बिहार से हुई सिनेमाई सफर की शुरुआत, साल 2022 में सुकृति की ज़िदगी में आया नया मोड़, जानिए उनसे जुड़ी खास बातें
Bollywood Actress Sukriti Success Story: बिहार की राजधानी पटना में बचपन गुज़ारने वाली सुकृति ने डाक बंगला चौराहे से मायानगरी तक एक लंबा सफर तय किया है। बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाते हुए वह न सिर्फ एक कामयाबी अभिनेत्री हैं, बल्कि एक फिल्म निर्माता भी हैं।
संघर्षों और सपनों से भरी उनकी यात्रा, डीपीएस पटना में अकादमिक रूप से शानदार प्रदर्शन करने के बाद शुरू हुई। उनके पिता राजेंद्र प्रसाद गुप्ता सरकारी नौकरी में थे, उनकी ख्वाहिश थी कि सुकृति पढ़ाई में अव्वल आए। पिता के सपनों का साकार करने के लिए उन्होंने कंप्यूटर विज्ञान में इंजीनियरिंग की।

एक बेहतरीन छात्रा और एक कुशल बास्केटबॉल खिलाड़ी होने के बावजूद, बचपन से ही अभिनय के प्रति सुकृति का जुनून उन्हें मुंबई ले आया। मुंबई में अभिनय के सपने को पूरा करने के लिए उनके पिता की सलाह ने उनकी ज़िंदगी बदल दी। थिएटर से शुरुआत करते हुए, उन्होंने कई प्रमुख विज्ञापनों के साथ अपनी पहचान बनाई।
सुकृति की सिनेमाई यात्रा बिहार में ही शुरू हुई थी। साल 2011 में मिस बिहार का खिताब जीतने के बाद, सुकृति को अररिया में फिल्माई गई 'आह्वान' में अपनी पहली भूमिका मिली। इसके बाद 'काशी इन सर्च ऑफ गंगा' में अतिथि भूमिका निभाई। इंडस्ट्री में उनके शुरुआती अनुभवों ने उनकी भविष्य की सफलताओं की नींव रखी।
सुकृति की जिंदगी में 2022 में एक अहम मोड़ आया जब उनकी फिल्म 'जनहित में जारी' रिलीज हुई। फिल्म के पोस्टर पर खुद को देखकर उन्हें बेहद गर्व महसूस हुआ। हाल ही में उनकी शॉर्ट फिल्म 'अमर आज मरेगा' ने दर्शकों का दिल जीत लिया है। इसमें उनके किरदार को दर्शकों ने काफी सराहा।
अभिनय और प्रोडक्शन की दुनिया में उनका सफर उनके जुनून और दृढ़ संकल्प का सबूत है। अपने पुराने दिनों को करते हुए, सुकृति पटना में गुज़ारे लम्हों का अकसर ज़िक्र करती है। इन लम्हों में मौर्यालोक में दोस्तों के साथ घूमना और अपने चाचा के साथ स्कूटर की सवारी करना शामिल है।
गोलघर से पटना का मनोरम दृश्य, साथ ही उनके चाचा द्वारा सुनाई ऐतिहासिक कहानियां, आज भी उनके ज़ेहन में ज़िंदा है। पुराने दिनों में गुज़रे लम्हे उनके दिल के काफी करीब है, जो कि उनकी ज़िंदगी में परिवार और विरासत के महत्व को उजागर करते हैं।
सुकृति की आकांक्षाएं उनकी मौजूदा उपलब्धियों से कहीं आगे तक फैली हुई हैं। उन्हें उम्मीद है कि एक दिन वे मधुबनी पेंटिंग और बिहार की संस्कृति पर केंद्रित एक फिल्म बनाएंगी, जिसका उद्देश्य राज्य की समृद्ध विरासत को दुनिया के साथ साझा करना है।
यह महत्वाकांक्षा सिनेमा में अपने काम के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों का जश्न मनाने और उन्हें संरक्षित करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। अपनी ऑन-स्क्रीन मौजूदगी के अलावा, सुकृति ने पर्दे के पीछे भी बेहतरीन काम किया है। अपने प्रोडक्शन हाउस भारत चलचित्र के ज़रिए उन्होंने 'जमाला', 'डे 180' और 'मेरे जीवन साथी' जैसी फ़िल्में प्रोड्यूस की हैं।
अभिनेत्री और निर्माता दोनों के तौर पर उनकी दोहरी भूमिका ने उन्हें फ़िल्म उद्योग की व्यापक समझ दी है। उन्होंने बताया, ऑन-स्क्रीन काम करते हुए मैंने अभिनय की बारीकियां सीखीं, लेकिन जब मैं निर्माता बनी, तभी मुझे एहसास हुआ कि दो घंटे की फ़िल्म बनाने में कितनी मेहनत लगती है।
सुकृति की कहानी दृढ़ता, प्रतिभा और अपने काम के प्रति अटूट समर्पण की कहानी है। अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता से लेकर फिल्म उद्योग में अपनी उपलब्धियों तक, वह अपने सपनों का पीछा करने की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
पटना से बॉलीवुड तक का उनका सफर, स्क्रीन पर और उसके बाहर उनकी प्रभावशाली भूमिकाएँ और बिहार में अपनी जड़ों से उनका गहरा जुड़ाव उनके बहुमुखी व्यक्तित्व और अपनी कला के माध्यम से बदलाव लाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।












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