लक्ष्मी अग्रवाल ने खुद सुनाई एसिड अटैक की वो खौफनाक दास्तां, कहते-कहते छू लिया सबका दिल

गुड मॉर्निंग, जब जागो तभी सवेरा। उसने मेरा चेहरा बदला है दिल नहीं। उसने मेरे फेस पर एसिड डाला है, मेरे सपनों पर नहीं। मैं भी इंसान हूं, मेरे भी सपने थे। क्योंकि मैं एक लड़की हूं। हमारे देश में लड़की के सपनों की कोई वैल्यू नहीं। मेरे भी सपनों की नहीं थी। 2005 की बात है, मेरा सपना था कि मैं सिंगर बनना चाहती थी। उस समय मैं 15 साल की थी। एक 32 साल का लड़का मुझसे शादी करना चाहता था। जब मैंने उसको मना किया तो उसने क्या किया, पूरे दस महीनों तक लगातार मुझे परेशान किया। स्कूल जाती थी, स्कूल से वापस आती थी तो वो मेरा इंतजार करता था, वो कुछ भी बोलता था, वो मुझे थप्पड़ मार देता था क्योंकि उसे पता था कि मेरा एक सपना है, क्योंकि उसे पता था कि मैं अपने घरवालों को बोल नहीं सकती क्योंकि बोलूंगी तो मेरा स्कूल छुड़वा दिया जाएगा, मेरा सपना मार दिया जाएगा।

मैं कुछ करना चाहती थी, मेरे भी सपने थे...

मैं कुछ करना चाहती थी, मेरे भी सपने थे...

मेरे परिवार ने एक दिन मुझसे पूछा कि लक्ष्मी तुम क्या बनना चाहती हो? मैंने कहा कि सिंगर बनना चाहती हूं तो वे हंस पड़े। वे कहने लगे कि लक्ष्मी, सिंगिंग डांसिंग के अलावे कुछ और कर लो, यह सब हमारे घर में नहीं चलता है। मैं बहुत चंचल लड़की थी लेकिन कम बोलती थी। उस टाइम मैं घर से अकेले नहीं जाती थी, हर जगह पापा या मम्मी साथ जाते थे। मैंने पापा-मम्मी से कहा कि दो महीने स्कूल की छुट्टी होने वाली है तो मुझे घर से बाहर निकलना है, मैं जॉब करना चाहती हूं। उन्होंने पहले तो मना किया लेकिन मैंने उनको राजी कर लिया। जॉब करना मेरा मकसद नहीं था, मैं सिंगिंग क्लास ज्वाइन कर आगे कुछ करके दिखाना चाहती थी तभी घरवाले मानते कि मैं भी कुछ कर सकती हूं वरना वो ऐसे नहीं मानते।

उस लड़के ने मुझे फोन किया और...

उस लड़के ने मुझे फोन किया और...

सिंगिंग क्लासेज के लिए मैंने बात की तो उधर से जवाब मिला कि अभी एडमिशन क्लोज हो गया है कि नेक्स्ट डेट पर आपका एडमिशन होगा। मैं बस उस डेट का इंतजार कर रही थी। इसी बीच 19 अप्रैल 2005 को उस लड़के का मैसेज आया कि मैं तुमसे प्यार करता हूं और शादी करना चाहता हूं। मैंने उसको कोई जवाब नहीं दिया तो उधर से उसने मैसेज किया कि अभी जवाब दो लेकिन फिर भी मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने उस मैसेज को डिलीट नहीं किया। अगले दिन मैं खान मार्केट जा रही थी। मैं दिल्ली से हूं और मेरे साथ हादसा खान मार्केट में हुआ था। अगले दिन जब मैं रास्ते में जा रही थी तो उस लड़के का कॉल आया। उस लड़के की बहन मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी। उसके घर में एक ही फोन था जिससे मैं और उसकी बहन बात किया करते थे। उसी फोन से लड़के ने कॉल किया था, मैंने सोचा कि उसकी बहन होगी लेकिन उधर से वो ही बोल रहा था। कहता है कि तुम आगे बढ़ना चाहती हो, कुछ करना चाहती हो न...मैंने कहा कि हां..उसने उधर से कहा कि चलो ठीक है। इसके बाद कॉल डिसकनेक्ट हो गया।

भीड़ मेरे मरने का तमाशा देखती रही

भीड़ मेरे मरने का तमाशा देखती रही

अगले दिन 10.45 पर मैं रोज की तरह रास्ते से जा रही थी तो देखा कि वो लड़का और उसके छोटे भाई की गर्लफ्रेंड मेरा पीछा कर रहे थे। मैं जिधर-जिधर जा रही थी, वो भी पीछे आ रहे थे। वो लड़की मुझे घूरकर देख रही थी। मैं आगे बढ़ रही थी कि एक सेकेंड में सबकुछ खत्म हो गया। उस लड़की ने मुझे जमीन पर धक्का दिया और मेरे चेहरे पर ग्लास से एसिड डाल दिया। बियर की बोतल में वो एसिड लेकर आये थे। मैं बेहोश हो गई। मुझे याद नहीं कि कितनी देर तक बेहोश रही। जब होश आया तो मुझे लगा कि किसी ने मुझे जिंदा आग लगा दिया। मैं बहुत तड़प रही थी, चीख रही थी। मैं फुटपाथ से नीचे गिर गई और अगर बस आती तो शायद मैं नहीं बचती। लोगों की भीड़ मुझे देख रही थी कि मैं कब मरूंगी, वो तमाशा देखते रहे।

पापा ने गले लगाया तो उनकी शर्ट जल गई

पापा ने गले लगाया तो उनकी शर्ट जल गई

तभी अरूण सिंह नाम के अंकल दो लीटर की कोक की बोतल लेकर आए जिसमें आधा पानी था। उन्होंने मेरे फेस पर डाला और पीसीआर बुलाई। जब मैं पीसीआर वैन में जा रही थी तो अपने आपको मैं देख रही थी। मैंने देखा कि प्लास्टिक की पॉलिथीन की तरह मेरी फेस मेल्ट हो रही थी। हॉस्पिटल में मेरे ऊपर बीस बाल्टी पानी डाला गया। मेरे पापा आए और जब मैंने उनको गले लगाया तो उनकी पूरी शर्ट जल गई थी। इतना गंदा वो एसिड था। वहीं से मेरी लाइफ की स्ट्रगल शुरू हो गई। मैं सरकारी हॉस्पिटल में थी। मेरे दो ऑपरेशन हुए। होशोहवाश में मेरी दोनों आंखों को सिला गया। बहुत पेनफुल था। ढाई महीने तक मैं हॉस्पिटल में रही। जब घर गई तो रिश्तेदार जो आए चले गए, आज तक लौटकर नहीं आए, दोस्त थे वो चले गए तो आज तक लौटकर नहीं आए। पड़ोसी आए तो वे कहने लगे कि लड़की के फेस पर क्यों एसिड डाल दिया, बॉडी के किसी और पार्ट में डाल दिया होता। शादी कैसे होगी, चाकू मार दिया होता, गोली मार दिया होता...लड़की है इसे मार दो। मेरे घरवालों ने हिम्मत नहीं हारी।

मैं मरना चाहती थी लेकिन मैंने कहा नहीं...

मैं मरना चाहती थी लेकिन मैंने कहा नहीं...

मुझे पता नहीं था कि एसिड है क्या? मुझे लग रहा था कि नया चेहरा मिला होगा, मैं तो और खूबसूरत हो गई होऊंगी। मुझे तो ऐसी ही परवरिश मिली थी कि लड़की के लिए खूबसूरती बहुत मायने रखती है। मैं अपना चेहरा देखना चाहती थी लेकिन मेरे घर से सारे शीशे हटा दिए गए थे। फिर भी मैंने किसी तरह से खुद को देख लिया तो वो बहुत पेनफुल था। सच में मेरा चेहरा बहुत डरावना हो चुका था, मेरी आंखें निकल चुकी थी, मैं यह देखकर नहीं जीना चाहती थी लेकिन मेरे मन में ख्याल आया कि मैं खुदकुशी से पहले अपने मां-पापा से एक सवाल तो पूछ लूं। जो मां ढाई महीने मेरे लिए नहाई नहीं, जो पिता ढाई महीने मेरे लिए सोए नहीं, इतनी आसानी मैं तो आत्महत्या करके चली जाऊंगी लेकिन मेरे पीछे जो जिंदगियां हैं उनका क्या, वो तो जीवनभर मरेंगे।

पापा ने मेरा हौसला बढ़ाया

पापा ने मेरा हौसला बढ़ाया

तब मैंने अपने पैरेंट्स से बात की क्योंकि मैंने यही गलती एसिड अटैक से पहले की थी कि मैंने पैरेंट्स से कुछ नहीं बताया था। क्योंकि मैंने अपने मन में बना लिया था कि वे मेरी सुनेंगे नहीं। मेरे पापा बहुत प्यारे और पॉजिटिव इंसान थे। उन्होंने मुझे हग किया और मुझे हिम्मत दी। उन्होंने कहा कि इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं है, हर काम मुमकिन है, एक दिन ऐसा वक्त आएगा जब तुमको इसी चेहरे से प्यार होगा और फिर तुम मुझे याद करोगी। 2007 में मैंने दसवीं में एडमिशन लिया। 2009 में मैंने ब्यूटिशियन, कंप्यूटर क्लास जैसे कोर्स एक साथ किए। 2012 में मेरी जिंदगी में बहुत बड़ा चैलेंज आया। मेरे भाई को टीबी हो गया और डॉक्टर ने जब कहा कि वो नहीं बचेगा तो मेरे पापा को हार्ट अटैक हो गया। मेरे घर में एक ही कमानेवाले मेंबर थे, वो भी नहीं रहे। घर को सपोर्ट करनेवाला कोई नहीं था। मां मेरे भाई के साथ हॉस्पिटल में रहती थी। तब मेरे वो सारे सर्टिफिकेट ही बस मेरे साथ थे। अब मुझे ही कुछ करना था लेकिन किसी ने मुझे जॉब नहीं दिया। मैंने कॉल सेंटर तक जाकर बात की लेकिन उन्होंने कहा कि आपका चेहरा देखकर कोई डरेगा। मैंने कहा कि फोन पर कौन मेरा चेहरा देखेगा लेकिन उन्होंने मुझे जॉब नहीं दिया। इसी के साथ मेरी जिंदगी में बहुत सारी चीजें साथ चलने लगी।

एसिड हम सबके दिमाग में है...

एसिड हम सबके दिमाग में है...

2006 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में एसिड बैन करने के लिए पीआईएल डाली जिसका रिजल्ट 2013 में आया। मैं आलोक जी के स्टॉप एसिड अटैक कैंपेन से जुड़ी। वहां मैं और एसिड अटैक सर्वाइवर्स से मिली। उनमें से कुछ ऐसी हैं जो जिंदगीभर नहीं देख सकती। वो बहुत पेनफुल था। जब हम एकजुट हुए तब पता चला कि यह समस्या कितनी बड़ी थी। उस समय हमलोगों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रोटेस्ट किया तब जाकर कोर्ट ने एसिड के खुलेआम बिकने को बैन कर दिया और कहा कि सिर्फ लाइसेंसधारी ही बेच पाएंगे। लेकिन वह भी ठीक से लागू नहीं हो पाया। बहुत जगहों पर एसिड बिकना बंद नहीं हुआ। एसिड बिके या न बिके, दरअसल एसिड हमारे दिमाग में है। एसिड अटैक को रोकना है तो हमारे घर में छोटे-छोटे बच्चों को अच्छी परवरिश देनी होगी और उनको बताना होगा कि खूबसूरती बहुत मायने नहीं रखती है। सब लोग जान गए हैं कि एसिड अटैक क्या होता है, हमारा कैंपेन इंटरनेशनल लेवल पर है। आज एसिड अटैक सर्वाइवर विक्टिम नहीं है, वो अपना चेहरा ढंककर नहीं चलती है, वो फाइटर है...वो किसी की मोहताज नहीं है।

देखिए पूरा वीडियो

लक्ष्मी अग्रवाल, जिन पर बनी फिल्म छपाक 10 जनवरी को रिलीज होने वाली है, उन्होंने जयपुर में फेमस टेड टॉक देते हुए अपने ऊपर हुए अटैक की पूरी कहानी बताई थी। यह स्टोरी उसी वीडियो पर आधारित है। पूरा वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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