Bikaner Foundation Day: आखातीज पर पतंग उड़ाकर बीकानेर मनाता है अपना स्थापना दिवस
बीकानेर का खारा पानी और यहां का शुष्क मौसम मिलकर अनूठा ही स्वाद रचते हैं। बीकानेरी भुजिया देशभर की पसंद बनी हुई है।

Bikaner Foundation Day: राजस्थान के थार रेगिस्तान के बीच बसा बीकानेर शहर अक्षय तृतीया यानी आखातीज को अपना 535 वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस दिन को बीकानेरवासी खास अंदाज में मनाते हैं। तपते मौसम में आंखें आसमान की ओर तकती रहती हैं, पतंगबाजी का दौर चलता रहता है। कहते हैं कि राव बीकाजी ने जब बीकानेर की स्थापना की तो उन्होंने चंदा उड़ाकर अपना उल्लास जाहिर किया था, चंदा यानी गोल पतंग। यह सामान्य पतंगों से कुछ बड़ी होती है। मोटे कागज से इसे बनाया जाता है और डोरी के सहारे उड़ाया जाता है। इसे उड़ाना आसान नहीं है।
आसान तो तेज गर्मी में सामान्य पतंग उड़ाना भी नहीं है, लेकिन बीकानेर के जुनूनी लोग ऐसा करते हैं। बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी भी कोई कम जुनूनी नहीं थे। मारवाड़ के शासक राव जोधा के पुत्र राव बीका ने जोधपुर का राजपाठ छोडक़र बीकानेर बसाया, देवी करणी माता के आशीर्वाद से। बीकानेर के देशनोक में करणी माता का मंदिर है। चूहों वाली देवी के रूप में मशहूर है यह मंदिर। चूहों की तादाद और उनके प्रति आस्था हैरान कर देने वाली है। हैरान कर देने के किस्से बीकानेर के हिस्से बहुत सारे हैं, जानिए आप भी कुछ बातें बीकानेर की।
यहीं से निकली केसरिया बालम की पुकार
राजस्थान जिस लोक गीत के जरिए दुनियाभर के सैलानियों को अपने यहां पधारने का न्योता देता है, वो गीत बीकानेर के राजदरबार से ही निकला है। ढोला मारू की प्रेम कहानी से जुड़े इस लोकगीत को जब बीकानेर में जन्मी सुरीली गायिका अल्लाह जिलाई बाई ने बीकानेर महाराजा गंगासिंह के दरबार में गाया तो उसकी गूंज दूर-दूर पहुंची।
केसरिया बालम आओनी पधारो म्हारे देस... आज भी पावणे इस गीत की मिठास में बंधे चले आते हैं। कहते हैं कि बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने जो अभूतपूर्व काम किए, उनमें से एक अहम काम यह भी था कि उन्होंने अल्लाह जिलाई बाई की कला को परखा और संरक्षण दिया।
प्यास, पाकिस्तान और गंग नहर
वर्ष 1888 में महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर की राजगद्दी संभाली। करीब दशक भर बाद यानी 1899 (विक्रम संवत 1956) में भयंकर अकाल पड़ा, जिसे छप्पनिया अकाल भी कहते हैं। बड़ी आबादी अकाल की भेंट चढ़ गई थी। आगे से ऐसा न हो, इसके लिए महाराजा गंगासिंह ने सोचा कि वे पंजाब से सतलुज का पानी बीकानेर तक लेकर आएंगे, पर ये राह इतनी आसान नहीं थी। दुनिया प्रथम विश्व युद्ध की कगार पर पहुंच चुकी थी।
महाराजा गंगासिंह ने 'गंगा रिसाला' नाम से ऊंटों की एक सेना बनाई और अंग्रेजों की तरफ से प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी निभाई। उनके योगदान ने गंगनहर का रास्ता खोल दिया। पंजाब सरकार, बहावलपुर रियासत और बीकानेर रियासत के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत फिरोजपुर में सतलुज से बीकानेर तक नहर बननी तय हुई। 1925 में नहर बननी शुरू हुई, पूरा होने में दो बरस लगे।
आजादी के समय जब पंजाब का बंटवारा होना तय हुआ तो रैडक्लिफ कमीशन ने फिरोजपुर पाकिस्तान को सौंपने का निर्णय लिया, ऐसे में महाराजा गंगासिंह के बेटे सादुल सिंह अड़ गए। उनका कहना था कि अगर फिरोजपुर पाकिस्तान गया, तो बीकानेर भी पाकिस्तान जाएगा। वे बीकानेर को प्यास में तड़पता नहीं देख सकते थे। आखिरकार बहुत प्रयासों के बाद फिरोजपुर भारत के हिस्से में दे दिया गया और बीकानेर पाकिस्तान का हिस्सा होने से बच गया, साथ ही गंग नहर का अस्तित्व भी बना रहा।
भुजिया और रसगुल्लों की नगरी
जिन लोगों ने आज तक बीकानेर नहीं देखा, बीकानेर अपने स्वाद के जरिए उन लोगों तक पहुंच गया। बीकानेर का खारा पानी और यहां का शुष्क मौसम मिलकर अनूठा ही स्वाद रचते हैं। बीकानेरी भुजिया देशभर की पसंद बनी हुई है और बीकानेर वालों का भोजन तो नमकीन के बिना होता ही नहीं। मशहूर कवि अशोक वाजपेयी के मुताबिक, बीकानेर की आधी आबादी भुजिया बनाने में लगी है और आधी आबादी उसे खाने में।
ऐसा माना जाता है कि बीकानेरी भुजिया बनाने की शुरुआत 1877 में महाराजा डूंगर सिंह के काल में हुई थी। धीरे-धीरे पूरे बीकानेर को इसका स्वाद रास आने लगा और अब तो पूरी दुनिया को। वहीं रसगुल्ले भले ही बंगाल में जन्मे हों, लेकिन बीकानेर में आकर उन्होंने अपनी खास पहचान बनाई है। छोटू-मोटू जोशी ने 1911 में बीकानेर में रसगुल्ले बनाने शुरू किए। अब तो नमकीन, पापड़, बड़ी (मंगोड़ी) और रसगुल्ले का करोड़ों का व्यापार होता है बीकानेर में।
एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी
एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी भी बीकानेर में है। यहां 250- 300 के करीब फैक्ट्रियां हैं। राजस्थान की भेड़ें अन्य राज्यों की भेड़ों के मुकाबले ज्यादा ऊन का उत्पादन करती हैं। यहां की भेड़ों के ऊन से बने गलीचे दुनियाभर में मशहूर हैं।
बनेगा खिचड़ा और इमलाणी
बीकानेरवासी गेहूं और मूंग का खिचड़ा, बड़ी (मंगोड़ी) की सब्जी और इमलाणी (इमली का रस) बनाकर आखातीज मनाएंगे। जूनागढ़ के आगे राव बीका की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित कर नगर संस्थापक को याद किया जाएगा। उसके साथ ही पतंगबाजी का आनंद लिया जाएगा।
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