Sikandar Movie Review: सलमान खान के फैंस की भावनाएं आहत करने की कोशिश नहीं की गई है, ईद और गुड़ी पड़वा की बधाई
मूवी रिव्यू- सिकंदर
कास्ट- सलमान खान, रश्मिका, सत्यराज, काजल अग्रवाल, प्रतीक बब्बर, शरमन जोशी और जतिन सरना
डायरेक्टर- ए आर मुरुगादॉस
रेटिंग्स- 2 स्टार्स
*इस रिव्यू में सलमान खान के फैंस की भावनाएं आहत करने की कोशिश नहीं की गई है*

Sikandar Movie Review: एक था राजा एक थी रानी दोनों मर गए, खत्म हुई कहानी। अब जाओ सो जाओ। बचपन में हम सब ये बात तब सुनते थे, जब किसी से कहानी सुनाने के लिए कहते। तब हमें ये लाइन सुनाई जाती और सुला दिया जाता। हम सो भी जाते थे। लेकिन....लेकिन....लेकिन अब बड़े हो गए,कहानी तो नहीं सुनने को मिलतीं, देखने को मिलती हैं। फिल्मों की भाषा में। आज ऐसी ही राजा रानी की कहानी देखी, लेकिन रानी के मरने के बाद न कहानी खत्म हुई और न हमें नींद आ रही। ऐसा क्या देख लिया हमने? आपको भी उसके काले साए से अपने रिव्यू के माध्यम से परिचय करवा देते हैं।
कहानी ने काम पर कहीं से उठाया कहीं पर लगाया
फिल्म सिकंदर देखने गए थे, पहले दिन पहला शो। देखने को 1 घंटे बाद फिल्म का रिव्यू लिखने की हिम्मत कर पाया हूं। खै़र अपना दुखड़ा बाद में सुनाता हूं आप फिल्म के बारे जानिए। फ्रेम खुलता है प्लेन में बोर्डिंग हो रही है। बिजनेस क्लास में एक महिला अपने बच्चे के साथ बैठी है। तभी वहां एक लड़का आता है और कहता मैंने आपको कहीं देखा है। लड़का महिला से बद्तमीजी करता है, इसी बीच एंट्री होती है सिंकदर, संजय और राजा साहब के नाम से पहचाने जाने वाले इंसान से। वो सबक सिखाता है। बाद में पता चलता है कि वो लड़का अर्जुन मिनिस्टर के बेटा है और राजा साहब राजकोट के राजा हैं। मिनिस्टर का बेटा बेइज्जती का बदला लेना चाहता है, जिसके चलते मिनिस्टर के गुंडे संजय के पीछे पड़ जाते हैं। इसी बीच एंट्री होती है रानी साहिबा साईंश्री की। जिसे वो खो देता है, लेकिन उसने अपने ऑर्गन डोनेट किए हैं। इसलिए दूसरों की जान में जिंदा रहती है। अब गुंडे संजय के साथ इन तीनों के पीछे भी पड़ जाते हैं। मोटा माटी यही कहानी जो, रानी के मरने पर खत्म नहीं होती है।
एक्टिंग का तो नाम भी मत लो भैया
सिकंदर, राजा साहब और संजय राजकोट इन सभी का किरदार सलमान खान ने निभाया है। जिसमें वो बहुत अच्छे नहीं लगे हैं। ऐसा लग रहा है कि वो थक गए हैं। एक्शन के मामले में उन्होंने खूब मारधाड़ की है। लेकिन उनके द्वारा बोले गए डायलॉग्स में कोई जान नहीं है। पंचेस भी लैंड नहीं हो पाते हैं। यहां वो उनका काम बिल्कुल किसी का भाई किसी की जान जैसा है। सलमान ने अपने डायलॉग डब किए हैं, वो भी सुनने में ऐसे लगते हैं कि जबरदस्ती किए हैं। उन्होंने इमोशन दिखाने की भी भरपूर कोशिश की है। रश्मिका उनकी पत्नी के किरदार में हैं। कम स्क्रीनटाइम है, लेकिन फिर भी ठीक काम करने की कोशिश है। बाकी उनसे भी अब एक्टिंग होती नहीं है, कास्ट क्यों किया जा रहा है भगवान मालिक है। सत्यराज और प्रतीक बब्बर ने अपने हिस्से का काम भी ठीक-ठाक किया है। शरमन जोशी अपने रोल में बिल्कुल भी फिट नहीं बैठते हैं। जतिन सरना जिन्होंने इस फिल्म टैक्सी ड्राइवर का रोल निभाया है, वो शानदार हैं। उन्हें फिल्म में देखा जा सकता है। जतिन ने अपने रोल से थोड़ा हंसाते भी हैं। बाकी कास्ट ने भी ठीक ठाक किया है।
दलाल बंधुंओ को कुछ दिन अच्छा काम देखने की जरूरत
सिकंदर को ए आर मुरुगादॉस , रजत अरोड़ा , हुसैन दलाल और अब्बास दलाल ने लिखा है। इतने हांथ होने के बाद भी उनका काम फीका है। फिल्म देखने के बाद लग रहा है कि इसका बेसिक आइडिया सलमान की 2014 में आई फिल्म 'जय हो' से लिया है। इसके बाद बचा हुआ अल्फा मर्द वाला आइडिया रणबीर कपूर की 'एनिमल' से लिया है। इन सबको क्लब करके सिकंदर बना दी, जिसमें थोड़ा सा इमोशन और थोड़ा एक्शन डाल दिया। सलमान ने भले ही 'बजरंगी भाईजान' के बाद एक्टिंग फिल्मों में नहीं की है। लेकिन कोई उनसे करवाना भी चाहता है। कई बार कांच के टुकड़े भी इतने नहीं बिखरे होते, जितनी सिकंदर की कहानी है। हुसैन दलाल, अब्बास दलाल को अपने शब्दकोश में कुछ नई चीजें जोड़ना चाहिए। साथ ही वो आराम कर के कुछ अच्छी फिल्में देखें। क्योंकि इस फिल्म में भी नहीं हो पाया उनसे।
नहीं बनाते फिल्म तो, दर्शक बच जाते
एआर मुरुगादॉस ने गजनी बनाई थी, इसके बाद वो भी अपने करियर के लिए अच्छी फिल्म खोज रहे हैं। गजनी के बाद हॉलीडे और अकीरा अब सिकंदर। अगर ये फिल्में नहीं भी बनाते तो कुछ नुकसान नहीं होता। बस ये होता कि हम एक बुरी पिक्चर देखने से बच जाते। उन्होंने इस फिल्म में खूब झामा क्रिएट किए और एक्टर्स भी कास्ट किए। लेकिन कुछ नहीं करवा सके, सिवाय ओवरएक्टिंग के। इस फिल्म में एक आयकॉनिक गाने को भी खराब किया गया है। ए आर काम देख आप भी शायद उन्हें माफ नहीं कर पाएं। बाकी सलमान भाई की बात ही अलग है।
भाई के फैंस भी निराश!
सलमान की फिल्मों की एक खासियत रही है, फिल्म चाहे 'रेस 3', 'दबंग 3' या फिर 'किसी का भाई किसी की जान' हो। इनके सुबह के शो में भी दर्शकों की तादात देखने को मिलती थी। लेकिन सिकंदर का ये आलम है कि मुझे मिलाकर सिनेमाघर में करीब 15-17 लोग रहे होंगे। इसी से अंदाजा लगा लीजिए फिल्म के बज और सलमान खान से दर्शकों उम्मीदों का। ख़ैर अपन ने शुरुआत से लेकर अभी तक बहुत खरी-खरी बात कर दी है। हालांकि ये सच भी है। वैसे नेटफ्लिक्स पर आने वाली है अगले 1-2 महीने में। बाकी सलमान खान के सचमुच फैन हैं तो आपको फिल्म पसंद आएगी। ख़ैर, मेरी बात यहीं तक अब आपको फिल्म देखने जाना है या नहीं, ये आपके विवेक पर है।
हिंदू नव वर्ष और गुड़ी पड़वा की शुभकानाएं, ईद की मुबारकबाद के साथ।












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