Rajasthan Congress: पुरानी तनातनी है अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच, जानिए इसका इतिहास
एक दशक पूर्व शुरू हुई सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच वर्चस्व की लड़ाई, अनशन के बहाने अब आर-पार की जंग

Rajasthan Congress: राजस्थान कांग्रेस में राजनैतिक हलचल फिर शुरू हो गई है। पूर्व उप-मुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे सचिन पायलट एक बार फिर से अपने सियासी वजूद को लेकर संघर्षरत हैं। हालांकि उन्होंने मौन धारण किया है लेकिन उनकी चुप्पी ने सियासी गलियारों में जयपुर से लेकर दिल्ली तक हलचल मचा दी है। वहीं विरोधी खेमे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके सिपहसालार पूरे प्रकरण पर नजर रखे हुए हैं। मगर इस बार लग रहा है पायलट आर या पार की लड़ाई के मूड में है।
सचिन पायलट की राजनीतिक शुरुआत
लगभग 20 साल पहले 10 फरवरी 2002 को पिता राजेश पायलट के जन्मदिन पर सचिन पायलट ने कांग्रेस ज्वाइन की थी। दरअसल, जयपुर की एक किसान रैली में पायलट कांग्रेस का हिस्सा बने थे। इस दौरान अशोक गहलोत भी मंच पर मौजूद थे। दो साल बाद यानी 2004 में सचिन पायलट ने 26 साल की उम्र में दौसा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गए। उस वक्त तक पायलट अशोक गहलोत के निशाने पर नहीं थे।
कहां से शुरू हुए मनमुटाव
फिर 2008 के विधानसभा चुनावों में गहलोत की दोबारा सरकार बनी। जबकि 2009 के लोकसभा चुनावों में सचिन पायलट ने अजमेर से लोकसभा चुनाव लड़ा और मनमोहन सरकार में मिनिस्टर ऑफ स्टेट बने। यहीं से दोनों के बीच मतभेद सामने आने लगे। पायलट धीरे-धीरे गहलोत को 'खटकने' लगे थे।
प्रदेश कांग्रेस की कमान मिलते ही निशाने पर आए
इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में अशोक गहलोत की सरकार चली गयी। इन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 163 सीट मिली और कांग्रेस के खाते में महज 21 सीटें आई। कांग्रेस का राजस्थान में यह सबसे बुरा प्रदर्शन था। इस हार के मद्देनजर पार्टी हाईकमान ने 2014 के लोकसभा चुनाव से ऐन वक्त पहले सचिन पायलट को महज 36 साल की उम्र में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। कहा जाता है यह जिम्मेदारी उन्हें राहुल गांधी का करीबी होने के चलते मिली थी। उस दौरान गहलोत कैंप ने पायलट की नियुक्ति को सही नहीं समझा। यहीं से पार्टी में खेमेबाजी शुरू होने लगी।
गौरतलब है कि 2014 के आम चुनावों में राजस्थान से कांग्रेस एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई और पायलट खुद भी चुनाव हार गए थे। हार ने सचिन पायलट और अशोक गहलोत में तनातनी ला दी। इस हार के बावजूद पार्टी हाई कमान ने पायलट पर भरोसा जताया और गहलोत को प्रदेश से दूर रखने जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए। इसी क्रम में 2017 में गहलोत को दिल्ली बुलाकर गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले गुजरात का प्रभारी बना दिया गया।
पार्टी हाईकमान से मिले भरोसे के चलते 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में पायलट ने दमखम दिखाया। दरअसल, पायलट की अगुवाई में 2018 का राजस्थान विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने बहुमत से जीत लिया। सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, मगर कुर्सी फिर से अशोक गहलोत को मिल गयी। हालांकि पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन वह अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए उतावले थे। पहली बार अशोक गहलोत को राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सीधे तौर पर चुनौती मिली। यहीं से दोनों के बीच शुरू हुई राजनीतिक अदावत अब तक जारी है।
2019 के लोकसभा चुनावों के बाद पायलट की चुनौती
2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से एक बार कांग्रेस को क्लीन स्वीप मिली। इस हार के कारण पायलट ने हेल्थ और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर अपनी ही पार्टी की गहलोत सरकार को जमकर घेरा। जिसके चलते अशोक गहलोत ने पायलट को साइडलाइन कर दिया। हालांकि पार्टी आलाकमान का झुकाव सचिन पर ही था।
मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज पायलट ने गहलोत के खिलाफ खुलकर बगावत की और अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर में डेरा डाल लिया। हालांकि, इस मामले में गहलोत भारी पड़े और उन्होंने सदन में अपना बहुमत साबित कर पायलट को उनका असली कद बता दिया। तब से लेकर आज तक पायलट व गहलोत में रस्साकसी का दौर जारी है।
दोनों तरफ से चलती रही बयानबाजी
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जुलाई 2020 से शुरू इस विवाद में कांग्रेस के दो प्रभारी बदल गये लेकिन विवाद नहीं सुलझ पाया। गहलोत ने एक मीटिंग में कहा कि मेरी पार्टी में भी 2020 के बाद एक 'कोरोना' सक्रिय हो गया। इधर, पायलट ने भी एक रैली में कहा कि 32 सलाखों के पीछे एक बिना हड्डी वाला जीभ होता है, इसे सोच समझ कर चलाना चाहिए। इसी दौरान भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान पहुंची। रैली के दौरान राहुल गांधी ने पायलट और गहलोत को पार्टी का एसेट बताया। इस तरह राज्य में सीजफायर का फॉर्मूला लागू कर दिया।
अब आर-पार की जंग
आलाकमान द्वारा गहलोत के समर्थकों पर किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं करने से नाराज पायलट अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की मांग को लेकर वह गहलोत सरकार के साथ साथ भाजपा को भी कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी को लेकर उन्होंने मंगलवार को सांकेतिक अनशन किया। इस बहाने वह राज्य की गहलोत सरकार पर दबाव बना रहे हैं, दूसरी ओर दिल्ली में बैठे आलाकमान को किसी भी निर्णय पर पहुंचने का संदेश दे रहे हैं। राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो समय बताएगा लेकिन यह तय है कि एक बार फिर कांग्रेस में अंदरखाने शह और मात का खेल खेला जा रहा है।
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