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Caste Politics: राजनीतिक फायदे के लिए बिहार में फिर जातिगत वैमनस्यता की खेती

बिहार में चुनावों की एक लम्बी शृंखला शुरू होने वाली है। 2024 लोकसभा चुनाव है तो 2025 विधान सभा का। अभी तक बिहार में चुनाव पूरी तरह जातीय आधार पर लड़े जाते रहे हैं। इसलिए इस समय बिहार की राजनीति में जातीय टिप्पणियों की होड़ कोई अप्रत्याशित नहीं है।

21 सितंबर को राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्यसभा सांसद डॉक्टर मनोज झा द्वारा ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता 'ठाकुर का कुआं' के वाचन ने एक बहाना दे दिया, और फिर जातीय वैमनस्यता फ़ैलाने सभी लोग मैदान में कूद पड़े।

Bihar for political

उम्मीद थी कि सभी को साथ ले कर चलने का दम भरने वाले राजद के नेता इस आग को ठंडा करने की कोशिश करेंगे, लेकिन लालू यादव ने दो दिन लगातार बयान जारी कर मनोज झा को सही और आनंद मोहन सिंह के परिवार को बिना बुद्धि वाला करार देकर यह सिद्ध कर दिया कि वयोवृद्ध राजद नेता आज भी अगड़ों के साथ खड़े होने को तैयार नहीं। इसके बाद नीचे की पंक्तियों से अपने आप ही सुर मिलाने वाले लोग सामने आने लगे।

राजद के ही विधायक ने खोला मोर्चा
शिवहर से राजद विधायक चेतन आनंद ने विरोध में मोर्चा खोलते हुए अपना एक वीडियो साझा किया जिसमें कहा "जब हम दूसरों के बारे में गलत नहीं सुन सकते तो अपने (ठाकुरों) पर अभद्र टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं करेंगे। जरूरत पड़ी तो पार्टी के अंदर भी हम अपनी बात रखेंगे। समाजवादी फॉर्मूले में समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की बात कही है। समाजवाद में किसी एक जाति को टारगेट करना समाजवाद के नाम पर दोगलापन के अलावा कुछ नहीं है। कुछ भी बोलने से पहले ऐसे लोगों को दो बार सोचना चाहिए।"

चेतन आनंद के पिता और राजद के सांसद रह चुके बाहुबली नेता आनंद मोहन ने इस मामले को और भड़काया जब उन्होंने कहा -अगर मैं राज्यसभा में होता तो उनकी जीभ खींच कर उछाल देता। एक और ठाकुर विधायक ने कहा- अगर मेरे सामने ऐसी बातें बोलते तो पटक कर उनका मुंह तोड़ देता। पूर्व राजद नेता राघवेंद्र सिंह ने वीर कुंवर सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि वो भी ठाकुर थे। हमें अपना सर कटाने में और काटने में एक सेकेंड नही लगता। राजद ही नहीं जदयू प्रवक्ता सुनील कुमार ने भी इस प्रकरण को शर्मनाक बताया और जदयू नेता संजय सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया कि ठाकुर आग हैं, मत खेलो जल जाओगे।

लालू का समर्थन
राजद सुप्रीमो लालू यादव मनोज झा का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। बल्कि शाबाशी देते हुए कहा - "मनोज झा एक विद्वान व्यक्ति हैं। उन्होंने जो कहा है वह बिल्कुल सही है। उनका इरादा राजपूतों, ठाकुरों या किसी अन्य जाति का अपमान करने का नहीं था।" जब पत्रकारों ने विधायक चेतन आनंद और आनंद मोहन की बयानबाजी के बारे में पूछा तो लालू यादव ने तंज कसते हुए कहा - "अब उनकी बुद्धि ही इतनी कम है क्या करें।"

राजद के एक्स हैंडल से मनोज झा के समर्थन में ट्वीट भी किया गया। लालू यादव को जानने वाले हैरत में नहीं है। उनको मालूम है कि जब भी अगड़ों - पिछड़ों के बीच संघर्ष की बात होगी, लालू यादव हमेशा अगड़ों के खिलाफ ही बात करेंगे। इसी जातीय मतभेद के जरिये 15 वर्ष तक बिहार में उन्होंने सत्ता सुख भोगा है। लालू यादव के कुछ चर्चित बोल रहे हैं - 'भूरा बाल' साफ करो - बिहार के 1990 के दौर में उनके द्वारा भूरा-बाल साफ करो का जुमला अब भी लोगों के जेहन में गूंजता है। जिसमें भूरा बाल का तात्पर्य चार अगड़ी जातियों से था भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला।
'परबल' का भजिया बनाओ - दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समुदाय को लामबंद करने के लिए उनके द्वारा परबल का भजिया बनाओ वाला नारा से भी बिहार की अगड़ी जातियों में गुस्सा फैल गया था। यहां उनके 'परबल' शब्द से तात्पर्य - प से पंडित, र से राजपूत, ब से बाभन यानी भूमिहार और ल से लाला यानी कायस्थ था।

ब्राह्मण बनाम ठाकुर कितना है राजनीतिक वर्चस्व
बिहार में राजपूतों (ठाकुरों) की आबादी 5.2 प्रतिशत और ब्राह्मण की 5.7 प्रतिशत है। बिहार में 40 लोकसभा सीटें है जिसमें 7 सांसद राजपूत हैं। इनमे 5 भाजपा और 2 जदयू के सांसद हैं। बिहार में मात्र 2 सांसद ब्राह्मण जाति से हैं, और दोनों भाजपा से हैं। वहीं विधानसभा की तस्वीर देखी जाए तो 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में 28 सदस्य राजपूत जाति से हैं। इनमें सबसे अधिक भाजपा के 17, आरजेडी के 7, जेडीयू के 2 और अन्य दलों के 2 विधायक हैं। ब्राह्मण विधायक मात्र 12 हैं जिनमे 5 भाजपा, राजद के 2, जदयू के 2 और कांग्रेस के 3 विधायक हैं।

क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ब्राह्मण बनाम ठाकुर का ताजा विवाद एक सोची समझी राजनीतिक कूटनीति है। इस विवाद के दो पहलू हैं। एक यह कि ब्राह्मण और ठाकुर में ठनी है, ये दोनो जातियां वर्तमान में बिहार भाजपा के कोर वोटर हैं। अगर इन दोनों में से किसी एक का समर्थन करने से दूसरे जाति के वोटर्स का खिसकने का डर रहेगा। और मनोज झा की पढ़ी इस विवादित कविता पर अगर विभिन्न दलित जातियां लामबंद हुई तो राजद को फायदा हो सकता है।

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