फिल्‍म, विज्ञापन के बाद अब राजनीति भी मां की शरण में

Rahul Gandhi Narendra Modi
[ईश्‍वर आशीष] विज्ञापन के एक सीन में बच्‍चा गंदे कपड़ों के साथ घर आता है लेकिन मां उसे डांटती नहीं है बल्कि पुचकारती है, क्‍योंकि उसके पास है ऐसा डिटरर्जेंट जो मुश्किल से मुश्किल दाग को भी झट से निकाल देगा, मतलब बच्‍चों को कपड़ों की परवाह किये बिना खुलकर खेलने का पूरा मौका 'मां' देती है। इस विज्ञापन में और ऐसे ही कई विज्ञापनों में मां को संवेदनशील, बच्‍चे को स्‍वतंत्रता देने वाली और एक प्‍यार भरी शख्सियत के रूप में प्रस्‍तुत किया जाता है, जो सभी को प्रभावित करता है।

राजनीति में बोले गये कुछ संवाद, 'मेरी मां ने कहा 'सत्‍ता जहर है। जब बेटा कमाने के लिए गुजरात जा रहा होता है तो मां बार बार फोन कर पूछती है कि बेटा कहां पहुंचे? जब बेटा कहता है कि मैं गुजरात पहुंच गया तो 'मां चैन की सांस लेती है।' गरीब के घर में बच्‍चे भूखे सोते हैं, मां रोती है। बेशक अभी तक मां की बेबसी और सुरक्षा भाव का प्रदर्शन फिल्‍मों में ही होता रहा है लेकिन अब राजनीति में भी इसका प्रयोग किया जाने लगा है।

अगर विज्ञापन में उत्‍पाद बेचने और इसकी श्रेष्‍ठता साबित करने के लिए मां को बतौर ब्रांड प्रस्‍तु‍त किया जा सकता है तो राजनीति में क्‍यों नहीं, संभवत: राजनेताओं को यह बात समझ में आ चुकी है कि भारतीय स्‍वभाव से ही भावुक होते हैं और मां ही वह चरित्र है जिससे कि हर किसी की संवेदनाएं जुड़ जाती हैं। फिल्‍मों में एक भावानात्‍मक, परवाह करने वाली और समय के बदलाव के साथ एक पढ़ी लिखी और आधुनिक मां ने अपनी जगह बनाई हैं लेकिन असल जिंदगी में हर महिला को कब वह स्‍थान मिल सकेगा जिस सांचे में रखकर आधुनिक महिला की कल्‍पना की जाती है, यह तो वक्‍त ही बताएगा, पर राजनीति में मां की महत्‍ता का राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक वर्णन कर रहे हैं।

मोदी ने अपनी कानपुर रैली, झांसी रैली में उत्‍तर प्रदेश की गरीबी और कुशासन को प्रमुखता से उभारा और विश्‍वास दिलाया कि भाजपा ही जनता को मुश्किलों से मुक्ति दिला सकती है साथ ही इसका भी वादा किया कि अगर पांच साल के लिए जनता भाजपा को चुनती है तो देश की तस्‍वीर बदल जाएगी। जबकि राहुल ने अपने भाषणों से जताने की कोशिश की है कि वह और उनका परिवार देश की भलाई के लिए ही कुर्बानी देता चला आया है, उन्‍होने तो अपने पिता राजीव और दादीइंदिरा की हत्‍या तक का जिक्र कर डाला। अब ये तो वक्‍त ही बताएगा कि जनता किस नेता की भावनाओं को तरजीह देती है, पर इतना तो साफ है कि 'मां' वो चरित्र हैं जिसे फिल्‍म, विज्ञापन और राजनीति प्रत्‍येक जगह प्रमुखता दी गई हैं।

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