Dirty Politics: अंबेडकर से प्रेम लेकिन दलितों से नहीं..
बैंगलुरू। आज देश में डॉ. भीमराव अंबेडकर को लेकर गजब की राजनीति हो रही है। बसपा की मायावती बाबा साहेब पर अपना अधिकार समझती हैं तो कांग्रेस, सपा और भाजपा भी आज कल डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
जानिए भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव अंबेडकर के बारे में खास बातें
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अक्सर दलित के घर की रोटी खाकर अपना दलित प्रेम दिखाते रहते हैं तो वहीं सपा और भाजपा भी दलितों के लिए अपने कर्तव्यों का ढिढोरा पिटने में पीछे नहीं हैं। हर किसी को दलितों के अंदर एक भारी वोट बैंक दिखता है लेकिन किसी को उनका दर्द नजर नहीं आता है।
आईये डालते हैं एक नजर भारत में दलितों पर हो रही राजनीति पर..नीचे की स्लाइडों के जरिये...

बीजेपी का दलित प्रेम
हाल ही में दलितों के आरक्षण पर पीएम मोदी ने बड़ा बयान दिया कि दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को दिए जा रहे आरक्षण की नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। जिसे राजनीति को समझने वाले दिग्गजों ने कहा कि ये बीजेपी की सोची-समझी चाल है ताकि वो दलित समुदाय को अपनी और आकृष्ट कर सके क्योंकि बीजेपी इस समय देश में कट्टर हिंदू वादी और अग्रणों की पार्टी के नाम से विख्यात हो गई है।

दलितों पर डर्टी पॉलिटिक्स
दिसंबर में हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला के जातिगत भेदभाव का आरोप लगाकर आत्महत्या करने के बाद, विपक्षी नेता एनडीए सरकार पर दलित समुदाय के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाते रहे हैं। कांग्रेस, बसपा हर किसी ने इस मुद्दे को भूनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। नेताओं के आरोपों को सुनकर ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी को रोहित वेमूला से नहीं बल्कि उसके दलित होने से ही मतलब है।

अंबेडकर केवल दलितों के ही नहीं बल्कि पिछड़ों के भी नेता
बीआर आंबेडकर मेमोरियल लेक्चर देने वाले पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अंबेडकर केवल दलितों के ही नहीं बल्कि पिछड़ों के भी नेता है इस कारण उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर को मार्टिन लूथर किंग के समान बताते हुए 'विश्व मानव' का दर्जा दिए जाने की बात कही थी।

कांग्रेस को जागा दलित प्रेम
राहुल गांधी ने हमेशा दलितों के घर पहुंचकर और रोटी खाकर ये जताने की कोशिश की वो और उनकी पार्टी के लिए जांत-पांत मायने नहीं रखता है, हालांकि उनके नाटकीय प्रेम का अभी तक कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिला है।

मांझी-नीतीश और लालू
बिहार की राजनीति तो मुख्य रूप से जात-पांत पर ही आधारित है लेकिन नीतीश कुमार, लालू यादव और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं ने आज तक ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे देश में दलितों की हालत में सुधार हो। देश के दलित अपने दम पर ही जीते हैं और मर रहे हैं।

दलितों की स्थिति आज भी बद से बदतर
हाल के आंकड़े बताते हैं कि दलितों की स्थिति आज भी बद से बदतर हैं, उन्हें पर्याप्त शिक्षा और स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल रहा है, हालांकि छूआ-छूत के अपभ्रंश से वो दूर हो चुके हैं लेकिन आज भी वो निम्नकोटी का जीवन जीने पर मजबूर हैं। राजनेताओं ने अंबेडकर को अपना बताकर रोटियां तो बहुत सेकी हैं लेकिन किसी दलित के घर में दो जून की रोटी कैसे बनती है इस बात का हिसाब शायद किसी के पास नहीं होगा।












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