दिल्ली कोर्ट ने दाती महाराज के खिलाफ तय किए बलात्कार के आरोप, भाई अशोक और अर्जुन के नाम भी शामिल
Daati Maharaj News: दिल्ली की एक अदालत ने स्वयंभू धर्मगुरु दाती महाराज और उसके भाइयों अशोक और अर्जुन के खिलाफ बलात्कार, अप्राकृतिक अपराध और आपराधिक धमकी के आरोप तय किए हैं। एडिशनल सेशन जज नेहा (विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट) की ओर से इस मामले में कहा गया कि आरोपों पर आदेश पारित किया गया और आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए।
इस बीच अदालत ने मामले में दाती के एक अन्य भाई अनिल को आरोपमुक्त कर दिया। अदालत ने स्वयंभू संत दाती महाराज और उनके भाइयों अशोक और अर्जुन के खिलाफ बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध और आपराधिक धमकी के आरोप में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

7 जून, 2018 को दर्ज कराई थी शिकायत
यह कार्रवाई 7 जून, 2018 को दक्षिण दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस स्टेशन में दाती महाराज और उनके तीन भाइयों के खिलाफ एक शिष्य द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद की गई है। शिकायत के बाद चार दिन बाद उन पर बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध, छेड़छाड़ और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत एक समान इरादे से काम करने का आरोप लगाते हुए एक प्राथमिकी दर्ज की गई।
इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई को गति दी है, जिसमें आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया है और मुकदमे का विकल्प चुना है। पीड़िता के वकील प्रदीप तिवारी ने कहा कि अदालत ने दाती महाराज उर्फ मदन लाल राजस्थानी और उनके भाइयों अशोक और अर्जुन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 376 (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 506 (आपराधिक धमकी) और 34 (सामान्य इरादे) के तहत आरोप तय किए हैं।
18 अक्टूबर की तारीख तय
अदालत ने अभियोजन पक्ष को अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए 18 अक्टूबर की तारीख तय की है। इस मामले ने तब काफी सुर्खियां बटोरीं, जब शिष्या ने दाती महाराज पर दिल्ली और राजस्थान में अपने आश्रमों में उसके साथ बलात्कार करने का आरोप लगाया।
दिल्ली पुलिस द्वारा प्रारंभिक जांच के बाद, पुलिस द्वारा जांच के संचालन पर चिंताओं का हवाला देते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था।
बाबा और उसके भाई पर कराई थी शिकायत दर्ज
बता दें कि स्वयंभू बाबा और उसके तीन भाइयों - अशोक, अनिल और अर्जुन के खिलाफ 7 जून, 2018 को दक्षिण दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस स्टेशन में दाती की एक शिष्या ने बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई थी और 11 जून को आईपीसी के तहत बलात्कार, अप्राकृतिक यौन संबंध, छेड़छाड़ और सामान्य इरादे के कथित अपराधों के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
22 जून को पुलिस ने दाती से पूछताछ की, जिस पर दिल्ली और राजस्थान के अपने आश्रमों में शिष्या के साथ बलात्कार करने का आरोप है। बाद में मामला अपराध शाखा को सौंप दिया गया, जिसने 1 अक्टूबर को आरोपपत्र दाखिल किया। 3 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर उठाए थे सवाल
दिल्ली पुलिस के आचरण की निंदा करते हुए कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने के बाद भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया। 26 अक्टूबर को एजेंसी ने दाती और उसके तीन भाइयों के खिलाफ 9 जनवरी, 2016 को फतेहपुर बेरी स्थित अपने आश्रम में 25 वर्षीय महिला के साथ कथित रूप से बलात्कार करने और पीड़िता के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की।
3 अक्टूबर के आदेश के खिलाफ धर्मगुरु की याचिका शुरू में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई थी, जिसने उन्हें अपनी शिकायत के साथ उच्च न्यायालय जाने को कहा था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने 14 नवंबर, 2018 को समीक्षा याचिका खारिज कर दी। जनवरी 2019 में एक सत्र अदालत ने आरोपी व्यक्तियों को अंतरिम जमानत दे दी। सीबीआई ने 4 सितंबर, 2020 को मामले में एक पूरक आरोपपत्र दायर किया।
पीड़िता ने निराशा की व्यक्त
एकवोकेट तिवारी ने कहा, "न्याय में देरी न्याय से वंचित करने के समान है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने दिसंबर 2019 में अपनी कार्यवाही शुरू की और आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में लगभग पांच साल लगा दिए। ऐसे संवेदनशील और गंभीर मामलों में देरी ना केवल पीड़ितों का मनोबल तोड़ती है, बल्कि न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करती है। यह आरोपियों के साहस को मजबूत करता है और उन्हें सबूतों से छेड़छाड़ करने और गवाहों को प्रभावित करने का मौका देता है, जिससे मुकदमे पर ही असर पड़ता है।"
पीड़िता के वकील ने कहा, "हमने पीड़िता के लिए पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उसने भी अदालत को धमकियों और अपनी चिंताओं से अवगत कराया है, लेकिन फिर भी हमारे सर्वोत्तम प्रयासों को कोई महत्व नहीं दिया गया है और ऐसा लगता है कि अदालत उसकी सुरक्षा के लिए कोई आदेश पारित करने के लिए इच्छुक नहीं है।"












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