Judges in Politics: न्यायपालिका छोड़ बने राजनेता, मुख्यमंत्री व उपराष्ट्रपति तक का पद इन जजों ने संभाला

Judges in Politics: कलकत्ता हाईकोर्ट के जज अभिजीत गंगोपाध्याय ने मंगलवार (5 मार्च) को अपने पद से इस्तीफा दे दिया और गुरुवार (7 मार्च) को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गए। बीते सोमवार को उनका आखिरी फैसला ईस्ट मेदिनीपुर जिले के एक जज को बर्खास्त करने से संबंधित था।

वैसे दिलचस्प संयोग ये है कि उन्होंने जिस मेदिनीपुर जिले से संबंधित फैसला सुनाया है, उसी जिले से उनकी नई राजनीतिक पारी शुरू होने के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि, किसी न्यायाधीश द्वारा ज्यूडिशियरी छोड़कर राजनीति में हाथ आजमाने का ये कोई पहला मामला नहीं है।

Judges who enter in indian Politics

अभिजीत गंगोपाध्याय से पहले जस्टिस बहरुल इस्लाम, जस्टिस विजय बहुगुणा, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस हिदायतुल्‍ला, जस्टिस रंगनाथ मिश्रा समेत दर्जनों ऐसे न्यायाधीश थे, जो जज से राजनेता बने। संवैधानिक रूप से ये कोई गलत कदम नहीं है, क्योंकि पद छोड़ने के बाद जजों के ऐसा करने पर कोई कानूनी रोक या पाबंदी नहीं है। इसकी शुरुआत देश आजाद होने के बाद से ही कांग्रेस सरकारों द्वारा शुरू की गई थी।

जस्टिस बहरुल इस्लाम

जस्टिस बहरुल इस्लाम साल 1956 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। कांग्रेस ने उन्हें 1962 से 1972 तक सांसद के रूप में राज्यसभा भेजा। उसके बाद सरकार (तब कॉलेजियम प्रणाली नहीं थी और कार्यपालिका ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करती थी) ने उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त किया।

सरकार ने उन्हें 1979 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया। इसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। साल 1983 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस ने उन्हें असम में बारपेटा सीट से उम्मीदवार बनाकर उतारा। लेकिन, तब असम आंदोलन के कारण चुनाव टल गया और कांग्रेस ने उन्हें 1984 में सांसद के रूप में राज्यसभा भेज दिया।

जस्टिस मुहम्मद हिदायतुल्लाह

जस्टिस मुहम्मद हिदायतुल्लाह 25 फरवरी 1968 से 16 दिसंबर 1970 तक भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) के रूप में कार्यरत रहे। इसके बाद में उन्होंने 31 अगस्त 1979 से 30 अगस्त 1984 तक भारत के छठे उपराष्ट्रपति के रूप में भी कार्य किया। इतना ही नहीं जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह इलाज के लिए अमेरिका गए तो इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति भी बनाया गया।

जस्टिस खान बहादुर सैयद सर फजल अली

जस्टिस फजल अली देश में संविधान लागू होने के साथ ही 26 जनवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने। मई 1952 में जब सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस फजल अली काम ही कर रहे थे कि तत्कालीन पीएम नेहरू ने उन्हें उड़ीसा का राज्यपाल नियुक्त करने की घोषणा कर दी।

जस्टिस फजल अली ने 30 मई 1952 को सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर त्याग पत्र दे दिया और महज आठ दिन के अंदर 7 जून 1952 से उड़ीसा के राज्यपाल के तौर पर कामकाज संभाल लिया। जस्टिस अली पहले 1952 से 1954 तक ओडिशा के और फिर 1956 से 1959 तक असम के राज्यपाल रहे।

जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होने से पहले जस्टिस अय्यर एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। वह 1952 में थालास्सेरी से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में मद्रास विधानसभा के लिए चुने गए और जब उन्होंने 1957 में उसी सीट से दोबारा चुनाव लड़ा, तो उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन प्राप्त हुआ।

अय्यर ने 1957 और 1959 के बीच ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार में मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने 1965 में फिर से विधानसभा चुनाव लड़ा जिसमें वे हार गये। इसके बाद केंद्र सरकार ने उन्हें 1968 में केरल हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया और बाद में उन्हें 1973 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।

जस्टिस के. एस. हेगड़े

जस्टिस के. एस. हेगड़े 17 जुलाई 1967 से 30 अप्रैल 1973 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहे। अप्रैल 1973 में जब उनसे जूनियर रहे उनके एक सहयोगी को भारत का सीजेआई नियुक्त किया गया तब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर बैंगलोर दक्षिण सीट से चुनाव जीतकर वे छठी लोकसभा के लिए चुने गए। जस्टिस हेगड़े 21 जुलाई 1977 को लोकसभा के अध्यक्ष भी बने।

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा भारत के 21वें मुख्य न्यायाधीश थे। वो 25 सितंबर 1990 से 24 नवंबर 1991 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे। अपनी सेवानिवृति के बाद जस्टिस मिश्रा 1993 से 1996 तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष रहे। इसके बाद 1998 में उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया।

जस्टिस मीरा साहिब फातिमा बीबी

जस्टिस मीरा साहिब फातिमा बीबी देश की उच्च न्यायपालिका में पहली मुस्लिम महिला और किसी एशियाई देश में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनने वाली पहली महिला थीं। वो 1980 में आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल की न्यायिक सदस्य रही और 8 अप्रैल 1983 को उनको केरल उच्च न्यायालय में जज बनाया गया। इसके बाद 6 अक्टूबर 1989 से 24 अप्रैल 1992 तक सुप्रीम कोर्ट की न्यायधीश रहीं। सेवानिवृत्ति के बाद वो 3 नवंबर 1993 से 24 जनवरी 1997 तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सदस्य रहीं। इसके बाद साल 1997 में एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया।

जस्टिस विजय बहुगुणा

इलाहाबाद और बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके विजय बहुगुणा एक ऐसे जज थे, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। जस्टिस विजय बहुगुणा ने फरवरी, 1995 में जज के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद पिता हेमवती नंदन बहुगुणा की विरासत संभालते हुए वे राजनीति में आ गए।

विजय बहुगुणा ने 1997 में पहला चुनाव कांग्रेस के ट‍िकट से ट‍िहरी लोकसभा से लड़ा और हार गए। इसके बाद उन्हें लगातार 3 चुनावों (1998, 99 और 2004) में भी हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद 2007 में टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की और पहली बार लोकसभा पहुंचे। वह 2009 में दूसरी बार इस सीट से कांग्रेस के ट‍िकट पर लोकसभा पहुंचे। इसी दौरान जब 2012 के चुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस को बहुमत मिला तब कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। वे तकरीबन 2 साल तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे।

जस्टिस एम. रामा जोइस

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति एम. रामा जोइस अपनी सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा के सदस्य बने। वह 2002 से 2004 तक झारखंड और बिहार के राज्यपाल भी रहे। न्यायपालिका से सेवानिवृत्त होने के बाद आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे।

जस्टिस रंजन गोगोई

जस्टिस रंजन गोगोई 3 अक्टूबर 2018 से 17 नवंबर 2019 तक भारत के 46वें मुख्य न्यायाधीश थे। अपनी सेवानिवृत्ति के करीब 4 महीने बाद ही बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाकर भेजा। कांग्रेस ने रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनित करने के फैसले को भारतीय न्यायपालिका का अपमान बताया था। तब कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अतीत में कांग्रेस सरकारों द्वारा कई जजों को राज्यसभा व राज्यपाल बनाकर भेजने की परंपरा का जिक्र करते हुए गोगोई का बचाव किया था।

जस्टिस हसनैन मसूदी

हसनैन मसूदी 2009 से 2016 तक जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। साल 2015 में उन्होंने ही फैसला दिया था कि अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का स्थायी हिस्सा है। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, वे नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी में शामिल हो गए और अनंतनाग से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा और अब सांसद हैं।

जस्टिस पलानीस्वामी सदाशिवम

जस्टिस पी. सदाशिवम 19 जुलाई 2013 से 26 अप्रैल 2014 तक भारत के 40वें मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे। सदाशिवम ने सेवानिवृति के 5 महीने बाद ही केरल के राज्यपाल के रूप में पदभार ले लिया था। तब कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने के कदम की तीखी आलोचना की थी।

जस्टिस सैयद अब्दुल नजीर

जस्टिस सैयद अब्दुल नजीर 17 फरवरी 2017 से 4 जनवरी 2023 तक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे। उनकी सेवानिवृत्ति के एक महीने बाद ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त कर दिया था। जस्टिस अब्दुल नजीर कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे, जिनमें ट्रिपल तलाक केस, अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद केस, नोटबंदी केस और निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार शामिल हैं।

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