हैं।

महात्मा गांधी से असहमति

डॉ. भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गांधी की आपस में कभी नहीं बनी। हालांकि, दोनों की आपस में कई मुलाकातें हुई, लेकिन वे अपने मतभेदों को कभी नहीं पाट पाए। स्वतंत्रता से दो दशक पहले अम्बेडकर ने अपने आप को स्वतंत्रता के आंदोलन से अलग-थलग कर लिया था। अछूतों के प्रति गांधी के अनुराग और उनकी तरफ से उनके बोलने के दावे को अंबेडकर एक जोड़तोड़ की रणनीति मानते थे।

जब 14 अगस्त 1931 को गांधी से अम्बेडकर की मुलाकात हुई तो गांधी ने उनसे कहा कि मैं अछूतों की समस्याओं के बारे में तब से सोच रहा हूं, जब आप पैदा भी नहीं हुए थे। मुझे आश्चर्य है कि इसके बावजूद भी आप मुझे उनका हितैषी नहीं मानते।

इसके जवाब में अम्बेडकर ने गांधी से कहा कि अगर आप अछूतों के हितैषी होते तो आपने कांग्रेस के सदस्य होने के लिए खादी पहनने की शर्त के बजाय अस्पृश्यता निवारण को पहली शर्त बनाया होता। आपने कभी भी किसी जिला कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को पार्टी से निष्कासित नहीं किया, जिन्हें मंदिरों में अछूतों के प्रवेश का विरोध करते देखा गया है।

1955 में बीबीसी को इंटरव्यू देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि गांधी रूढ़िवादी हिन्दू थे। उन्होंने कहा कि गांधी कभी एक सुधारक नहीं थे। उनकी ऐसी कोई सोच नहीं थी। वे अस्पृश्यता के बारे में सिर्फ इसलिए बात करते थे कि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें। दूसरी बात, वे चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें। डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि गांधी कभी महात्मा नहीं थे। मैं उन्हें महात्मा कहने से इंकार करता हूं। मैंने अपनी जिंदगी में उन्हें कभी महात्मा नहीं कहा। वे इस पद के योग्य कभी नहीं थे।

उन्होंने कहा कि मुझे इस बात पर काफी हैरानी होती है कि पश्चिमी देश गांधी में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं? जहां तक भारत की बात है, वे देश के इतिहास का एक हिस्सा भर हैं। कोई युग निर्माण करने वाले नहीं। गांधी की यादें इस देश के जेहन से जा चुकी हैं।

संविधान निर्माता की भूमिका

संविधान निर्माता की भूमिका से पूर्व डॉ. अम्बेडकर देश के श्रम मंत्री रह चुके थे। वे 1942 से 46 तक वायसराय के काउंसिल में श्रम मंत्री थे। अम्बेडकर संविधान सभा के उन कुछ सदस्यों में से एक थे, जो एक से अधिक कमेटियों के सदस्य थे।

9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का कार्य प्रारम्भ हुआ। बाबा साहब कांग्रेस के विरोध के कारण मुंबई से हार गए थे। परन्तु बंगाल से चुन लिए गए और संविधान सभा के सदस्य बने। उन्होंने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा, "श्रीमान, इस महान देश की भावी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक संरचना के विकास और उसकी परम उन्नति को लेकर मेरे मन में जरा भी संदेह नहीं है। मुझे पता है कि आज हम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से विभाजित हैं। हम झगड़ालुओं के शिविरों का एक झुंड हैं और मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं शायद ऐसे एक शिविर के नेताओं में से हूं। लेकिन इस सब के बावजूद, मैं पूर्ण आश्वस्त हूं कि समय और परिस्थिति मिलने के बाद, दुनिया की कोई ताकत देश को एक बनने से नहीं रोक सकेगी। हमारी सभी जातियों और आस्थाओं के बावजूद, मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि हम किसी न किसी रूप में एकजुट लोगों की तरह होंगे।"

समान नागरिक संहिता के पक्षधर

23 नवंबर 1948 को देश के लिए समान नागरिक संहिता का जोरदार समर्थन करते हुए अम्बेडकर ने कहा, "मुझे लगता है कि मेरे अधिकांश मित्र, जिन्होंने इस संशोधन पर बात की है, वे यह भूल गए हैं कि 1935 तक उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत शरीयत कानून के अधीन नहीं था। इसने उत्तराधिकार के मामले में और अन्य मामलों में हिंदू कानून का पालन किया। यह पालन इतना व्यापक और मजबूत था कि अंततः 1939 में केंद्रीय विधानमंडल को मैदान में आना पड़ा और उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के मुसलमानों के लिए हिंदू कानून को निरस्त कर उन पर शरीयत कानून लागू किया गया।"

उन्होंने आगे कहा, "मुझे इस मामले में उनकी भावनाओं का एहसास है, लेकिन मुझे लगता है कि वे अनुच्छेद 35 को लेकर कुछ ज्यादा ही आशंकित हो रहे हैं। यह अनुच्छेद केवल यही प्रस्तावित करता है कि राज्य और देश के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।"

अम्बेडकर की रुचि

अम्बेडकर की रुचि कुत्ते पालने, बागवानी करने और पढ़ने में विशेष तौर पर थी। उस जमाने में उनके पास किताबों का सबसे बेहतरीन संग्रह था। रात में अम्बेडकर अपनी पढ़ाई में इतने खो जाते थे कि उन्हें बाहरी दुनिया का कोई ध्यान नहीं रहता था। अम्बेडकर पूरी रात पढ़ने के बाद सुबह में सोने जाते थे। सिर्फ दो घंटे सोने के बाद थोड़ी कसरत करते थे। उसके बाद वे नहाते और फिर नाश्ता किया करते थे।

अंबेडकर खाना बनाने के भी शौकीन थे। बाबा साहब को मूली और सरसों का साग पकाने का बहुत शौक था। अम्बेडकर ने नशा और धूम्रपान से अपने-आप को हमेशा दूर ही रखा। वे बहुत साधारण खाना खाते थे। वे बाजरे की रोटी, चावल, दही और मछली खाना पसंद करते थे।

6 दिसंबर 1956 को बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की दिल्ली में मृत्यु हो गई। 1990 में डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

यह भी पढ़ें: Dr BR Ambedkar Death Anniversary: आखिर क्यों अंग्रेजों के भारत छोड़ने से डरे हुए थे अंबेडकर?

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