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नई दिल्ली से लड़ चुके हैं अटल, अडवाणी व राजेश खन्ना, जानिए इस वीआईपी सीट का इतिहास

New Delhi Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव 2024 का महासंग्राम अपने चरम सीमा पर है। सभी पार्टियां जीत के लिए अपने बड़े बड़े वादों के साथ वोटरों को लुभाने में लगी हुई हैं। इस संग्राम का पहला चरण 19 अप्रैल को संपन्न हुआ।

वही दूसरा चरण 26 अप्रैल को, तीसरा 7 मई, चौथा 13 मई, पांचवा 20 मई, छठा 25 मई तथा सातवां चरण 1 जून को होगा। इन सातों चरणों की मतगणना 4 जून 2024 को होगी। देश की राजधानी दिल्ली में मतदान की तारीख 25 मई है। छठे चरण में दिल्ली सहित सात राज्यों की 57 सीटों पर मतदान होगा।

New Delhi Seat

नई दिल्ली लोकसभा सीट का इतिहास

स्वतंत्र भारत में जब 1951-52 में पहला आम चुनाव हुआ, तो उससे पहले ही इस निर्वाचन क्षेत्र का गठन हो चुका था। देश की राजधानी दिल्ली का यह सबसे पुराना निर्वाचन क्षेत्र है। 2008 के परिसीमन उपरांत इस लोकसभा क्षेत्र में 10 विधानसभाएं (करोल बाग, पटेल नगर, मोती नगर, दिल्ली कैंट, राजेंद्र नगर, नई दिल्ली, कस्तूरबा नगर, आर.के. पुरम व ग्रेटर कैलाश) आती है। इससे पूर्व 1993 से 2008 तक इसमें 6 विधानसभाएं (सरोजनी नगर, गोल मार्किट, मिंटो रोड़, कस्तूरबा नगर, जंगपुरा व मटिया महल) थी।

वहीं 1966 से 1993 तक इस लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभाएं (सरोजनी नगर, लक्ष्मीबाई नगर, गोल मार्किट, बारा खंबा, मिंटो रोड़, जंगपुरा, कस्तुरबा नगर तथा लाजपत नगर) थी। अगर जनसंख्या का आंकलन करें तो इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग 16 लाख मतदाता (पुरूष लगभग 9 लाख व महिलाएं 7 लाख) हैं।

1951-52: पहले चुनाव में ही हारी कांग्रेस

स्वतंत्रता के बाद हुए पहले आम चुनाव में जहां कांग्रेस ने भारी बहुमत (489 सीटों में से 364 सीटें) हासिल किया, वहीं नई दिल्ली लोकसभा सीट पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 56.05 प्रतिशत हुए मतदान में किसान मजदूर प्रजा पार्टी की उम्मीदवार सुचेता कृपलानी ने कांग्रेस उम्मीदवार मनमोहन सहगल को कड़े मुकाबले में 7671 वोटों से हरा दिया।

1957: सुचेता कृपलानी बनी कांग्रेस की प्रत्याशी

इस आम चुनाव में कांग्रेस को पहले चुनाव से ज्यादा सीटें (371) प्राप्त हुई। इस सीट से पहली सांसद सुचेता कृपलानी ने इस बार कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ा और अपने प्रतिद्वंद्वी बलराज मधोक (भारतीय जनसंघ) को भारी अंतर (53814 वोटों) से हरा दिया। दिल्ली की सभी 5 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हुआ।

1960 में तत्कालीन सांसद सुचेता कृपलानी लोकसभा से इस्तीफा देकर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बन गई। जिसके चलते इस सीट पर फिर चुनाव हुआ। इस बार भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार बलराज मधोक ने कांग्रेस प्रत्याशी जे.बी. सिंह को 9,581 वोटों से हराकर हिसाब चुकता कर दिया।

1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में अखिल भारतीय जनसंघ के तत्कालीन सांसद बलराज मधोक कांग्रेस के उम्मीदवार मेहर चन्द खन्ना से 31,595 वोटों से हार गये। इस बार के आम चुनाव में भी कांग्रेस को भारी बहुमत मिला और उसने 361 सीटें जीती थीं।

1967: भारतीय जनसंघ ने फिर किया कब्जा

इस बार दिल्ली में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 7 हो गई। वहीं कांग्रेस के तत्कालीन सांसद मेहर चन्द खन्ना को इस लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। वे अखिल भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी मनोहर लाल सोंधी से 28,860 वोटों से हार गये।

1971 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुकुल बनर्जी ने तत्कालीन सांसद मनोहर लाल सोंधी को 44,533 से हराकर यह सीट फिर कांग्रेस के नाम की। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लड़े गए इस आम चुनाव में कांग्रेस को 360 सीटें मिली।

1977: अटल बिहारी वाजपेयी बने सांसद

इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में अधिकांश विपक्षी दल जनता पार्टी के नाम से एकजुट हुए और मिलकर चुनावों में उतरे। नई दिल्ली सीट से जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी सांसद निर्वाचित हुए। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार शशि भूषण को 77,186 वोटों से हरा दिया। वहीं इस आम चुनाव में कांग्रेस 154 सीट पर सिमट गई और केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बन गई।

1980 में हुए सातवीं लोकसभा चुनाव के दौरान नई दिल्ली लोकसभा सीट से जनता पार्टी उम्मीदवार व तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस प्रत्याशी सी.एम. स्टीफन को करीब 5 हजार वोटों से हरा दिया। इस चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई और इंदिरा गांधी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनी।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी सहानुभूति लहर में करवाए गए लोक सभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कृष्ण चंद्र पंत विजयी रहे। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार कंवर लाल गुप्ता को लगभग 72 हजार वोटों से हराया। 543 लोकसभा सीटों में से इस आम चुनाव में कांग्रेस को 426 सीटें मिली और राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।

1989: लालकृष्ण अडवाणी बने सांसद

1989 में हुए लोकसभा चुनावों में नई दिल्ली लोकसभा सीट से बीजेपी ने लालकृष्ण अडवाणी को अपना प्रत्याशी घोषित किया। जिन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार वी. मोहिनी गिरि को करीब 31 हजार वोटों से शिकस्त दी।

1989 में बनी जनता दल की सरकार पहले वी पी सिंह और बाद में चंद्रशेखर के नेतृत्व में कुछ ही महीने चल पाई और देश में मध्यावधि चुनाव हुए। 1991 में हुए इन चुनावों में लालकृष्ण अडवाणी ने इस सीट पर फिर से विजय प्राप्त की। उन्होंने फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना को 1589 वोटों से हराया। लेकिन आडवाणी ने जीत के बाद इस सीट से त्यागपत्र दे दिया, क्योंकि इस बार वे दो लोकसभा सीटों (गांधी नगर व नई दिल्ली) से चुनाव लड़े थे और दोनों पर ही विजयी हुए। नई दिल्ली लोकसभा सीट पर इसके उपरांत 1992 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार राजेश खन्ना ने भारतीय जनता पार्टी के शत्रुघ्न सिन्हा को लगभग 28 हजार वोटों से हराकर पिछली हिसाब चुकता किया।

1996: जगमोहन ने राजेश खन्ना को हराया

1996 के चुनावों में कांग्रेस से तत्कालीन सांसद राजेश खन्ना बीजेपी प्रत्याशी जगमोहन से लगभग 58 हजार वोटों से हार गये। जगमोहन को 54.34 फीसदी व राजेश खन्ना को 31.7 फीसदी वोट मिले।

1996 में बनी जनता दल की सरकार फिर से स्थायी नहीं रह सकी और पहले एच डी देवेगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। लेकिन दोनों ही एक साल भी टिक नहीं सके। इसलिए 1998 में मध्यावधि चुनाव हुए। इन चुनावों में नई दिल्ली सीट से बीजेपी उम्मीदवार व तत्कालीन सांसद जगमोहन फिर से सांसद चुने गए। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी आर.के. धवन को लगभग 32 हजार वोटों से हराया।

1999: जगमोहन की हैट्रिक

1998 में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार भी एक साल ही चल पाई और सहयोगी दल अन्ना द्रमुक के समर्थन वापस ले लेने के कारण मध्यावधि चुनाव हुए। 1999 में हुए इस आम चुनाव में भी नई दिल्ली लोकसभा से जगमोहन सांसद निर्वाचित हुए। इस बार उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार आर.के. धवन को करीब 27 हजार वोटों से हरा दिया।

2004 के लोकसभा चुनावों में लगातार तीन बार सांसद रह चुके बीजेपी प्रत्याशी जगमोहन को हार का सामना करना पड़ा। इस बार वे कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन से करीब 12 हजार वोटों से हार गये।

2009 में हुए लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस के अजय माकन ही विजयी हुए। उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी विजय गोयल को 1 लाख 87 हजार वोटों से पराजित किया।

2014: बीजेपी का फिर कब्जा

2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी उम्मीदवार मीनाक्षी लेखी ने आम आदमी पार्टी (आप) उम्मीदवार आशीष खेतान को लगभग 1.62 लाख वोटों से हराकर इस सीट पर फिर से पार्टी का कब्जा किया। वहीं तत्कालीन सांसद अजय माकन तीसरे स्थान पर रहे।

2019 के चुनाव में तत्कालीन सांसद मीनाक्षी लेखी ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन को लगभग 2 लाख 56 हजार वोटों से हराकर दूसरी बार विजय प्राप्त की। जबकि आम आदमी पार्टी प्रत्याशी बृजेश गोयल तीसरे स्थान पर रहे।

2024: नए उम्मीदवार मैदान में

बीजेपी ने दो बार की सांसद मीनाक्षी लेखी को हटाकर इस बार स्वर्गीय सुषमा स्वराज की पुत्री बांसुरी स्वराज को अपना उम्मीदवार बनाया है। जबकि 'इंडिया' गठबंधन में इस सीट पर आम आदमी पार्टी ने सोमनाथ भारती को बीजेपी के सामने मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि क्या बीजेपी यहां अपनी हैट्रिक लगा पाती है या 'इंडिया' गठबंधन बीजेपी से इस सीट को छीनने में सफल होती है।

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