जन्मदिन पर विशेष: जानिए लालू यादव के बचपन की बातें, कैसे पड़ा 'लालू' नाम

पटना। अपने जीवन के 68 वें बसंत पार कर चूके राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जिंदगी में कई तरह के उतार चढ़ाव देखने के बावजूद देश की राजनीति में सबसे चतुर और चालाक राजनेता माने जाते हैं। लालू प्रसाद यादव का जन्मदिन है और वो अपने आवास मे 69वा जन्मदिन बड़े ही धूमधाम से मना रहे हैं। लालू को सता रहा है बीजेपी डर ,कहीं ये लोग मेरे और राबड़ी में तलाक न करवा दे

Lalu Ydav

जन्मदिन के कार्यक्रम में लालू को बधाई देने के लिए राजद-जदयू और कांग्रेस सहित महागठबंधन के कई नेता मौके पर पहुंचे। वहीं बधाई देने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि लालू प्रसाद यादव ने शून्य से उठकर जिस उचाईयों को हासिल किया है वह बहुत बड़ी बात है।

जानिए लालू का नाम लालू कैसे पड़ा

लालू यादव के बचपन के दिनों के बारे में बताते हुए उनकी बहन गंगोत्री देवी ने कहा कि बचपन से ही लालू प्रसाद बहुत तेज थे। लेकिन गरीबी के कारण उनकी ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं हो पाई थी। बचपन में लालू प्रसाद अपनी भैंस चराया करते थे। और वो काफी गोल मटोल भी देखते थे। कड़ी धूप में जब वह भैंस को चारा खिलाकर घर लौटते थे तो उनका चेहरा लाल हो जाता था। जिसे देखते हुए उनके पिता कुंदन राय ने उसका नाम लालू रख दिया। नहीं तो पहले उन्हें प्रसाद कह कर पुकारा जाता था।

Lalu

बचपन से ही बहुत झगड़ालू और तेज थे लालू

लालू के बचपन के दिनों के बारे में बताते हुए गंगोत्री देवी ने कहा कि प्रसाद और हम दोनों अन्य भाइयों की अपेक्षा हमेशा एक साथ रहते थे। जब भी कभी कोई भाई के द्वारा मुझे या प्रसाद को परेशान किया जाता था तो हम दोनों मिलकर उस की धुलाई कर देते थे। किसके कारण हमारे सभी भाई मुझे बहन नहीं बल्कि भाई ही बुलाते थे और कहते थे कि हम छह भाई नहीं बल्कि सात भाई हैं।

Lalu Prasad

वहीं बचपन में हुए यह घटना के बारे में बताते हुए गंगोत्री देवी ने कहा कि हमारे पिता कुंदन राय जो मवेशी चराने का काम करते थे उनका गांव के ही व्यक्ति से उनका झगड़ा हो गया। तब हम और लालू 15-16 साल के थे। झगड़ा सूचना मिलते ही हम लोग दौड़ कर उस स्थान पर पहुंचे और पिता के साथ मारपीट कर रहे व्यक्ति की जमकर धुनाई कर दी। जिसके बाद से सभी भाईयो सहित लालू मे भी मेरा डर बरकरार हो गया था।

गरीबी में गुजरी थी लालू की जिंदगी, महज तीस रूपये देकर की थी बहन की शादी

अपनी बचपन की दिनों के बारे में बताते हुए गंगोत्री देवी ने कहा कि हमारे पिता मजदूरी करते हुए मवेशी पाल कर अपना और अपने परिवार का जीवन यापन करते थे। मेरे पिता के पास अपनी कुछ भी जमीन नहीं थी। जिसकी वजह से हम लोग को खाने के लिए भी सोचना पड़ता था। कभी मक्के की रोटी तो कभी मक्के का दर्रा तो कभी सिर्फ साग से ही दिन गुजारना पड़ता था।

Lalu Bday

जिसकी वजह से मेरे अन्य भाई के साथ साथ लालू की पढ़ाई लिखाई कुछ ज्यादा नहीं हो पाई थी। जब मेरे दो भाई महावीर राय और मुकुंद राय की नौकरी पटना में हुई तब जाकर घर की स्थिति सुधरी थी। जिसके पास मेरी शादी गोपालगंज जिले के ही सिकटिया पंचायत के चक्रपाणि गांव में एक किसान के साथ कर दिया गया।

गाय भैंस की देख-रेख कर लालू बने थे विधायक

पटना में दोनों भाइयों की नौकरी मिलने के बाद उन्हें क्वाटर मिल गया था। जिसके बाद लालू भी गोपालगंज से पटना आ गए। वहीं क्वाटर के आसपास गाय भैसों को चारा खिलाने का उन्हें काम भी मिल गया। गाय भैंसों की देखरेख करते हुए लालू ने अपनी पढ़ाई शुरु की। लालू पढ़ने में शुरु से ही तेज तर्रार थे।

जिन दिनों लालू प्रसाद के द्वारा संपूर्ण क्रांति आंदोलन में संघर्ष किया जा रहा था उस दिन भी हमारे घर की हालत कुछ ठीक-ठाक नहीं थी। लेकिन दिल में एक जुनून और रुखा सुखा खाना खाते हुए एक ही कपड़ा धो धोकर पहनने वाले लालू ने कभी हार नहीं माना। और छात्र संघ के नेता से विधायक और बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर किया।

विधायक बनने के बाद भी 4 महीने चपरासी क्वाटर में गुजारा था

लालू प्रसाद यादव अपने भाई के यहां चपरासी क्वाटर में रहा करते थे। जहां से विधानसभा चुनाव लड़ा और उन्हें सफलता भी हासिल हुई लेकिन विधायक बनने के बाद भी वह करीब 4 महीने तक चपरासी क्वाटर में ही रहे। वहीं बगल में एक बैढका बनाया था। जहां लालू लोगों से मिला करते थे और अधिकारियों के साथ साथ नेता भी उस बैठक में शामिल हुआ करते थे।

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