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Delhi Pollution: इतनी बारिश के बाद भी दिल्ली की हवा सांस लेने लायक हुई या नहीं? AQI पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Delhi Air Quality Index Pollution: दिल्ली में हुई तेज बारिश और आंधी ने मौसम का मिजाज तो बदल दिया, लेकिन जिस राहत की लोगों को उम्मीद थी, वह हवा में नजर नहीं आई। आमतौर पर माना जाता है कि बारिश के बाद प्रदूषण धुल जाता है और हवा साफ हो जाती है, लेकिन इस बार दिल्ली में ठीक उलटा हुआ।

भारी बारिश के बावजूद राजधानी की हवा और ज्यादा जहरीली हो गई। सवाल यही है कि आखिर इतनी बारिश के बाद भी दिल्ली सांस लेने लायक क्यों नहीं बन पाई।

Delhi Air Quality Index Pollution

जनवरी में चार साल की सबसे ज्यादा बारिश, फिर भी राहत नहीं (Delhi Rainfall January 2026)

मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में अब तक दिल्ली में कुल 24 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है। यह 2022 के बाद जनवरी महीने की सबसे ज्यादा बारिश मानी जा रही है।

23 जनवरी को 19.8 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि 27 जनवरी को सफदरजंग में 4.2 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई। इतनी बारिश आमतौर पर प्रदूषण को कम करने के लिए काफी मानी जाती है, लेकिन इस बार हालात कुछ और ही कहानी कह रहे हैं।

बारिश के बाद और बिगड़ी हवा, AQI ने डराया (Delhi AQI Latest Update)

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक 28 जनवरी को दिल्ली का 24 घंटे का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 336 दर्ज किया गया, जो 'बेहद खराब' श्रेणी में आता है। सबसे चिंताजनक हाल वजीरपुर का रहा, जहां AQI 421 तक पहुंच गया। यानी बारिश के बाद भी हालात इतने खराब रहे कि संवेदनशील लोगों के लिए बाहर निकलना जोखिम भरा माना गया।

28 जनवरी के आंकड़ों में थोड़ी राहत जरूर दिखी। तीन दिन बाद पहली बार दिल्ली का औसत AQI 'खराब' श्रेणी में फिसलकर 294 दर्ज किया गया। हालांकि यह राहत भी सीमित मानी जा रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि 29 जनवरी से 1 फरवरी के बीच का समय आउटडोर गतिविधियों के लिए सबसे बेहतर हो सकता है, लेकिन सुबह के समय धुंध और हल्की स्मॉग से इनकार नहीं किया जा सकता।

जनवरी के मध्य में साफ हो जाती है हवा, इस बार क्यों नहीं? (Why Delhi Air Didn't Improve)

आमतौर पर जनवरी के मध्य तक दिल्ली की हवा साफ होने लगती है। लेकिन इस साल यह प्रक्रिया करीब 10 दिन पीछे खिसक गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी वजह जलवायु परिवर्तन, ENSO-neutral स्थिति और उत्तर भारत में असामान्य रूप से ज्यादा बारिश वाला मानसून हो सकता है।

नवंबर में प्रदूषण का पीक, पराली जलाने का समय और कोहरे का आगमन - सब कुछ इस बार अपने तय समय से आगे-पीछे हुआ। नतीजा यह कि दिल्ली एक बार फिर उस समय प्रदूषण संकट में फंस गई, जब आमतौर पर राहत मिलती है।

असल दोषी कौन? पानी छिड़कने से क्यों नहीं बनेगी बात (PM2.5 Pollution Delhi)

दिल्ली की शीर्ष वायु गुणवत्ता संस्था और विशेषज्ञ समितियां बार-बार यह कह चुकी हैं कि PM2.5 प्रदूषण असली खतरा है, न कि सिर्फ PM10। SAFAR सिस्टम के मुताबिक दिल्ली में PM2.5 का बड़ा स्रोत वाहन हैं। 2010 में यह हिस्सा करीब 35 प्रतिशत था, जो 2018 तक बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत हो गया।

हालिया रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत बताया गया है, जिससे भ्रम पैदा हुआ। एक्सपर्ट्स साफ करते हैं कि दिल्ली के कोर इलाके में वाहन प्रदूषण 40-45 प्रतिशत तक योगदान देता है, जबकि शहर से बाहर जाते ही यह हिस्सा कम हो जाता है और बायोफ्यूल, ग्रामीण ईंधन, ईंट भट्ठे और पावर प्लांट्स की भूमिका बढ़ जाती है।

पॉलिसी की चूक और आगे की राह (Delhi Pollution Expert Opinion)

विशेषज्ञों का कहना है कि बिना यह तय किए कि प्रदूषण का स्रोत कहां और कितना है, समाधान कामयाब नहीं हो सकते। सुप्रीम कोर्ट भी यह साफ कर चुका है कि वैज्ञानिक तरीके से उत्सर्जन के स्रोतों की पहचान जरूरी है। सिर्फ सड़कों पर पानी छिड़कना या धूल पर फोकस करना समस्या का हल नहीं है। अगर PM2.5 पर गंभीरता से काम किया जाए, तो न सिर्फ लोगों की सेहत बचेगी बल्कि पानी की बर्बादी भी रुकेगी।

आने वाले दिनों में क्या राहत मिलेगी? (Delhi Air Quality Forecast)

मौसम विभाग के अनुसार, हल्की बारिश के बाद दिल्ली में देर-सर्दियों जैसा पैटर्न लौट सकता है। यानी आसमान साफ रहेगा, दोपहरें थोड़ी नरम होंगी और रातें ठंडी रहेंगी।

हालांकि एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि जब तक वाहन उत्सर्जन और क्षेत्रीय प्रदूषण स्रोतों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक बारिश भी दिल्ली की हवा को पूरी तरह साफ नहीं कर पाएगी।

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