Review: मेलोड्रामा 'वनवास' को नाना पाटेकर की एक्टिंग ने बचाया, इमोशनल कहानी में रोना नहीं याद आता है सोना

कास्ट- नाना पाटेकर, उत्कर्ष शर्मा, सिमरत कौर, अश्विनी कलसेकर और राजपाल यादव

डायरेक्टर- अनिल शर्मा

रेटिग्स- 2.5 स्टार

एक सतयुग था जब राजा राम अपने पिता के आज्ञा मानकर वनवास को चले गए थे। उन्होंने अपने पिता से एक सवाल नहीं किया था। अब जमाना कलयुग का है। जहां मां बाप ही उनके बच्चों को बोझ लगने लगे हैं। यही कारण है कि अब की तीर्थस्थलों में सैकड़ों की संख्या में बुजुर्ग मिल जाते हैं। वृद्धाश्रम भी खाली नहीं रह गए हैं। बच्चे विदेश में रह रहे हैं, मां-बाप का ख्याल नहीं रख पाएंगे छोड़ दो वृद्धाश्रम में। इसी विषय पर गदर वाले अनिल शर्मा अपनी फिल्म वनवास लेकर आए हैं।

Vanvaas movie Review in hindi by shashank

पिता से पीछा छुड़ाने की कहानी
कहानी है दीपक त्यागी की, जो NDRF में बड़ा अफसर रहता है। पालमपुर में अपने सपनो का घर बनाता है, जिसका नाम रखता है विमला सदन। मतलब बीवी के नाम पर। तीन बच्चे हैं दोनों के, लेकिन मां के गुजर जाने के बाद पिता जी को याद्दाश्त भूलने की बीमारी हो गई। जिसके बाद उसके बेटे बहू उससे छुटकारा पाना चाहते हैं। जिसके बाद वो फैसला लेते हैं कि पिता को सभी बनारस में छोड़ आएंगे। बाद में लोगों को कह देंगे कि वो खो गए। होता भी ऐसा है। लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहीं पर आता है। जिसके लिए फिल्म देखना बेहतर विकल्प होगा। अगर मैं कहानी बताऊंगा तो स्पॉइलर की श्रेणी में आएगा।

नाना पाटेकर का अच्छा काम
नाना पाटेकर को लंबे समय बाद स्क्रीन पर देखना सुखद अनुभव है। उनके अंदर कुछ करने की चाहत है, जो पूरे फिल्म में उनके अभिनय से दिखती है। इस उम्र में भी उन्होंने बड़ा सधा हुआ काम किया है। पूरी फिल्म उनके ही कंधों पर टिकी हुई है। इमोशनल और एक्शन अवतार में भी अच्छे दिखते हैं। उनके आगे सब फीके से भी दिखते हैं। उत्कर्ष शर्मा को अभी भी मेहनत को करने की जरूरत है। खासकर किरदार और उसकी बोली सीखने की। बनारस का आदमी है तो, हर बात पर किसी अनजान आदमी को अरे ओ साहब नहीं बोल सकता। क्योंकि असल में वहां को कई आदमी ऐसे बात बात पर ये लाइन नहीं बोलता है। बतौर हीरो वो ठीक हैं, लेकिन एक्टर के रूप में उन्हें और निखरने की जरूरत है। बनारस के रंग ढंग को वो इस फिल्म के किरदार में नहीं बसा पाए हैं। सिमरत कौर का काम ठीक है, लेकिन उन्होंने भी यादगार काम नहीं किया है। मौसी के किरदार में अश्विनी कलसेकर ने थोड़ी छाप छोड़ने की कोशिश की है, लेकिन स्क्रीन स्पेस भी उन्हें कम मिला है। राजपाल यादव कई सीन में हंसाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कोई भी पंच लाइन उनके हिस्से नहीं आई है।

रबड़ सी खिंचती फिल्म की कहानी
फिल्म को अनिल शर्मा ने अमजद अली और सुनील सिरवैया के साथ मिलकर लिखा है। तीन लोगों की टीम ने कहानी का सब्जेक्ट अच्छा चुनने के सिवा कोई भी अच्छा काम नहीं किया है। कहानी बहुत की कमजोर लिखी है। जिसकी वजह से फिल्म बहुत बोझिल हो जाती है। मेलोड्रामा को इतनी जगह दी है, जितनी जरूरत भी नहीं थी। आलम ये हो जाता है कि ना चाहते हुए भी फोन पर टाइम देखना पड़ता है। डायरेक्शन के लिहाज से अनिल का काम ठीक है। वो अपनी फिल्मों में जिस हिसाब के रंगो-रंगत दिखाना चाहते हैं, उसमें कामयाब होते हैं।

बोझिल फिल्म, अपनी रिस्क पर देखें
2 घंट 40 मिनट की वनवास में अगर नाना पाटेकर की एक्टिंग छोड़ दें, तो फिल्म बहुत ही बोझिल बनती है। इसकी कहानी रबड़ की तरह खिंची हुई लगती है। जो आपको थोड़ा बोर करती है। फिल्म का सब्जेक्ट बहुत बढ़िया हैं, लेकिन इस इमोशनल कहानी में आपको रोना नहीं सोना आता है। इस फल्म को आप अपनी रिस्क में देख सकते हैं। मेरी बात यहीं तक, आप फिल्म देखिए और अपनी राय बनाइए।

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