Review: 'छावा' को साल की महान फिल्म बताने वाले रिव्यू पढ़ थक गए, ठहरिए जल पीजिए और असलियत जानिए; क्योंकि हक है

Chhava Review In Hindi: साल 2025 और विक्की कौशल के करियर की सबसे बड़ी फिल्म रिलीज हो गई है। फिल्म के रिव्यूज भी सामने आ गए हैं। कुछ इस फिल्म और विक्की की एक्टिंग को कालजयी बता रहे हैं। कुछ इसे 'ऐसा सिनेमा जरूर बनना चाहिए' कह रहे हैं। हमने भी सोचा कि जब इतना सबकुछ इस 'छावा' में हैं तो हमें भी देखना चाहिए। बिना देर करते हुए हम भोरे-भोरे सिनेमाघर पहुंच गए। यहां हमें बस कुछ यानी 5-7 सिनेमा रसिक मिले। ख़ैर फिल्म शुरू हुई। तो हमने अपने क्रिटिक धर्म निर्वाहन करते हुए, शांति से फिल्म देखनी शुरू कर दी। अब कुछ समय आपको फिल्म पर कुछ नोट पढ़ने को मिलेंगे। इस दौरान मैं काफी शालीन बना रहूंगा, क्योंकि हाल ही में कुछ लोगों पर मुकदमा हो चुका है।

फिल्म 'छावा' की कहानी छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद से शुरू होती। उनके जाने के बाद औरंजेब दक्कन पर कब्जा करना चाहता है। क्योंकि उसे लगता है कि मराठा साम्राज्य अब कमजोर हो गया है। लेकिन उसके सामने छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज एक चुनौती के रूप में सामने आते हैं। तब वो ये भी कसम खाता है कि जब तक छत्रपति संभाजी महाराज को नहीं मारता मुकुट नहीं पहनेगा। यही फिल्म की मोटा माटी कहानी है।

Chhava Review In Hindi

धमाधम एक्शन सीक्वेंस भी नहीं दे पाते मजबूती

छावा की पहली कमजोर कड़ी ये है कि इसे भव्य बनाने की कोशिश की गई। लेकिन बना नहीं पाए। इस वजह से फिल्म हिस्टॉरिकल की जगह एक स्लाइडशो सरीखे लगती है। क्योंकि इसमें कुछ एक्यूरेसी की कमी है। आजकल फिल्में एक कहानी कहने के लिहाज से नहीं बल्कि सीक्वेंस के हिसाब से बनाते हैं। जैसे ओपनिंग सीक्वेंस, फिर आता है लीड एक्टर या हीरो की एंट्री सीक्वेंस, इसके बाद प्री इंटरवल सीक्वेंस और क्लाइमैक्स। बस 'छावा' के मेकर्स भी इसी जाल में फंसते नजर आए। उदाहरण के लिए 'छावा' में इंटरवल होता है और धमाधम फाइट सीक्वेंस आते हैं। मार धाड़ खून खराबा जिसे खूब महीन तरीके से बनाने की कोशिश की गई। इन्हें देखकर आपको मजा आएगा, लेकिन इन सीक्वेंस से फिल्म पर कुछ असर नहीं पड़ता है। वो मजूबत नहीं बना पाते हैं।

रश्मिका क्यों डायरेक्टर से है ये सवाल

ख़ैर आगे बढ़ते हुए विक्की और रश्मिका के अभिनय की बात कर लेते हैं। संभाजी महाराज का रोल विक्की कौशल ने निभाया है। बतौर एक्टर विक्की की एक्टिंग रेंज हम मसान, उरी, जरा हटके जरा बचके और सैम बहादुर में देख चुके हैं। अलग फिल्म और अभिनय की रेंज बहुत अलग। बतौर एक्टर विक्की के लिए ये एक थोड़ी मुश्किल फिल्म होगी। क्योंकि शारीरिक रूप से उन्होंने इस फिल्म के लिए खूब मेहनत की है। लेकिन एक्टिंग के लिहाज से इस फिल्म को विक्की को एक अलग प्रकार की मेहनत की मांग करती है। जिसमें वो पूरी तरह से सफल होते नहीं नजर आते हैं। 'छावा' को उनके करियर की बेस्ट मसाला फिल्म के दर्जे में रखा जा सकता है। फिल्म की कास्टिंग के दूसरी खामी रश्मिका हैं। उन्हें क्या सोचकर इस फिल्म में लिया गया है, मैं ये कभी डायरेक्टर से जानना चाहूंगा। वो ना होती तो फिल्म और मजबूत हो सकती थी। उनका स्क्रीन पर आना और आपका फिल्म से मन हटना एक बात है। फिल्म को जो नुकसान होगा उसकी एक वजह ये भी होंगी। 'छावा' में ना तो उनकी मराठी एक्सेंट बोला जा रहा और परफॉर्मेंस की बात ना ही करें तो बेहतर है। क्योंकि फिर मुझे अपने आपको शालीनता की कैटेगरी से हटाना पड़ेगा।

कानफोड़ू बैकग्राउंड म्यूजिक, जो उठने को करेगा मजबूर

म्यूजिक फिल्म का ए आर रहमान ने बनाया है। फिल्म में गाने भले ही कम हैं, स्क्रीन टाइम पर एक ही गाना है। जितने भी हैं अच्छे हैं। लेकिन बैक ग्राउंड स्कोर खूब कानफोड़ू है। आपके कानों में करकस पैदा करता है। ये सिलसिला फिल्म की शुरुआत से ही शुरू हो जाता है। शुरुआत में तो इतना तेज है कि आप सिनेमाघर से बाहर भी जाना चाहोगे। ये भी इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी हैं।

15 अच्छा तो नहीं भूली जाएंगीं 2 घंटे 35 मिनट की खामियां

डायरेक्शन लक्ष्मण उटेकर ने किया है। वो सिनेमैटोग्राफर से डायरेक्टर बने हैं। हालांकि इसकी सिनेमैटोग्राफी उन्होंने सौरभ गोस्वामी से करवाई है। 'छावा' में लक्ष्मण ने एक काम सबसे अच्छा किया है। वो है इसका क्लाइमैक्स, जिसमें उन्होंने जान झोंकी है। यहां सबकुछ दुरुस्त है, कैमरा वर्क से लेकर एक्टर्स की एक्टिंग। इसकी तारीफ बिना किसी शर्त के कर रहा हूं। लेकिन 15 मिनट अच्छा हो तो बाकी के 2 घंटे 35 मिनट की खामियां भूल जाएं। मुझसे तो ऐसा नहीं हो पाएगा। कितना भी जोर जोर से झूठ बोल दो, वो सच नहीं बनेगा।

कालजयी अक्षय खन्ना का अभिनय देगा सुकून

ख़ैर, पूरी फिल्म में मैं बस एक व्यक्ति की तारीफ करने जा रहा हूं। लेकिन हां, आप ये ना समझे कि इसमें मेरा किसी भी प्रकार का पर्सनल लाभ है। बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं। 'छावा' में इकलौता आदमी जो पूरी फिल्म में अलग दिखता है, वो है औरंगजेब यानी अक्षय खन्ना। जिसके सामने सब पानी मांगते नजर आते हैं। क्या क्लास, क्या काम और क्या किरदार पोट्रे किया है। इस बात की चिल्ला चिल्ला कर तारीफ करनी चाहिए। अक्षय का सफर औरंगजेब तक पहुंचने का बहुत लंबा रहा है। ताल के मानव मेहता से हंगामा के जितेंद्र उर्फ जीतू सहाय से होते हुए आतिश कपूर और अब औरंगजेब। पूरी फिल्म की सबसे सटीक कास्टिंग यही है। उनके काम को देखकर ये पता चलता है कि औरंगजेब कितना क्रूर रहा होगा। बमुश्किल डायलॉग के बाद भी अक्षय ने अपने एक्सप्रेशन से जो बोला है, उसे चिल्ला कर भी बताने की जरूरत नहीं है।

चिल्ला चिल्ला कर बोलो फिर सच नहीं बदलेगा

कुल जमा ये बात है कि भले ही इसे किसी ने कालजयी बताई हो या 5 में से पूरे 5 स्टार दिए हों। ये फिल्म भी एक औसत दर्जे का सिनेमा है। 'छावा' ना तो फुल मास सिनेमा बन पाती है और ना ही क्लास सिनेमा। आप उम्मीद लगाए बैठे रहते को कि 'छावा' में बेहतरीन होगा, तो उसका उत्तर सिफर ही मिलता है। मेरी बात यहीं तक फिर मिलेंगे नई फिल्म के साथ। तब आप भी 'छावा' देखिए और अपनी राय बनाइए।

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