Panchayat Season 4: वो सीजन जो सीरीज को 'न' देखने पर करता है मजबूर, क्यों? एक क्लिक और सारे जवाब हाजिर

साल 2020 में शुरू हुई सीरीज पंचायत अपने चौथे सीजन तक पहुंच गया है। ये एक ऐसी सीरीज है जिसे दर्शकों ने खूब प्यार दिया। उन्हें इस सीरीज का बेसब्री से इंतजार भी रहता है। अब चौथा सीजन रिलीज हो गया। इस बार पूरा माहौल इलेक्शन का है। 8 एपिसोड के इस सीजन में यही दिखाया गया है। बिना स्पॉइलर के दो शब्द में कहूं तो ये सीजन 'बेहद निराश' करता है। लेकिन कैसे, कुछ इस रिपोर्ट के जरिए आप तक पहुंचाने की कोशिश है। पढ़िए...

सीरीज खुलती है, पंचायत भवन से। जहां सचिव अभिषेक का भाई वापस अपने घर जा रहा है। सचिव को चिंता है, क्योंकि उन पर बनराकस ने केस कर दिया है। प्रधान जी को गोली लगी हुई है, किसने चलवाई पता नहीं चला। सचिव जी को ये डर है कि MBA का एडमिशन केस की वजह से न रुक जाए। ख़ैर कहानी बढ़ती है, इलेक्शन की तरफ। बनराकस भी केस हटवाना चाहता है, क्योंकि चुनाव हैं। इस बार बनराकस के अंदर भी न जोश है और न वो एनर्जी, जो हमें पिछले तीन सीजन में दिखे।

Panchayat Season 4

एक्टिंग ऐसी जिसे देख दर्शक शर्मा जाए
सीरीज में इस बार एक्टर्स ने ही इतनी खामी दिखाई है कि देखने का मन नहीं करता। प्रधान जी को गोली उनके उल्टे हांथ में लगी है। उन्होंने उसे पट्टे से बांधा है। लेकिन पूरी सीरीज में उन्होंने हाथ को ऐसा पकड़ा है जैसे कि लकवा मार गया हो। चलिए मान भी लेते हैं, लेकिन सीरीज में कहीं भी ऐसा जिक्र नहीं है कि लकवा मार गया है। सचिव जी एक सीन में प्रहलाद चा के साथ शराबनोशी करते हैं। नशे में चूर वो चिल्लाने लगते हैं। जब वो चलते हैं तो उनकी चाल लड़खड़ा जाती है। लेकिन जब वो चिल्ला-चिल्ला कर डायलॉग बोलते हैं, तो ऐसा नहीं कि वो शराब के नशे में चूर हैं।

न चुटीले सवांद और न सीरीज में तेजी
पंचायत के हर सीजन में कुछ न कुछ डायलॉग ऐसा मिलता है जो याद रह जाता है। इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है। चुनावी प्रचार के दौरान जो नारे इस सीरीज में लगाए गए हैं, उससे ज्यादा क्रिएटिव असल चुनाव में बन जाते हैं। पंचायत चुनाव में जो गर्मजोशी होती है, वो विधायकी के चुनाव में भी नहीं रहती है। गांव की पॉलिटिक्स बहुत अलग है। लेकिन 8 एपिसोड की इस सीरीज में बहुत ही हल्के स्तर पर इसे दिखाया गया है। जो खुद में बोर लगती है। जब आप सीरीज देख रहे होते हैं तो लगता है कि अब कहानी में तेजी आएगी। स्पीड पकड़ेगी और सबकुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होता है। आप स्क्रीन से नजर हटाकर मोबाइल पर रख लेते हैं। समय की बर्बादी लगती है। ऐसा भी लगता है कि इसे क्यों खींचा जा रहा है।

नहीं मिलते हैं जवाब
कुछ सालों पहले फिल्म आई थी। बाहुबली, उसमें एक सवाल था। कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? पचांयत के सीजन 3 में ऐसा सवाल छूटा था, प्रधान जी पर गोली किसने चलाई? लेकिन 8 एपिसोड फिर से तान दिए, लेकिन मजाल है जवाब दिया हो। सचिव और रिंकी का इश्कियापा भी पास आ गया था। लेकिन चौथे सीजन में तो वो गायब सा ही दिखा। परवान ही नहीं चढ़ पाया। कुछ जवाब नहीं मिले। इस बार फुलेरा के नाम पर अलग रचना रची गई है। सब कुछ अधूरा सा है, टूटा सा बिल्कुल बिखरा सा।

ऐसी भी क्या मजबूरी
पहला और दूसरा सीजन पंचायत का जबरदस्त रहा। मेकर्स ने तीसरा सीजन भी बनाया, लेकिन यहीं से कहानी थोड़ा लचर हो गई। फिर भी मेकर्स नहीं माने और इसका चौथा सीजन लेकर आए। इसमें लगा कि कहानी और जबरदस्त तरीके से कसेंगे और बची कुची कसर पूरी कर देंगे। लेकिन यहां तो लुटिया ही डूब गई। ऐसा लग रहा है कि मेकर्स ने कोई कसम खाई है, जिस वजह से इन्होंने कहानी को खींच दिया। अगर अपने दर्शक की बात मानें तो अरुणाभ कुमार जी, अब बस करिए। आप की मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन हमारी विनती समझिए। अच्छी चीज को कैसे खराब किया जा सकता है ये हम आपसे सीख गए हैं।

ये कुछ बातें हैं जो पंचायत सीजन 4 के बारे में बतौर दर्शक आपको जानना चाहिए। क्योंकि 8 एपिसोड हैं और ऐवरेज टाइम रखते हैं तो आपके 5-6 घंटे इसे देखने में खर्च होंगे। लेकिन क्यों खर्च नहीं करने चाहिए हमने आपको बता दिया। अब तय करिए आखिर करना क्या है।

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