दिल्ली-एनसीआर: श्मशान स्थल के कर्मचारियों के इस दर्द के बारे में कोई नहीं पूछ रहा
नई दिल्ली, 5 मई: दिल्ली-एनसीआर में पिछले कई दिनों से श्मशान स्थलों पर कोरोना से मरने वाले मरीजों के शवों की लाइन लगी रहती है। कर्मचारी उतने ही हैं, लेकिन उनपर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है। नोएडा-गाजियाबाद हो या दिल्ली कहीं भी कोई ज्यादा फर्क नहीं है। 16-16 घंटे काम करने पर रहे हैं। 4 घंटे भी सोने का मौका नहीं मिल रहा। कोविड मरीजों के अंतिम संस्कार की कठिन चुनौतियों को देखते हुए मिल क्या रहा है तो पीपीई किट, सैनिटाइजर या मास्क जैसी चीजें। लेकिन, यहां काम करने वाले लोग जो इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उनकी असल जरूरत क्या है? क्या उन्हें इस समय अपने काम से डर नहीं लगता? यह पूछने वाला कोई नहीं है। हम यहां कुछ ऐसे ही लोगों की जुबानी उनका हाल बता रहे हैं, जिनके दर्द की इंतहा हो रही है।

अंधेरा होने के बाद भी लपटें उठती रहती हैं
आमतौर पर हिंदू धर्म में सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार की परंपरा नहीं है। लेकिन, हालात इस लीक पर चलने के अनुकूल नहीं हैं। अंधेरा होने के बाद भी चिताओं से आग की लपटें उठती रहती हैं। जगह कम पड़ रही है, लेकिन शवों का आने का सिलसिला थम नहीं रहा है। लेकिन, प्रैक्टिकली इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने का भार श्मशान के गिनती के कर्मचारियों के कंधों पर आ चुकी है। इंडियन एक्सप्रेस ने अंतिम निवासों में काम करने वाले कुछ ऐसे ही कर्मचारियों से बात की है, जिनकी परेशानियों पर शायद अभी किसी का ध्यान नहीं गया। नोएडा सेक्टर 94 के अंतिम निवास में सीएनजी ऑपरेटर दीपक कुमार थोड़ी देर सांस लेने के लिए बाहर निकले हैं। दोनों मशीन चालू है, लेकिन देर शाम भी चार शव अभी भी एंबुलेंस में अपनी बारी के इंतजार में हैं। वो कहते हैं, 'मैं कई दिनों से करीब 16 घंटे काम कर रहा हूं.....3 से 4 घंटे ही सो पाता हूं। मैं अपने पैरों पर ही खड़ा रहता हूं....'

पीपीई सूट पहनना क्यों नहीं मुमकिन ?
दीपक जैसे लोगों को अपने काम में जोखिम का अहसास है। वो जानते हैं कि वह अपनी जिंदगी का खतरा मोल लेकर इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऊपर से उन्हें कोरोना वाले शवों से ही डील नहीं करनी है, सैकड़ों की तादाद में रोजाना शवों के साथ आए रिश्तेदारों, अस्पताल से आए लोगों, एंबुलेंस ड्राइवरों के भी संपर्क में आना पड़ रहा है। 29 साल के दीपक जानते हैं कि वह हाई रिस्क में हैं, लेकिन उनके लिए पीपीआई सूट पहनना मुमकिन नहीं है। वो कहते हैं, ' मुझे खतरे के बारे में पता है, लेकिन पीपीई सूट पहनकर मेरे लिए अपना काम करना असंभव है। गर्मी की वजह से सूट भींग जाता है और शरीर से बुरी तरह चिपक जाता है। पीपीई पहनकर ना तो हम लकड़ी के चिताओं को जला सकते हैं और ना ही सीएनजी मशीन पर काम कर सकते हैं।' इस श्मशान स्थल पर उनके एक ही साथी हैं और वही दोनों मिलकर सारा काम निपटाते हैं। उनके साथी महेश पांडे कहते हैं कि 'पहले सीएनजी पर 3 से 4 शव आते थे। लेकिन, अब 18 से 80 रोज आते हैं। अब आप हिसाब लगा लीजिए कि 16 घंटे क्यों काम करना पड़ता है।'

बीमा की जरूरत महसूस हो रही है
जब उनसे पूछा गया कि इस संकट के दौर में जब उनका काम इतना बढ़ गया है तो क्या उन्हें कुछ अतिरिक्त लाभ दिया जा रहा है ? इसपर दीपक कुमार ने कहा, 'अभी तक तो कुछ भी नहीं। हमें हमारी 12,000 रुपये महीने की सैलरी ही मिल रही है। अंतिम निवास को नोएडा लोक मंच नाम का एनजीओ चलाता है, जो हमें सैनिटाइजर, पीपीई सूट, मास्क जैसी चीजें देता है। लेकिन, हमें अभी जिस चीज की जरूरत है वह है बीमा की तरह का कुछ। अगर मुझे कुछ हो जाता है, हमारे पास कुछ भी नहीं है।' हालात ऐसे हैं कि दोनों को अभी श्मशान परिसर में ही रहना पड़ रहा है, क्योंकि घर जाने का सवाल ही नहीं उठता। वो कहते हैं कि उन्हें खतरे के बारे में पता है, लेकिन इस काम से पीछे हटने का सोच भी नहीं सकते। दिनभर काम करते-करते वो थक चुके हैं, तभी एक और शव पहुंच जाता है। वो कहते हैं मुझे माफ कर दो अब मैं गिर पड़ूंगा। सीएनजी में नहीं रह सकता, लकड़ी की चिता वाला कूपन लेकर आ जाइए। लेकिन, अगर ऑफिस बंद हो चुका है तो मृतक के परिजन की मजबूरी उनसे देखी भी नहीं जाती और फिर वह दिवंगत आत्मा की अंतिम यात्रा के लिए अपनी शरीर की बची हुई ताकत भी झोंक देते हैं। क्योंकि, उसके साथ आए परिजनों का गम भी वह सह नहीं पाते। श्मशान में धार्मिक परंपरा निभाने आने वाले पंडितों का भी यही हाल है। वह अपने काम से मुंह मोड़ नहीं सकते। जबकि, उन्हें पता है कि उनकी जिंदगी दांव पर लगी रहती है।

एक ग्लास पानी मिल जाए......
इन लोगों को किन मुश्किल हालातों में काम करना पड़ रहा है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। जैसे कि दीपक ने कहा, 'अगर एक ग्लास पानी भी लेना हो तो हमें रोड की उस तरफ कैंटीन तक जाना होता है। लेकिन, हम लोग पूरे दिन शवों से घिरे रहते हैं। कितनी बार जा सकते हैं? मुझे नहीं पता कि किसी ने सोचा होगा कि कभी यहां ऐसे भी हालात देखने पड़ेंगे। चिताएं कभी नहीं बुझतीं। जबतक हम निकलते हैं, वह जलती ही रहती है। कुछ घंटों में लौटते हैं तो भी उससे आग निकल रही होती है। ' यही हाल नोएडा से सटे दिल्ली के गाजीपुर अंतिम निवास का भी दिखाई पड़ता है। वहां के इंचार्ज सुनील शर्मा कहते हैं, पहले एक दिन में करीब 20 शव आते थे। इस समय उन्होंने एक दिन में 140 तक अंतिम संस्कार कराया है। उनका भी कहना है कि पीपीआई सूट यहां के कर्मचारी नहीं पहन सकते और सरकार ने उनके लिए किसी भी तरह का अतिरिक्त मुआवजा भी नहीं घोषित किया है। वो कहते हैं कि कर्मचारियों को 12 से 14 घंटे लगे रहना पड़ता है, हम बाकी चीजे तो दे सकते हैं, लेकिन मानसिक धैर्य कैसे दे सकते हैं, जिसका सामना उन्हें इन दिनों करना पड़ रहा है।












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