Dussehra: दशानन के जलने से, Durg के साहू परिवार का जलता है चूल्हा, 50 सालों से कर रहे यह काम

दुर्ग, 30 सितम्बर। सत्य पर असत्य की जीत का पर्व विजयादशमी इस साल हर्षोल्लास से मनाने की तैयारी में पूरा देश जुटा है। छत्तीसगढ़ में भी दशहरा में रावण दहन की तैयारियां की जा रही है। बुराई के प्रतीक रावण के जलने से भले ही किसी व्यक्ति के मन के अंदर का रावण न जले। लेकिन ग्राम कुथरेल में रावण जलने से कुछ परिवारों के घर का चूल्हा जरूर जलता है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा परिवार है। जिनके लिए रावण ही आजीविका का साधन बना हुआ है। इस परिवार के सभी सदस्य मिलकर मुखौटे और पुतले का निर्माण करते हैं। खास बात यह है, कि इनकी यह परम्परा पांच दशकों से चली आ रही है।

50 साल से चली आ रही है पुतले बनाने की परम्परा

50 साल से चली आ रही है पुतले बनाने की परम्परा

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के ग्राम कुथरेल में गांव में लोग रावण की वजह से लाखों की कमाई कर लेते है। यहां के बहुत से घरों में मुखौटे के निर्माण होता है। लेकिन साहू परिवार हो लाखों रुपए के मुखौटे तैयार करके उन्हें बेचने का काम 50 साल से करता आ रहा है। दुर्ग जिले का कुथरेल गांव महज साढ़े चार हजार की आबादी वाला गाँव है।

दादा से सीखा बनाना, अब बच्चो को सिखा रहे

दादा से सीखा बनाना, अब बच्चो को सिखा रहे

कुथरेल के डॉ जितेंद्र साहू बताते हैं कि उनके परिवार में रावण के मुखौटे व पुतले बनाने की परम्परा दादा जी के समय से चली आ रही हैं। साहू परिवार की अब चौथी पीढ़ी रावण, मेघनाथ, कुंभकरण के पुतले बना रही है। उन्होंने बताया कि गांव में रावण के पुतले बनाने की शुरुआत उनके दादा बिसौहाराम साहू ने की थी। वे बढ़ई का काम करते थे। लेकिन गांव की रामलीला मंडली में हमेशा रावण का किरदार निभाते थे। बिसौहाराम अपने किरदार के अनुसार धीरे धीरे रावण का पुतला व मुखौटा बनाना सीखा और फिर उनके बनाए पुतलों की मांग बढ़ती गई। तब उनके पुत्र लोमन सिंह साहू ने यह काम सीखा और आज इस परंपरा को स्व. लोमन सिंह के बेटे डॉ. जितेन्द्र साहू आगे बढ़ा रहे हैं।

दुर्ग रायपुर समेत कई जिलों में होती है सप्लाई

दुर्ग रायपुर समेत कई जिलों में होती है सप्लाई

डॉ. जितेन्द्र साहू बताते हैं कि अब उनके परिवार के बच्चे भी रावण का पुतला बनाना सीख गए हैं। साहू परिवार की ओर से निर्मित रावण के पुतले की डिमांड दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, कवर्धा सहित करीब 15 जिलों में है। उनके पास अब तक 45 समितियों ने रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले तैयार करने का ऑर्डर दिया हैं। जिसकी तैयारी में वे जुट गए हैं। इसके लिए 2 माह पहले से ही ऑर्डर लिया जाता है। कुथरेल में साहू परिवार के बाद और भी परिवारों ने इस काम को अपना लिया है।

गांव में तैयार हो चुके हैं 50 से ज्यादा कलाकार

गांव में तैयार हो चुके हैं 50 से ज्यादा कलाकार

कुथरेल में रावण का पुतला बनाने वाले 50 से ज्यादा कलाकार तैयार हो चुके हैं। अब गांव में बच्चों ने भी यह कला सीख ली है। वे 8 से 10 फीट तक के रावण का पुतला आसानी से बना लेते हैं। इस काम में अंचल कुमार, कृष्णा साहू, राजू देशमुख, चरण जैसे कई युवा हैं, जो जितेन्द्र के साथ काम कर रहे हैं। बाकी समय ये युवा पढ़ाई करते है तो कुछ खेती और मजदूरी करते हैं।

इस तरह तैयार किया जाता है रावण का पुतला

इस तरह तैयार किया जाता है रावण का पुतला

ग्राम कुथरेल में छोटे से लेकर 70 फिट ऊंचे विशालकाय पुतले व दशानन रावण के मुखौटे डॉ जितेंद्र साहू स्वयं तैयार करते हैं। दशहरा के लिए मुखौटों को नविभिन्न रंगों से सजाकर अब अंतिम रूप दिया जा रहा है। रावण के शरीर को तैयार करने बांस, पुरानी बोरी रद्दी पुट्ठे और कागज का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन मुखौटा बनाने में सावधानी बरती जाती है। इसके लिए पहले मिट्टी का एक सांचा तैयार किया जाता है। जिस पर अखबार के पन्ने को गीला कर एक-एक लेयर कर उस पर बिछाया जाता है। करीबन 20 से 25 लेयर के बाद उसे सूखने छोड़ दिया जाता है। जब यह स्ट्रक्चर सूख जाता है। तब इस पर स्प्रे पेटिंग के जरिए पेंटिंग की जाती है।

महिलाएं और बच्चे भी करते हैं पुतला बनाने में सहयोग

महिलाएं और बच्चे भी करते हैं पुतला बनाने में सहयोग

कलाकार जितेंद्र साहू बताते है की पूरे रावण के पुतले को बनाने में करीब 2 माह का समय लगता है। इन 60 दिनों में पूरी शिद्दत और राम भक्ति के साथ रावण के ये विशाल काय पुतले तैयार किए जाते है। इस पूरे काम मे साहू परिवार की महिलाएं भी पूरा सहयोग करती हैं। सुखवंती बाई कागज के लेप से मुखोटा तैयार कर रही है। तो हीरा बाई उसको सुखा रही है. इस काम मे घर की महिलाएं पुरुष कारीगरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती है. एक पुतले की कीमत करीब 10 से 25 हजार रुपए तक होती है।

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