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Delhi Services Bill पास हुआ, अब कैसे बदल जाएगा देश की राजधानी का शासन?

गवर्मेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (अमेंडमेंट) बिल, 2023 (GNCTD ऐक्ट) संसद के दोनों सदनों से पास हो गया है। राष्ट्रपति का हस्ताक्षर होते ही यह अधिनियम का शक्ल ले लेगा। यह अधिनियम उस अध्यादेश की जगह लेगा, जो 19 मई, 2023 से लागू है।

11 मई, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दिल्ली में सरकारी अफसरों की सेवा से संबंधित नियंत्रण पूरी तरह से राज्य की चुनी हुई सरकार के हाथ में आ गया था। लेकिन, अध्यादेश के माध्यम से केंद्र सरकार ने सेवा मामलों पर दिल्ली के उपराज्यपाल को ज्यादा शक्तियां दीं। अध्यादेश अधिकतम 6 महीनों के लिए लागू हो सकता है, जिसे अब संसद के माध्यम से कानून रूप देकर स्थायी बना दिया गया है।

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दिल्ली के शासन में आएगा बड़ा परिवर्तन
GNCTD ऐक्ट में संसद के माध्यम से संशोधन होने के बाद दिल्ली को किस तरह से शासित किया जाएगा, इसमें बहुत बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है। क्योंकि, अब सेवा मामलों को दिल्ली विधानसभा के दायरे से बाहर कर दिया गया है।

सेवा मामलों में केंद्र के पास होगी ज्यादा शक्तियां
केंद्र अब उपराज्यपाल और उसकी ओर से नियुक्त अफसरों के माध्यम से अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग और उनके खिलाफ विजिलेंस जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर नियंत्रण रख सकेगा। साथ ही नया कानून केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार के अधीन काम करने वाले विभिन्न बोर्ड और आयोगों के प्रमुखों और सदस्यों की नियुक्ति की भी शक्ति देगा।

इन मामलों में भी एलजी को अधिकार
यही नहीं, एलजी के पास उन मामलों में भी 'एकमात्र' विवेकाधिकार होगा, जो दिल्ली विधानसभा की विधायी क्षमता से बाहर हैं; और जहां उन्हें किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्यों को करने के लिए कानूनी तौर पर काम करने की जरूरत है।

नेशनल कैपिटल सिविल सर्विस अथॉरिटी का भी प्रावधान बरकरार
इसमें वह प्रावधान भी शामिल है, जिसके तहत तीन सदस्यीय नेशनल कैपिटल सिविल सर्विस अथॉरिटी (NCCSA) की व्यवस्था की गई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री इसके चेयरमैन होंगे और दिल्ली के मुख्य सचिव इसके सदस्य होंगे। जबकि, प्रिंसिपल गृह सचिव इसके सदस्य सचिव होंगे। अध्यादेश में भी यह व्यवस्था थी, जिसपर काफी विवाद रहा है।

सेवा मामलों में इस तरह से होगा केंद्र का अधिक कंट्रोल
दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की शिकायत रही है कि एलजी के माध्यम से केंद्र जिन अधिकारियों की तैनाती करता है, वे चुने हुए प्रतिनिधियों के निर्देशों को नजरअंदाज कर देते हैं। एक अधिकारी के मुताबिक 'NCCSA का फैसला उपस्थित सदस्यों के बहुमत से तय होगा। बैठक के लिए कोरम दो लोगों का होगा। केंद्र की ओर से नियुक्त नौकरशाह सीएम के सुझाव को खारिज कर सकते हैं।' यही नहीं NCCSA जो भी सिफारिशें करेगा, उसपर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उपराज्यपाल का होगा।

मतलब,संसद के कानून से बने किसी बोर्ड आयोग में नियुक्तियां तो केंद्र करेगा ही, दिल्ली विधानसभा से पारित किसी कानून के तहत बनी किसी भी अथॉरिटी, बोर्ड, आयोग या किसी वैधानिक संस्था के सदस्यों या पदाधिकारियों की नियुक्ति भी NCCSA की सलाह पर ही होगी। एक अधिकारी के अनुसार, 'इसका वास्तविक मतलब ये हुआ कि डीईआरसी जैसे विभिन्न बोर्ड और आयोगों के प्रमुखों की नियुक्ति तो केंद्र तय करेगा और दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स जैसी संस्थाओं में नियुक्तियां NCCSA की सलाह पर होगी।'

इन मुद्दों पर भी रहा है विवाद
हालांकि, इस बिल से अध्यादेश के विवादित सेक्शन 3ए को हटा लिया गया है। इसमें राज्य लोक सेवाओं और राज्य लोक सेवा आयोग की चर्चा है, जिसपर दिल्ली विधानसभा के माध्यम से नियंत्रण है। वैसे, संसद से पारित विधेयक कानून का शक्ल लेगा, इसमें यह भी व्यवस्था है कि विभागीय सचिव बिना संबंधित मंत्री से विचार किए मामले को सीधे एलजी, सीएम और चीफ सेक्रेटरी तक ले जा सकते हैं। साथ ही साथ नए विधेयक के बाद एलजी के पास विधान सभा का सत्र बुलाने, स्थगित करने और भंग करने जैसी शक्तियां भी रहेंगी।

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