Delhi Chunav: वोट शेयर बढ़ा, फिर भी 27 साल से सत्ता से बाहर! आखिर दिल्ली में BJP को क्या रोक रहा? जानें 5 वजह
Delhi Election 2025: भारतीय जनता पार्टी (BJP) 1998 से दिल्ली की सत्ता से बाहर है। दिल्ली उत्तर भारत का एकमात्र राज्य है, पंजाब को छोड़कर, जहां भाजपा पार्टी ने पिछले दो दशकों में सत्ता का स्वाद नहीं चखा है। दिल्ली में भाजपा की आखिरी मुख्यमंत्री दिवंगत सुषमा स्वराज थीं, जिन्होंने 1998 में 52 दिनों के लिए शीर्ष पद संभाला था। तब से भाजपा लगातार छह विधानसभा चुनाव 1998, 2003 और 2008 कांग्रेस से और 2013, 2015 और 2020 - आम आदमी पार्टी (आप) से हार चुकी है।
70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के लिए चुनाव 5 फरवरी 2025 को होने हैं। नतीजे 8 फरवरी को घोषित किए जाएंगे। भाजपा 27 साल बाद दिल्ली में सत्ता में वापसी के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। भाजपा ने दिल्ली में "परिवर्तन" का नारा दिया है। भाजपा अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आप के खिलाफ उसके दस साल के शासन के दौरान लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लक्षित अभियान चला रही है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते रोहिणी इलाके में एक रैली को संबोधित करते हुए बदलाव का आह्वान किया। पीएम मोदी ने कहा, "आप दा (आप) नहीं सहेंगे, बदल कर रहेंगे।" यह आगामी चुनावों के लिए भाजपा के चुनावी नारे को गढ़ने जैसा है।
Delhi BJP Vote: 7 साल में भाजपा का वोट प्रतिशत 5% बढ़ा
पिछले चुनावे आंकड़ों पर नजर डाले तो भाजपा के वोट प्रतिशत में भी बढ़ोतरी हुई है लेकिन फिर भी वह इसको सीट जीतने में नहीं बदल पाई है। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से 5 सीट पीछे रह गई थी। भाजपा ने 33.07% वोट हासिल करके 31 सीटें जीत हासिल की थी।
2015 में चुनाव हुए तो भाजपा का वोट शेयर 0.88% घटकर 32.19% हुआ था। लेकिन पार्टी ने 28 सीटें गवां दी थी। 2020 के चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 5.44% बढ़कर 38.51% हो गया लेकिन भाजपा सिर्फ 8 सीटें ही जीत सकी थी।
Delhi Chunav 2025: आइए नजर डालें भाजपा की 5 कमजोरियों पर?
🔴 1. किसी मजबूत सीएम का चेहरा ना होना
दिल्ली में भाजपा के अभियान की सबसे बड़ी कमी कांग्रेस की शीला दीक्षित और आप के केजरीवाल के मुकाबले किसी लोकप्रिय चेहरे का न होना है। भाजपा ने 2015 में पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को अपना चेहरा बनाया था। बेदी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अहम हिस्सा थीं। लेकिन यह कदम कारगर नहीं रहा।
2014 में राष्ट्रीय स्तर पर लहर चलने के बावजूद भाजपा चुनाव हार गई। केजरीवाल की छवि एक साधारण और ईमानदार नेता के रूप में उभरकर सामने आई थी, जो दिल्ली के लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता देता है। इसके विपरीत भाजपा की राजनीति अक्सर दिल्ली के स्थानीय मुद्दों से अधिक राष्ट्रीय राजनीति पर आधारित रही है।
🔴 2. कल्याणकारी योजनाओं का कोई तोड़ नहीं
भाजपा अब तक महिलाओं और पुजारियों को मानदेय जैसे आप के वादों से निपटने के लिए घोषणा करने में विफल रही है। मोदी ने यह भी कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो वह उन कल्याणकारी योजनाओं को बंद नहीं करेगी, जो आप अपने पिछले दो कार्यकालों में दिल्ली में चला रही है।
भाजपा का 12 आरक्षित और 8 अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर जीत का खराब रिकॉर्ड है। पार्टी 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में इनमें से एक भी सीट जीतने में विफल रही।
🔴 3. दलबदलुओं पर बड़ा दांव लगाना
भाजपा ने आप और कांग्रेस से आए दलबदलुओं पर बड़ा दांव लगाया है। पार्टी ने अब तक 8 बाहरी लोगों को मैदान में उतारा है जो आप और कांग्रेस से पार्टी में आए हैं। कुछ पार्टी नेताओं का दावा है कि ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष है।
🔴 4. झुग्गी-झोपड़ियों में वोट बैंक का ना होना
दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) की बढ़ती ताकत भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। AAP की स्थानीय उपस्थिति और केजरीवाल का प्रभाव भाजपा के लिए एक मजबूत चुनौती है, जिससे पार्टी को दिल्ली चुनाव में मुकाबला करना होगा।
भाजपा के लिए आप के खिलाफ मुकाबला कठिन है, क्योंकि झुग्गी-झोपड़ियों, अनाधिकृत कॉलोनियों, अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों, निम्न मध्यम वर्गीय इलाकों में उसका मजबूत समर्थन आधार नहीं है। जब वोट देने की बात आती है तो यही झुग्गी-झोपड़ियों, अनाधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। भाजपा के वोट बैंक में शामिल शहरी लोग झुग्गी-झोपड़ियों के मुकाबले कम वोट देते हैं।
🔴 5. भाजपा में नेतृत्व का संकट
भाजपा का नेतृत्व दिल्ली में अपनी राजनीति को लेकर संघर्ष कर रहा है। पार्टी में स्थानीय नेताओं की कमी और केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति लोगों का विरोध, भाजपा के लिए एक प्रमुख समस्या बन सकता है। दिल्ली भाजपा के अंदर कई गुट हैं, जो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से बेहतर सामंजस्य की मांग करते हैं। यह पार्टी की एकता और चुनावी सफलता को प्रभावित कर सकता है।












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