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Ikkis Movie Review: धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत और अगस्त्य नंदा की जानदार परफॉर्मेंस, दिल को छूती है फिल्म

Ikkis Movie Review in Hindi: इक्कीस एक वॉर फ़िल्म नहीं, बल्कि एक ऐसी ख़ामोश दास्तान है जो दिल के भीतर उतरकर देर तक ठहर जाती है। श्रीराम राघवन के सधे हुए निर्देशन में यह फिल्म शोर भरे राष्ट्रवाद से दूर, एक जवान दिल, उसके सपनों, उसके साहस और उसके अधूरे रह गए कल की कहानी कहती है। भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन से प्रेरित यह फिल्म युद्ध के मैदान से ज्यादा उन भावनाओं को छूती है, जो गोली चलने के बाद भी जिंदा रहती हैं।

Ikkis Movie Review

इक्कीस की कहानी
इक्कीस की कहानी दो अलग-अलग दौर में चलती है और यही इसका सबसे असरदार पहलू बनकर उभरता है। फिल्म हमें दिसंबर 1971 के बसंतर युद्ध में ले जाती है, जहां महज 21 साल का अरुण खेत्रपाल बारूदी सुरंगों से भरे मैदान में अपनी टैंक रेजिमेंट की अगुवाई करता है। यहाँ युद्ध को शोर और दिखावे के साथ नहीं, बल्कि डर, उलझन और अचानक आ गई जिम्मेदारी के रूप में दिखाया गया है। हर फ़ैसला जान और देश दोनों के लिए अहम है, और यही तनाव पूरी कहानी को मजबूती देता है।

अरुण खेत्रपाल के किरदार में अगस्त्य नंदा ईमानदार और सच्चे लगते हैं। उनका अभिनय किसी सुपरहीरो जैसा नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा अफ़सर का है जो अपने फ़र्ज़ को पूरी निष्ठा से निभाना चाहता है। उनकी बहादुरी उनके काम और फैसलों से सामने आती है। जब वे आदेश मिलने के बावजूद अपना जलता टैंक छोड़ने से मना करते हैं, तो वह पल बनावटी नहीं लगता, बल्कि उनके स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा महसूस होता है। यह सादगी ही उनके बलिदान को दिल छू लेने वाला बना देती है।

फ़िल्म का दूसरा हिस्सा साल 2001 में सेट है और यहीं इसकी भावनात्मक गहराई सामने आती है। धर्मेंद्र द्वारा निभाया गया अरुण का पिता, ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल, युद्ध के मैदान से दूर है, लेकिन उसकी यादें आज भी उनके भीतर ज़िंदा हैं। उनकी मुलाक़ात ब्रिगेडियर ख़्वाजा मोहम्मद नासिर से होती है, जिन्हें जयदीप अहलावत ने संयम और गंभीरता के साथ निभाया है। यह हिस्सा जीत-हार या राजनीति से ज़्यादा, युद्ध के बाद बची ख़ामोशी, दर्द और इंसानी सोच पर टिकता है और फिल्म इमोशनल एंड देता है।

डायरेक्टर और राइटिंग
श्रीराम राघवन का डायरेक्शन बहुत कंट्रोल में और भरोसे से भरा हुआ है। वो कहानी और दर्शकों दोनों पर पूरा भरोसा करते हैं। कई जगह खामोशी ही सबसे ज्यादा बोलती है। फिल्म की स्क्रिप्ट श्रीराम राघवन के साथ अरिजीत बिस्वास और पूजा लाडा सर्टी ने मिलकर लिखी है। दोनों टाइमलाइन को बहुत अच्छे से जोड़ा गया है और कहीं भी इमोशनल फ्लो टूटता नहीं है। हर सीन का एक मकसद है या तो कहानी आगे बढ़ाता है या किरदारों को और समझने में मदद करता है।

कैसा है फिल्म का VFX
इक्कीस में VFX का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया गया है। ये आंखों को चौंकाने के लिए नहीं, बल्कि कहानी को असली जैसा महसूस कराने के लिए है। टैंक वॉर वाले सीन काफी रियल और असरदार लगते हैं। हर धमाका और हर मूवमेंट कहानी को आगे बढ़ाने के लिए है। जंग का डर, भारीपन और टैंक के अंदर की घुटन अच्छे से महसूस होती है, बिना किसी दिखावे के।

म्यूजिक भी है सधा हुआ
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बहुत सधा हुआ है। म्यूजिक कभी भी सीन पर हावी नहीं होता, बस भावनाओं को हल्के से सपोर्ट करता है। जंग के सीन में टैंक की आवाज़, धमाके और कमांड्स ही माहौल बना देते हैं। वहीं 2001 की टाइमलाइन में म्यूजिक काफी शांत और सोच में डालने वाला है। डायलॉग भी बिल्कुल वैसे ही हैं सिंपल, सच्चे और बिना ड्रामा। कई लाइनें इसलिए याद रह जाती हैं क्योंकि वो सही वक्त पर और दिल से कही गई हैं।

परफॉर्मेंस हैं शानदार
जयदीप अहलावत फिल्म में बेहद मजबूत और असरदार लगते हैं। उनका किरदार शांत, समझदार और जंग की कीमत को जानने वाला है। धर्मेंद्र के साथ उनके सीन फिल्म की जान हैं। धर्मेंद्र बिना ज्यादा बोलें अपने चेहरे और खामोशी से दर्द, गर्व और यादों का बोझ दिखा देते हैं। ये जानकर कि ये उनकी आखिरी फिल्म है, उनके सीन और भी भारी लगते हैं। वहीं डेब्यू कर रहीं सिमर भाटिया, जो कि अरुण खेत्रपाल की लव इंटरेस्ट किरण के रोल में हैं, कम स्क्रीन टाइम के बावजूद दिल छोड़ जाती हैं। वो उस जिंदगी की झलक दिखाती हैं जो अरुण जी सकते थे। वहीं बात करे फिल्म की जान अगस्त्य नंदा की तो उनकी अरुण खेत्रपाल के किरदार में खुदको ढाल लेना बेहद नेचुरल और दिल जीत लेने वाला लगता है।

मस्ट वॉच
इक्कीस जंग की नहीं, इंसानियत की फिल्म है। ये प्यार, जिम्मेदारी, नुकसान और यादों की बात करती है। बिना शोर मचाए, बिना जबरदस्ती देशभक्ति ठूंसे, ये फिल्म शहादत को इज्जत देती है। हिंसा को ग्लैमर नहीं बनाती, बल्कि उसके असर को महसूस कराती है। अगर आपको दिल से जुड़ने वाली, सच्ची और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्में पसंद हैं, तो मैडॉक फिल्म्स की इक्कीस जरूर देखनी चाहिए।

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