Modi@75, Birthday Special: आडवाणी की नाराज़गी और विरोध के बीच मोदी कैसे बने PM पद का चेहरा, बदली BJP की दिशा
Modi@75 Birthday Special: 17 सितंबर 2025 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष के हो जाएंगे। लेकिन ठीक 12 साल पहले 13 सितंबर 2013 का वह दिन भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया था, जब भाजपा ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया।
यह सिर्फ़ एक नामांकन नहीं था, बल्कि भाजपा के नेतृत्व परिवर्तन का ऐसा क्षण था जिसने पार्टी की पूरी दिशा बदल दी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता का राजनीतिक सूर्य ढलने लगा।

विरोध के बीच ऐतिहासिक फैसला
दिल्ली में भाजपा संसदीय बोर्ड की अहम बैठक में अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया। सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता मोदी की उम्मीदवारी को लेकर असहज थे। सबसे बड़ा झटका यह था कि पार्टी के मार्गदर्शक और तब तक भाजपा की राजनीति के केंद्रीय चेहरे माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी बैठक में मौजूद ही नहीं थे। उनकी नाराजगी इतनी गहरी थी कि सभी प्रयासों के बावजूद वे वहां नहीं पहुंचे।
आडवाणी का दर्द भरा पत्र
घोषणा के तुरंत बाद आडवाणी का वह पत्र सार्वजनिक हुआ जिसमें उन्होंने पार्टी के तौर-तरीकों पर गहरी पीड़ा जताई। उन्होंने लिखा कि भाजपा अब वैसी आदर्शवादी पार्टी नहीं रह गई, जिसकी नींव श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी ने रखी थी। इससे पहले जून 2013 में नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने के विरोध में आडवाणी ने सभी महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया था।
पुराने रिश्तों की दरार
लालकृष्ण आडवाणी ने अतीत में नरेंद्र मोदी का कई बार राजनीतिक संकट से बचाव किया था-चाहे वह 2002 के गुजरात दंगे हों या संगठनात्मक चुनौतियाँ। लेकिन जब आडवाणी खुद 2005 के 'जिन्ना प्रकरण' में घिर गए, मोदी ने सार्वजनिक रूप से उनका साथ नहीं दिया। आरएसएस का समर्थन पाने के लिए मोदी ने साफ़ तौर पर अपना रास्ता अलग कर लिया। यह वही क्षण था जिसने दोनों नेताओं के बीच भरोसे की खाई और चौड़ी कर दी।
मोदी का आत्मविश्वास भरा वादा
उम्मीदवारी घोषित होने के बाद नरेंद्र मोदी ने पार्टी मुख्यालय में कहा, "मैं भाजपा को विश्वास दिलाता हूं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए मैं कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे "साधारण भारतीयों की आकांक्षाओं" को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। यह वक्तव्य उस नेता का था जो न सिर्फ़ पार्टी के भीतर विरोध झेल रहा था, बल्कि पूरे देश के मतदाताओं को नई उम्मीद भी दे रहा था।
भाजपा की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अभूतपूर्व बहुमत हासिल किया और कांग्रेस के दशक लंबे शासन का अंत किया। यही वह मोड़ था जब लालकृष्ण आडवाणी, जो कभी प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जाते थे, राजनीतिक हाशिए पर चले गए। मोदी का उदय सिर्फ़ एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि भाजपा की नई पीढ़ी, नई रणनीति और आक्रामक जनसंपर्क की शुरुआत थी।
75 वर्ष पर नज़र
आज जब नरेंद्र मोदी 75 की उम्र में प्रवेश कर रहे हैं, यह यात्रा सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धियों की नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े सत्ता परिवर्तन की गाथा भी है। 2013 का वह सितंबर भाजपा के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा-जब विरोध, नाराजगी और आंतरिक कलह के बावजूद पार्टी ने नए युग की ओर कदम बढ़ाया और नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने की राह पर निर्णायक पहला कदम रखा।
भारतीय राजनीति की पीढ़ीगत बदलाव की कहानी
मोदी का राजनीतिक उदय और आडवाणी का अस्त, भारतीय राजनीति की उस पीढ़ीगत बदलाव की कहानी है जिसने भाजपा को विचारधारा और नेतृत्व दोनों स्तर पर नई परिभाषा दी। नरेंद्र मोदी का 75वां जन्मदिन इसलिए सिर्फ़ एक व्यक्तिगत मील का पत्थर नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक बदलाव की याद भी है जिसने 21वीं सदी के भारत की राजनीति का चेहरा बदल दिया।












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