Adiguru Shankaracharya: भारतीय एकता और अखंडता के प्रतीक हैं आदिगुरु शंकराचार्य

आदिगुरु शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म सहित अपने समय की विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं के ज्ञाताओं से धार्मिक संवाद किया और शास्त्रार्थ में कुछ उल्लेखनीय लोगों को सार्वजनिक रूप से हराया।

aadi shankaracharya

आज आदिगुरु शंकराचार्य का जन्मोत्सव है। वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आदिगुरु शंकराचार्य जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। बचपन से ही शंकराचार्य का रुझान संन्यासी जीवन की तरफ था। पर उनकी मां नहीं चाहती थीं कि वह संन्यासी बने। इसकी भी एक रोचक कहानी है कि कैसे उन्होंने अपनी मां को मनाया और संन्यास धारण किया। एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने बालक शंकर का पैर पकड़ लिया। तब इसका फायदा उठाते शंकर ने अपनी मां से कहा कि मां मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जायेगा। अब मगरमच्छ बेटे को खा जाए इस बात से भयभीत होकर माता ने तुरंत बालक शंकर जी को संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी और आश्चर्य की बात है कि जैसे ही माता ने आज्ञा दी, ठीक वैसे ही तुरन्त मगरमच्छ ने शंकर का पैर छोड़ दिया। इसके बाद बालक शंकर ने गोविन्द नाथ से दीक्षा लेकर संन्यास ग्रहण किया।

धार्मिक विद्वानों से शास्त्रार्थ
आदि शंकराचार्य हिन्दुत्व के प्रतिबिंब थे। बौद्ध धर्म का उदय भी हिन्दू धर्म से ही हुआ था। हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों, कुप्रथाओं, अंधविश्वास, ऊंच-नीच और असमानता के खिलाफ बौद्ध धर्म ने आवाज उठाई थी। इसके बाद से बौद्ध धर्म समाज में लोकप्रिय होने लगा था। आदि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म सहित अपने समय की विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं के ज्ञानी जनों से धार्मिक वाद-विवाद किया और शास्त्रार्थ में कुछ उल्लेखनीय लोगों को सार्वजनिक रूप से हराया। यद्यपि अद्वैत के आज के अनुयायी मानते हैं कि शंकराचार्य ने व्यक्तिगत रूप से बौद्धों के खिलाफ तर्क दिया हो पर शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन के साथ-साथ मीमांसा, सांख्य, न्याय, वैशेषिक और योग विद्वानों के साथ भी बहस की उतनी ही उत्सुकता से मांग की थी जितनी बौद्ध विद्वानों के साथ।

भारत को धार्मिक आधार पर जोड़ा
निराकार ब्रह्म और मिथ्या जगत की बात करते हुए शंकराचार्य 12 ज्योतिर्लिंगों, 18 शक्तिपीठों और चार विष्णुधामों की ऐसी तीर्थयात्रा पर निकले जो मिलकर भारत को एक करने का काम करती थी। शंकराचार्य केरल से कश्मीर, पुरी से द्वारका, श्रृंगेरी (कर्नाटक) से बद्रीनाथ (उत्तराखंड) और कांची (तमिलनाडु) से काशी तक घूमे। हिमालय की तराई से नर्मदा-गंगा के तटों तक और पूर्व से लेकर पश्चिम के घाटों तक उन्होंने यात्राएं कीं। शंकराचार्य एक ऐसे राजनैतिक संत के तौर पर भी स्थापित होते हैं, जिसने एक बड़े भू-भाग को एक सूत्र में पिरोने में मदद की।

कुंभ मेले की शुरुआत
वहीं कुंभ मेले को लेकर माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी। वहीं कुछ कथाओं में बताया जाता है कि कुंभ का आयोजन समुद्र मंथन से ही हो गया था। कुछ विद्वान गुप्तकाल से इसकी शुरुआत मानते हैं। पर कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य और उनके शिष्यों ने सन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर शाही स्नान की व्यवस्था की थी, जिसे कुंभ कहा जाता है। कुम्भ में साधु संतों के अखाड़ों की विशेष शोभा यात्राएं निकलती हैं। दरअसल 'अखाड़ा' शब्द 'अखण्ड' से बना है यानी विभाजित न होने वाला। कहते हैं अखाड़े बनाने की शुरूआत आदिगुरु शंकराचार्य के समय हुई। शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिये सभी साधुओं के छोटे-छोटे समूहों को मिलाने या एक करने की कोशिशें की थी। उनके ही प्रयासों का नतीजा था कि अलग-अलग परम्पराओं व विश्वासों को मानने वाले सभी संत एकजुट हुए और अखाड़ों की स्थापना हुई।

चारों दिशाओं में मठों की स्थापना
सनातन धर्म में मठ परंपरा को लाने का श्रेय आदि शंकराचार्य को जाता है। आदि शंकराचार्य नें चारों दिशाओं में अलग-अलग चार मठों की स्थापना की थी। ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परम्परा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। इसमें पूर्व दिशा में गोवर्धन, जगन्नाथपुरी (ओड़िशा), पश्चिम दिशा में शारदामठ, द्वारका (गुजरात), उत्तर दिशा में ज्योतिर्मठ, बद्रीधाम (उत्तराखंड) और दक्षिण दिशा में शृंगेरी मठ, रामेश्वरम (तमिलनाडु) में स्थापित हैं। जो भी इन मठों का मठाधीश बनता है वह शंकराचार्य कहलाता है और अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बना देता है।

नारी के बारे में कैसे जाना
वैसे तो आदिगुरु शंकराचार्य आजीवन ब्रह्मचारी थे, परंतु एक बार मंडन मिश्र से बहस के दौरान मंडन मिश्र की पत्नी भारती के एक गृहस्थ जीवन से जुड़े प्रश्न का वे उत्तर नहीं दे पाए। ऐसे में भारती ने उन्हें महिलाओं को समझने के लिए 100 दिन का समय दिया। इसके बाद शंकराचार्य ने एक राजा के शरीर में अपनी आत्मा का प्रवेश करके गृहस्थ जीवन के बारे में ज्ञान प्राप्त किया। नारी के बारे में शंकराचार्य ने जो कुछ भी समझा उसे उन्होंने एक श्लोक के रूप में लिख लिया। इस तरह 100 श्लोकों में एक पुस्तक लिख ली गईं। शंकराचार्य ने ये श्लोक राजा अमरुक के नाम कर दिए क्योंकि उसी के शरीर में रहते हुए उन्होंने यह सब अनुभव किया था। उस पुस्तक को अमरुशतक या अमरुकशतक के नाम से जाना गया।

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