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Delhi High Court ने खारिज की याचिका, तिहाड़ जेल में अफजल गुरु और मकबूल भट्ट की कब्रें बरकरार

Delhi High Court: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार, 24 सितंबर को एक बहुत ही अहम फैसला सुनाया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने तिहाड़ जेल में पार्लियामेंट हमला के दोषी अफजल गुरु और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के संस्थापक मकबूल भट की कब्रें हटाने की याचिका खारिज कर दी है।

बता दें कि दोनों दोषियों को मृत्युदंड दिया गया था और वे जेल परिसर में ही फांसी के बाद दफनाए गए थे। इसके बाद से ही उनकी कब्रें तिहाड़ जेल परिसर में हैं।

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Delhi High Court Verdict: हाई कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में सरकार द्वारा समय पर लिए गए संवेदनशील निर्णय शामिल हैं और एक दशक से अधिक समय बाद उन्हें चुनौती देना उचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में केवल सक्षम प्राधिकरण ही निर्णय ले सकता है और विशेष कानून के बिना न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि लेकिन 12 साल से मौजूद कब्र को हटाना? सरकार ने यह निर्णय मृत्युदंड के समय लिया था, परिवार को शव सौंपने या जेल के बाहर दफनाने के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए। ये बहुत ही संवेदनशील मुद्दे हैं, जिनमें कई पहलुओं का विचार किया गया। क्या हम अब 12 साल बाद इस निर्णय को चुनौती दे सकते हैं?"

याचिका में क्या कहा गया ?

यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ और जितेंद्र सिंह द्वारा दायर की गई थी। याचिका में तिहाड़ जेल परिसर में अफज़ल गुरु और मकबूल भट की कब्रें बनाए रखने को अवैध, असंवैधानिक और सार्वजनिक हित के खिलाफ बताया गया था।

याचिका में यह भी कहा गया कि ये कब्रें तिहाड़ को "रेडिकल तीर्थस्थल" में बदल चुकी हैं, जो चरमपंथी तत्वों को आकर्षित करती हैं और उन्हें दोषी आतंकवादियों की पूजा करने के लिए प्रेरित करती हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था कमजोर होती है और यह धर्मनिरपेक्षता और संविधान के शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।

कब्रों का इतिहास

  • अफज़ल गुरु: 2013 में फांसी के बाद तिहाड़ जेल में दफन।
  • मकबूल भट: 1984 में फांसी के बाद तिहाड़ जेल में दफन।

दिल्ली प्रिजन नियम क्या कहता है?

याचिका में यह भी कहा गया कि दिल्ली प्रिजन नियम, 2018 के अनुसार मृत्युदंडित कैदियों के शवों का निपटान इस तरह से किया जाना चाहिए कि वह तिरस्कार, जेल अनुशासन और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के अनुरूप हो, और किसी भी प्रकार से आतंकवाद की प्रतिष्ठा नहीं बढ़नी चाहिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार ने मृत्युदंड के समय सभी संवेदनशील पहलुओं का ध्यान रखते हुए निर्णय लिया था। ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और कब्रों को हटाने की याचिका खारिज की गई।

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