बेड की कमी के चलते अस्पतालों ने भर्ती करने से किया मना, चंडीगढ़ ले जाते वक्त ब्रिगेडियर की मौत

दिल्ली से चंडीगढ़ ले जाते वक्त एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने कोरोना के कारण दम तोड़ दिया।

नई दिल्ली, 22 अप्रैल। दिल्ली से चंडीगढ़ ले जाते वक्त एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने कोरोना के कारण दम तोड़ दिया। उनके परिवारजनों ने पहले उन्हें दिल्ली में बनाए गए सेना और डीआरडीओ के अस्पतालों समेत कई अस्पतालों में भर्ती करने की कोशिश की, लेकिन बेडों की कमी के चलते उन्हें भर्ती नहीं किया जा सका। अंत में उन्हें चंडीगढ़ के अस्पताल में भर्ती करने का फैसला लिया गया लेकिन दिल्ली से चंडीगढ़ जाते समय रास्ते में ही कोरोना ने ब्रिगेडिर की जान ले ली।

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    ब्रिगेडियर राशपाल सिंह परमार सेना की इलेक्ट्रांनिक और यांत्रिकी इंजीनियर कोर से रिटायर हुए थे और दिल्ली के पश्चिम विहार में रह रहे थे। जब दिल्ली के प्राइवेट और आर्मी के अस्पतालों में उन्हें भर्ती करने के लिए बेड खाली नहीं मिला तो उनके बेटे ने उन्हें चंडीगढ़ ले जाने का सोचा, लेकिन वह अपने पिता को चंडीगढ़ तक नहीं ले जा सके और रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।

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    इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल, मोहाली में भूतपूर्व सैनिक शिकायत प्रकोष्ठ के अध्यक्ष और ब्रिगेडियर परमार के सीनियर रहे एस एस सोही ने बताया कि दिल्ली के अस्पतालों ने अपने यहां बेड खानी न होने की बात कहकर वापस लौटा दिया था।

    जब सेना के अस्पताल ने उन्हें मना कर दिया तो उनका बेटा उन्हें डीआरडीओ के अस्पताल लेकर गया, लेकिन सारे कागजात दिखाने के बाद भी उन्हें भर्ती नहीं किया गया। इनके अलावा प्राइवेट अस्पतालों ने भी उनकी मदद नहीं की।

    यहां तक की उनके परिवार ने ही ब्रिगेडियर के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम किया और उन्हें चंडीगढ़ किसी प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने के लिए ले गये। इससे पहले की उन्हें भर्ती किया जाता, उन्होंने दम तोड़ दिया।

    एसएस सोही ने इस पर खेद जताते हुए कहा, 'यह चौंकाने वाला है कि दिग्गज लोग भी ऐसे समय में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और उन्हें बेड के लिए इधर से उधर भागना पड़ रहा है। इस आपात स्थिति में सैन्य अस्पतालों को उनके लिए काम करना चाहिए। आम नागरिकों के लिए तमाम अस्पताल खोले जा रहे हैं और हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन कम से कम देश के लिए काम करने वाले लोगों को इस परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।' ब्रिगेडियर परमार 1971 में सेना की इलेक्ट्रांनिक और यांत्रिकी इंजीनियर (ईएमई) कोर में भर्ती हुए थे, वह अपने पीछे अपनी पत्नी और दो बच्चों को छोड़ गए।

    वहीं, दिल्ली में सेना के मुख्यालय स्थित एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इस महामारी के समय में मरीजों की मदद करने के लिए सेना पूरी जिम्मेदारी निभा रही है। उन्होंने आगे कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच देश की मदद करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा, सेना के जो लोग भूतपूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना के सदस्य है उनकी देखभाल के लिए भी पूरी जिम्मेदारी से काम किया जा रहा है। इस समय चिकित्सा कर्मी काम के भारी बोझ के तले दबे हुए हैं इसके बावजूद वह अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। हमें उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

    अधिकारी ने आगे कहा कि सैन्य अस्पतालों में अभी तक किसी भी आम नागरिक को भर्ती नहीं किया गया है, इनमें अभी तक केवल सैन्य पृष्ठभूमि के लोगों या उनके परिजनों को ही भर्ती किया गया है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा संसाधनों को बढ़ाया जा रहा है और दिग्गजों की देखभाल के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।

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