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जलवायु प्रदर्शनों की उग्रता- मददगार या रुकावट?

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Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 09 अप्रैल। अपनी बात रखने के लिए जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक्टिविस्ट, ज्यादा से ज्यादा नागरिक अवज्ञा के तरीके आजमाने लगे हैं. अप्रैल में 20 देशों के 1,000 वैज्ञानिकों ने समन्वित आंदोलन की योजना बनाई. इसके तहत सड़कें जाम करना, धरना देना, और सरकारी इमारतों पर पेंट बिखेरना और बड़े बड़े अक्षरों में जलवायु ताकीदें दर्ज करना जैसी कार्रवाइयां शामिल हैं. अप्रैल में ही, "एक्सटिन्क्शन रेबेलियन" नाम का एक समूह पूरे ब्रिटेन में तेल ठिकानों की नाकाबंदी की योजना बना रहा है. ये वही ग्रुप है जिसे ब्रिटिश अधिकारियों ने हाल मे एक संगठित आपराधिक समूह के रूप में चिंहित करने का इरादा जताया है.

शोध दिखाता है कि उनके तरीके मकसद को पाने में उल्लेखनीय रूप से उन्हें लाभ पहुंचा सकते हैं. लेकिन ऐसी उग्रपंथी कार्रवाइयों में खतरे भी कम नहीं होते. शोध के मुताबिक इस आधार पर भी अलग अलग स्तर के विरोध उपयुक्त होते हैं कि प्रदर्शनकारी किन लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं.

नीदरलैंड्स की ग्रोनिनगन यूनिवर्सिटी और येरूशेलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन और सामूहिक आंदोलन के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वाले एरिक शुमान कहते हैं कि शांतिपूर्ण सभा और सामाजिक कायदों से बंधी याचिकाएं उन लोगों का समर्थन जुटाने में ज्यादा असरदार रहती हैं जो इस उद्देश्य से सहानुभूति रखते हैं.

लेकिन उनका कहना है कि अगर लक्ष्य, मकसद के प्रति अपने समर्थन में वैसे हिचकिचाहट दिखाने वाले लोगों के बीच नीति समर्थन को बदलने का होता है तो ज्यादा अशांत प्रदर्शन जैसे कि नागरिक अवज्ञा, हड़तालें और बहिष्कार- ज्यादा असरदार नजर आते हैं.

शुमान के मुताबिक, "विपक्षी जरूरी नहीं कि हमेशा प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हों या शायद उन्हें पसंद भी करते हों. लेकिन किसी किस्म का अवरोध पैदा कर, आप बुनियादी तौर पर उनमें किसी किस्म का बदलाव करने या किसी बदलाव को समर्थन करने का दबाव डाल रहे होते हैं जिससे कि वो अवरोध समाप्त हो जाएगा."

नीति निर्माताओं को यथास्थिति बदलने के लिए मजबूत कारणों की जरूरत होती है और अशांत प्रदर्शन, वोटर के पलट जाने की आशंका को कम करते हुए, बदलाव ला सकते हैं और साथ ही साथ सत्ताधारियों पर सीधा दबाव भी डाल सकते हैं.

ग्लासगो में विद्रोही वैज्ञानिकों का प्रदर्शन

लेकिन नागरिक अवज्ञा को असरदार बनाने के लिए प्रदर्शनकारियों को एक स्पष्ट, सकारात्मक और रचनात्मक इरादों की दरकार है वरना इस बात का खतरा है कि उन्हें महज भीड़ को भड़काने वाले समूह और समाज के लिए सरदर्द की तरह देखा जाने लगे. उन्हें एक साफ मकसद हासिल करने वाले समूह की छवि बनाए रखने की जरूरत है, साथ ही नीति निर्माताओं से जवाब हासिल करने के लिए पर्याप्त दबाव भी उन्हें बनाए रखना होगा. और उनके पास अपनी बात रखने के बहुत सारे तरीके हैं.

किसी जगह पर कब्जा इस स्केल में सबसे नीचे आता है. उसके बाद हैं हड़ताल और बहिष्कार. सड़कें अवरुद्ध करना अगला कदम है खासकर जब प्रदर्शनकारी, शहर की श्वास-नलियां कही जाने वाली प्रमुख सड़कों को निशाना बनाते हैं. कार्यक्रमों और समारोहों में वक्ताओं को बोलने से रोकना, लोगो पर चमकियां फेंकना यानी ग्लिटर बॉम्बिंग करना, और हैकिंग- ये सब विरोध प्रदर्शन को और तीखा बनाने के उपक्रम हैं. इन तरीकों के बाद प्रदर्शनकारी संभावित रूप से हिंसक कार्रवाइयों के परिक्षेत्र में दाखिल होते हैं जैसे संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या लोगों पर शारीरिक रूप से हमले करना.

इस चरण में, उन पर अपने पर्यवेक्षकों यानी नजर रखने वालों का कोप-भाजन बनने का खतरा भी मंडराता है. शुमान कहते हैं, "जब एक बार कोई चीज एक नैतिक रेखा या हद को पार करती दिखती है तो वो ऐसी स्थिति होती है जब अशांत प्रदर्शन कई कारणों से बहुत कम असरदार रह जाता है. लोगो को उस किस्म की हरकत या उससे जुड़ी किसी भी चीज की भर्त्सना का ठोस बहाना मिल जाता है."

अगर प्रदर्शनकारियों की कार्रवाई का इरादा साफ है और वो लक्ष्य-केंद्रित है तो उनका विरोध प्रदर्शन और अशांत हो भी जाए तो उसमें किसी नैतिक मर्यादा को लांघने की आशंका बहुत कम रह जाती है. अंधाधुंध हमलों के उलट जैसे, जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से जुड़े बुनियादी ढांचे में बाधा डालना ऐसी ही एक कार्रवाई मानी जाएगी.

खास ठिकानों का निशाना बनाने वाले प्रदर्शन का असर व्यापक

एक व्यापक आंदोलन

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र और राजनीति-विज्ञान के प्रोफेसर डेविड एस मेयर सामाजिक आंदोलनों और संस्थागत राजनीति के साथ उनके संबंध का अध्ययन करते हैं. वो कहते हैं कि प्रभावशाली विरोध प्रदर्शन एक व्यापक रेंज वाली कार्रवाइयों से निर्मित होता है.

वो कहते हैं, "अतीत के कामयाब आंदोलनों को देखें, तो आप पाते हैं कि बहुत सारे लोग बहुत सारे अलग अलग काम कर रहे थे. रणनीति या युक्तियों की विविधता वास्तव में एक मूल्यवान चीज है क्योंकि इसकी बदौलत अलग अलग लोग, सत्ताओं के साथ रियायतों पर, कोई रास्ता निकालने पर या समझौता वार्ताएं करने पर, बात कर सकते हैं. देखने वाले भी अलग अलग चीजों से जुड़ पाते हैं."

वो कहते हैं कि एक विशेष प्रतिरोधी तरीके को किसी एक्टिविस्ट आंदोलन की सफलता का श्रेय देना हमेशा कठिन होता है. "रोजा पार्क्स अगर दर्जनों साल पहले से आंदोलन न करती आ रही होती तो वो उस दिन नहीं बैठ पातीं. मार्टिन लूथर किंग का बस बहिष्कार आंदोलन साल भर चला और उसने रोजा के विरोध प्रदर्शन का साथ दिया और दूसरे लोगो ने उसी दौरान एक मुकदमा भी दायर किया जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा."

बर्लिन में फ्राइडेज फॉर फ्यूचर का प्रदर्शन

क्या हिंसा कोई जवाब है?

और उन जलवायु प्रदर्शनकारियों का क्या, जो नैतिक हदें लांघते रहते हैं और हिंसा में मुब्तिला हो जाते हैं? जैसे कि वे जो जीवाश्म ईंधन के बुनियादी ढांचे को नष्ट कर देने का आह्वान करते हैं. इस बारे में और शोध की जरूरत है लेकिन इस बारे में कुछ साक्ष्य उपलब्ध हैं कि किसी छोटे से उग्र कोने से विरोध की तेवर भरी कार्रवाई, वास्तव में मकसद के लिए फायदेमंद हो सकती है.

शुमान कहते है कि, "किसी अपेक्षाकृत बड़े अहिंसक आंदोलन के व्यापक साए तले जब कोई हिंसा होती है, तो उसमें कभी कभार प्रतिरोध की बेहतरी के लिए और अशांति और दबाव पैदा करने का माद्दा भी आ सकता है. लेकिन एक ज्यादा बड़ा, अहिंसक समूह भी होता है जिसे ज्यादा नरम समझा जाता है और लोग सोचते हैं कि चलो उनकी कुछ मांगे मान लेते हैं और कुछ रियायतें उन्हें दे देते हैं."

जलवायु आंदोलनकारियों की हां

जलवायु आंदोलनकारी खुद, अपने वृहद आंदोलन के भीतर युक्तियों की विविधता का स्वागत करते हैं. जर्मनी में "फ्राइडेज फॉर फ्यूचर" समूह से जुड़ी एक्टिविस्ट यूले पेह्न्टे का कहना है कि, "जलवायु आंदोलनों के भीतर कार्रवाई और प्रदर्शनों के रूप और तरीके काफी विविध और व्यापक होते हैं. और ये एक अच्छी बात है. जलवायु के लिए नुकसानदेह संरचनाओं में दखलंदाजी करने वाली शांतिपूर्ण नाकाबंदियों से लेकर एक व्यापक समर्थन वाले जनांदोलनों तक, याचिकाओं और बड़े पैमाने की कलात्मक कार्रवाइयों तक, तमाम विरोध प्रदर्शन समाज के अलग अलग समूहों तक पहुंचते हैं और एक दूसरे के पूरक बनते हैं."

वो कहती हैं कि विरोध आंदोलन कितना भी उग्र बन जाए- इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के असर तो कहीं ज्यादा घातक ही होंगे. वो पूछती हैं, "ये बहस बार बार उठती है कि जलवायु आंदोलन कितना उग्रपंथी बन सकता है लेकिन ये कौन बताएगा किः जलवायु संकट कितना उग्र बन सकता है?"

"विरोध के तरीकों और रूपों पर बहस करने के बजाय हमें देखना चाहिए कि कितनी तेजी और कितनी सामाजिक सक्रियता के साथ उत्सर्जनों में कटौती कर सकते हैं, इस बारे में एक ईमानदार बहस करनी चाहिए और जलवायु संकट की वास्तविकता का मुकाबला करना चाहिए."

जलवायु नियतिवाद है सबसे बुरी रणनीति

2020 के घोषणापत्र, "हाउ टू ब्लोअप अ पाइपलाइन" (एक पाइपलाइन को कैसे उड़ाएं) में स्वीडन के व्याख्याता और जलवायु एक्टिविस्ट आंद्रेयास माल्म ये दलील देते हैं कि जलवायु को बर्बाद करने वाली गतिविधियों से जुड़े बुनियादी ढांचे और संपत्ति (लोग नहीं) को निशाना बनाने के लिए हिंसा के नपेतुले कदम, उन विकल्पों का हिस्सा होने चाहिए जो जलवायु कार्यकर्ता अपने विरोध के लिए अपनाते हैं.

वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जहां तमाम हड़तालों, जुलूसों, तमाम याचिकाओं, शिकायतों और भाषणों के बावजूद जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी कार्रवाई का अभाव बना ही रहता है.

वो कहते हैं, "क्या हम ये कहेंगे कि जो कर सकते थे हमने किया, तमाम साधन खर्च कर दिए जो कर सकते थे और फेल हो गए? क्या हम ये मान बैठे हैं कि सिर्फ मौत का सबक ही सीखना बाकी रह गया है- वो स्थिति जिसे कुछ लोग पहले से हवा दे ही रहे हैं- और पालने को सिर्फ तीन, चार, आठ डिग्री तापमान की ओर धकेलना ही बाकी रह गया है? या कि एक दूसरा चरण भी है जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से आगे का है?"

लेकिन वो ये बेशक मानते हैं कि भाग्यवाद या नियति को स्वीकार न करने वाली किसी भी कार्रवाई से बदलाव आता है. वो लिखते हैं, "एक सबसे जुनूनी निष्ठावान गांधीवादी जलवायु कार्यकर्ता, एक सबसे व्यवहार-शून्य अक्षय ऊर्जा उद्यमी, वीगनवाद यानी शाकाहार का एक सबसे आत्मसंतुष्ट अनुयायी, एक सबसे समझौतापरस्त सांसद- उत्तरी गोलार्ध के एक गोरे से यानी किसी संपन्न और विकसित देश के उस गोरे आदमी से, बहुत ज्यादा बेहतर है जो कहता है, 'हम अभिशप्त हैं – आओ शांति से मरें.' जलवायु के प्रति नकार की ये भावना बेहद घिनौनी है."

रिपोर्टः अलिस्टेयर वॉल्श

Source: DW

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English summary
do disruptive protests jeopardize the climate change movement
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