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MCD Mayor Election: एमसीडी मेयर चुनाव में क्यों फंसा पेंच, कैसे चुने जाते हैं मेयर

एमसीडी चुनाव के नतीजे आने के दो महीनों बाद भी दिल्ली में मेयर नहीं चुना जा सका है। दिल्ली नगर निगम के मेयर के चुनाव में एक पेंच फंसी हुई है, जिसको लेकर आम आदमी पार्टी और बीजेपी आमने-सामने हैं।

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MCD Mayor Election: दिल्ली एमसीडी के नतीजे आने के दो महीनों के बाद भी मेयर का चुनाव नहीं किया जा सकता। पिछले तीन बार से मेयर के चुनाव के लिए बैठकें बुलाई गई, लेकिन पार्षदों के हंगामे की वजह से मेयर का चुनाव नहीं हो सका। एमसीडी की बैठक तीन बार स्थगित होने की वजह से मेयर के साथ-साथ डिप्टी मेयर और स्टैंडिंग कमिटी के सदस्यों का भी चुनाव नहीं हो पाया है।

दरअसल, एमसीडी मेयर के चुनाव में एक पेंच फंसा हुआ है, जिसकी वजह से बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों आमने-सामने हैं। दिसंबर में हुए एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी को 134, बीजेपी को 104, कांग्रेस को 9 सीटें, वहीं अन्य को 3 सीटें मिली हैं। बहुमत के आधार पर आम आदमी पार्टी को मेयर चुनने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए, लेकिन दिल्ली के मेयर चुनाव का पेंच चुने हुए सदस्यों के अलावा मनोनीत सदस्यों के वोटिंग अधिकार पर फंसा है। इसके अलावा एलजी द्वारा मनोनीत किए जाने वाले एल्डरमैन पार्षदों का वोटिंग अधिकार भी मेयर के चुनाव के लिए कलह का विषय बना है।

दिल्ली में कैसे मेयर चुना जाता है?

दिल्ली नगर निगम के मेयर का चुनाव निगम के पार्षद मिल कर करते हैं। नगर निगम में स्पष्ट बहुमत वाली पार्टी किसी भी पार्षद को मेयर के चुनाव में खड़ा कर सकती है। अगर, अन्य कोई उम्मीदवार भी मैदान में उतरता है, तो सदन में वोटिंग के जरिए मेयर का चुनाव किया जाता है। अलग अलग नगर निगमों के मेयर का चुनाव 1 साल से लेकर 5 साल तक के लिए होता है। दिल्ली नगर निगम में हर वित्त वर्ष में मेयर का चुनाव किया जाने का प्रावधान है। वहीं, मुंबई नगर निगम के मेयर का चुनाव हर 2.5 साल के बाद किया जाता है, जबकि भोपाल नगर निगम में हर 5 साल में मेयर बदला जाता है।

किसी नगर निगम में जब एक से ज्यादा उम्मीदवार मेयर बनने का दावा करते हैं, तो मेयर का चुनाव करवाया जाता है। दिल्ली नगर निगम के लिए उपराज्यपाल पीठासीन अधिकारी को नियुक्त करते हैं। पीठासीन अधिकारी इसके बाद सभी पार्षदों को सदन की सदस्यता दिलाते हैं और फिर गुप्त वोटिंग के जरिए मेयर का चुनाव किया जाता है। मेयर के चुनाव में दल-बदल कानून लागू नहीं होता है, ऐसे में पार्षद क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं, यानी किसी भी पार्टी के पार्षद किसी भी मेयर उम्मीदवार को वोट कर सकते हैं। अगर, दो उम्मीदवार को बराबर वोट मिलते हैं तो ऐसे में पीठासीन अधिकारी स्पेशल ड्रॉ के तहत मेयर का चुनाव करते हैं।

मेयर का पद अहम क्यों है?

मेयर किसी भी नगर निगम का मुखिया होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में पहली बार 1688 में मद्रास नगर निगम की स्थापना की गयी। इसके बाद 1762 में बॉम्बे और कलकत्ता नगर निगम बनाए गए। भारतीय संविधान में 1992 में हुए 74वें संसोधन में मेयर को 18 अलग-अलग अधिकार प्रदान किए गए। इस संसोधन में नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत को सेल्फ गवर्निंग इंस्टीट्यूशन बनाया गया। 1993 के अप्रैल से मेयर पहले के मुकाबले ज्यादा शक्तिशाली हो गए और उन्हें कई तरह के नए रोल और अधिकार दिए गए।

मेयर को मिलने वाले मुख्य अधिकार की बात करें तो वह स्थानीय निकाय का मुखिया होता है। इनका एक निश्चित कार्यकाल होता है, जो अलग-अलग नगर निगम के मुताबिक बदलता रहता है। मेयर नगर निगम के पीठासीन अधिकारी के साथ-साथ शहर का पहला नागरिक होता है। दिल्ली नगर निगम एक्ट के मुताबिक, नगर निगम का पहला मेयर कोई महिला पार्षद हो सकती है और तीसरे साल किसी शेड्यूल कास्ट का पार्षद हो सकता है।

इस वजह से नहीं हो पा रहा मेयर का चुनाव

दिल्ली नगर निगम (MCD) का गठन 7 अप्रैल 1958 को नगर निगम एक्ट 1957 के तहत हुआ है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह एक्ट सदन में मौजूद मनोनीत सदस्यों को वोटिंग का अधिकार नहीं देता है। वहीं, एलजी द्वारा नियुक्त किए गए प्रीआईडिंग ऑफिसर (पीठासीन अधिकारी) सत्या शर्मा का कहना है कि मई 2022 में एमसीडी एक्ट में हुए संशोधन की वजह से मनोनीत सदस्यों को वोटिंग का अधिकार दिया गया है, क्योंकि पहले दिल्ली नगर निगम में पार्षदों की संख्या 272 थी, जिसे पुनर्गठन के बाद घटाकर 250 कर दिया गया है।

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    संविधान के अनुच्छेद 243R के मुताबिक, नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान का अनुभव रखने वाले मनोनित व्यक्तियों को बैठकों में मतदान करने का अधिकार नहीं होगा। साल 2015 में कांग्रेस द्वारा मनोनीत की गई पार्षद ओनीका महरोत्रा द्वारा अनुच्छेद 243R को चैलेंज दिया गया, जिसपर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि मनोनीत पार्षद वार्ड समितियों के घटक सदस्य होने के नाते, वार्ड समिति की किसी भी बैठक में भाग ले सकते हैं और मतदान भी कर सकते हैं। इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मनोनीत सदस्त अपना नामांकन दाखिल नहीं कर सकते हैं यानी वार्ड समिति के अध्यक्ष के तौर पर अपनी उम्मीदवारी पेश नहीं कर सकते हैं। मनोनीत सदस्य स्थायी समिति के सदस्य के रूप में चुने जाने की स्थिति में वो किसी भी बैठक में मतदान कर सकते हैं।

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