Movie Review Be Happy: ये रिव्यू नहीं पत्र है, जो उन्हें खुशी देती हैं, नचवा देती हैं और देती हैं जीने की वजह

Movie Review: Be Happy
एक्टर: अभिषेक बच्चन, इनायत वर्मा, नस्सर, हरलीन सेठी और जॉनी लीवर
निर्देशक: रैमो डीसूजा
रेटिंग- 3.5 स्टार्स

Movie Review: Be Happy अम्मा शब्द याद है. नहीं कोई बात नहीं, मैं बताता हूं। कुछ लोग इसे अपनी इस शब्द से अपनी मां को पुकारते हैं। कुछ अपनी दादी को। मैं दूसरे वालों की श्रेणी में आता हूं। अम्मा हमेशा मेरी ये कहती थीं। मूल धन से ज्यादा प्यारा ब्याज होता है। अर्थात, बेटे या बेटी से ज्यादा प्यारा उनका बेटा या बेटी होती है। ये बात मेरी जेहन में आज भी है। हो सकता है आपकी यादों में भी आपकी अम्मा या दादी की बातें हों। उनके जाने के बाद हमेशा ही उनकी यादें और बातें ध्यान रह जाती हैं। मैं इसलिए कह रहा हूं। क्योंकि मैंने एक फिल्म देखी 'बी हैप्पी' जो इन बातों को याद दिलाती है। इसमें एक नाना है, पिता है और बेटी है। आप भी सोचेगें की मैं कहां ये सारी बातें आपको बता रहा हूं। लेकिन मैं आपको एक यात्रा में ले चलता हूं। चलिए कोशिश करता हूं कि आप अंत तक उससे जुड़े रहें और याद रखें। क्योंकि मैंने आपको पहले ही कह दिया है, ये रिव्यू नहीं पत्र है।

Movie Review Be Happy

पिता हमेशा हमेशा कठोर होते हैं। ये हमने अपनी जिंदगी और आस पास देखा है। लेकिन वो बेटियों के लिए कभी कठोर नहीं होते हैं। यकीन जानिए मैं आपको अपने अनुभव से कह रहा हूं। ये एक वैसी ही कहानी है। एक पिता उसकी बेटी और नाना की। बेटी जो अभी ब-मुश्किल 8-10 बरस की होगी। पिता बैंक में हैं और नाना उसी बैंक में मैनेजर। लेकिन बेटी के सपने अलग हैं। उसे स्पॉटलाइट दिखती है। जिसमें वो सेंटर स्टेज पर खड़ी होती है और वहां उसे दिखती है दुनिया की तालियां और पिता के लिए इज्जत। इस सपने में उसे अपने नाना का सपोर्ट मिलता है। क्योंकि पिता तो ठहरा पिता। अंदर से नारियल के तरह नर्म और बाहर से कठोर। उसका कहना है कि तुम इंडिपेंडेंट बनों। तुम्हारी मां भी यही चाहती थीं। अब इंडिपेंडेंट कैसे बन सकती हो। पढ़ाई से। इससे तुम दुनिया को कदमों में ला सकती हो। बेटी तो बेटी, चुलबली सी, जिसे डांस आत हैं। और वो उसी को जीना चाहती है। ऐरी गैरी डांसर भी नहीं है। उसे आता है, डांस। अच्छे से। लेकिन पिता तो पिता होते हैं। ख़ैर, किसी प्रकार वो मानते हैं और ले आते हैं उसे सपने के करीब। जहां वो एक डांस कॉम्पटीशन में भाग लेती है। कहानी यहां खत्म नहीं होती, बॉलीवुड फिल्मों की तरह। यहां आता है ट्विस्ट, जिसे देख आपकी रोना शुरू करते हैं। अंत तक। यानी की कहानी की अंत तक। कैसे इसके लिए फिल्म देख लेना। नहीं तो आप ही कहेंगे, कहानी बता दी आपने गुरू।

पिता के रोल में अभिषेक बच्चन हैं। वही, अभिषेक जिनकी पहचान अच्छा काम करने के बाद भी अमिताभ के बेटे की बनी हुई है। क्यों? ये आपसे सवाल है। खैर आपने उन्हें डिस्कवर नहीं किया होगा। करिए। नहीं कर पा रहे हैं तो 'बी हैप्पी' देखिए। सारे भ्रम और सोच मिट जाएगी। इस फिल्म में एक्टिंग के लिए मैं जितना अभिषेक के लिए उतना कम है। फिल्म की कहानी एक बेटी और पिता की है। वो खुद एक बेटी के पिता हैं। उनके अभिनय को देख आपको इस बात का अंदाजा लग जाएगा। धन्यवाद है रैमो डिसूजा का, जिन्होंने अभिषेक को इसके लिए चुना। उनकी नजर को सलाम है। अभिषेक आपको अभी तक आपके अभिनय का ड्यू नहीं मिला। उम्मीद है जल्द मिलेगा। नहीं तो रैमो जैसे निर्देशक हैं आपके पास। इनायत वर्मा इस फिल्म में बेटी हैं। वही, जो रणबीर कपूर की तू झूठी मैं मक्कार में थीं। लेकिन इनायत, तुम कमाल हो। नहीं, ब- कमाल हो यार। तु्म्हारे माता पिता को सलाम जो सिनेमा में तुम्हें लेकर आए। तुमने रुला दिया है। हर उस जगह, जहां मैं चाह कर रोना नहीं चाहता था। नस्सर नाना के रोल में हैं। वो बेहतरीन हैं। ऐसे रोल में देखना, बहुत अच्छा अनुभव है।

फिल्म को लिखा है, रैमो डिसूजा, कनिष्का सिंह देव, तुषार हिरानंदानी और चिराग गर्ग ने। चिराग का नाम आपने अभी दुपहिया नाम की सीरीज में सुना होगा है। ये भी हैं। राइटिंग के लिहाज से फिल्म एक बेहतरीन और कसी हुई कहानी को कहती है। जिसे आपको स्क्रीन में देख मजा और रोना आता है। डायरेक्शन की बात करें तो रैमो ने इस काम को अंजाम दिया है। जो कोरियोग्राफर हैं और ऐसी डांस फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन रैमो ऐसी फिल्मों के लिए नहीं जाने जाते हैं। वो दो बेटों के पिता हैं। इसके बावजूद उन्होंने एक ऐसी मार्मिक कहानी चुनी, उसके लिए साधुवाद। रैमो ने अपना काम बखूबी निभाया है। बतौर डायरेक्टर उन्होंने इस किरदार के लिए अभिषेक को चुना, ये अभी भी समझ के परे है। क्योंकि अभिषेक की एक्टिंग को पहचानना बहुत महीन और बारीक काम है। रैमो आपने भी कमाल किया।

'बी हैप्पी' को एडिट शेरविन बेरनार्ड ने किया है। इसके पहले उन्होंने धूम 3 और भाग मिल्खा भाग का विजुअल एफेक्ट तैयार किया था। लेकिन रैमो ने उनपर भरोसा दिखाया। जिस पर वो खरे उतरे। फिल्म की कास्टिंग रेणुका पुरोहित ने की है। उनके लिए जितनी तालियां बजें उतनी कम हैं। आपने फिल्म में जान डाल दी है दोस्त। मुझे लगता है कि आपकी कास्टिंग के बिना रैमो की ये फिल्म अधूरी है। हर्ष उपाध्याय भाई, तुमने अपने म्यूजिक से रुला दिया। चाहे वो सुल्ताना हो, देवी आई, मेरे पापा या फिर प्राण पिता का। भाई तुमने मजमा लूट लिया। तुमने रुला दिया, जिसमें बहुत कुछ सीख मिल गई।

ख़ैर, रिव्यू पढ़ते वक्त आपको लगा होगा कि यार ये तो भावुक हो गया। ये तो पर्सनल ले गया। हो सकता है, ये खुद एक बेटी का पिता है। खुद प्यार का भूखा है। और ना जाने क्या क्या आपके मन में ख्याल आया होगा। हो सकता है ये भी आया हो कि यार इसने ये क्या लिख दिया। लेकिन आपको मैं बता दूं, ना मैं किसी का पिता हूं और ना मुझे इसके लिए पैसे मिले हैं। पिता इसलिए क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई है। पैसे इसलिए क्योंकि हम कोशिश करते हैं अपने दर्शकों को सटीक बात बता पाएं। इन सबके बीच आपको ये फिल्म देखनी है। जरूर देखनी है। पिता होने के नाते, बेटी होने के नाते, बेटे होने के नाते और भविष्य में पिता होने के नाते। मेरी बात यहीं तक, आप इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो में देखिए और अपनी राय बनाइए।

पिता, आपका प्यार है, सम्मान है, रोटी और मकान है। वो है तो रौनक है, आजादी है और छत है मकान का। जो आपको सिखाता है, आपको हंसना रोना और नाचना। आपके मूड और इच्छा के अनुसार।

अंत में पारितोष त्रिपाठी की ये कुछ पंक्तियां

जो बिना आंसू बिना आवाज के रोता है, वो बाप होता है
जो बच्चों की किस्मत के छेद अपनी बनियान में पहन लेता है, वो बाप होता है
मां रखती है कोख में 9 महीने हमें, पर 9 महीने जो दिमाग में ढोता है, वह बाप होता है
घर में जब सबके नए जूते आते हैं, बाप के तलवे घिस जाते हैं
जो अपनी आंखों में दूसरों के सपने सजता है, वह बाप होता है
बाप रखवाला होता है, बाप निवाला होता है
बाप अपनी औलाद से हार के मुस्कुराने वाला होता है
बाप करता है, कहता नहीं
और बाप जब समझ आए, तबतक वो पास रहता नहीं।

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