विश्वभूषण हरिचंदन बने छत्तीसगढ़ के नौवें राज्यपाल, राजभवन में ली शपथ, जानिए उनके बारे में
विश्वभूषण हरिचंदन उन्हें जुलाई 2019 में आंध्र प्रदेश का 23वां राज्यपाल नियुक्त किया गया था,अब छत्तीसगढ़ के राज्यपाल हैं। ओडिशा की राजनीति के दिग्गज हरिचंदन 5 बार ओडिशा की राज्य विधानसभा के लिए चुने जा चुके हैं।
GOVERNOR OF CHHATTISGARH: छत्तीसगढ़ के नए राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन ने गुरुवार राजधानी रायपुर स्थित राजभवन के दरबार हॉल में आयोजित गरिमामय समारोह में छत्तीसगढ़ के नौवें राज्यपाल के रूप में अपने पद की शपथ ली। वह पूर्व राज्यपाल अनुसुइया उइके के स्थान पर छत्तीसगढ़ के संवैधानिक प्रमुख हैं। आइये राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के बारे में विस्तारपूर्वक जानते हैं।

बने छत्तीसगढ़ के नौवें राज्यपाल
राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन को उच्च न्यायालय, बिलासपुर के मुख्य न्यायधिपति न्यायमूर्ति अरूप कुमार गोस्वामी ने उन्हें शपथ दिलाई। इस अवसर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत प्रथम महिला सुप्रभा हरिचंदन भी उपस्थित रहीं।
राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के छत्तीसगढ़ के शपथ ग्रहण बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुष्पगुच्छ भेंटकर अभिवादन किया और शुभकामनाएं दी। उन्होंने ट्विट करके लिखा कि माननीय राज्यपाल बिस्वा भूषण हरिचंदन जी के छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के रूप में शपथ ग्रहण उपरांत पुष्पगुच्छ भेंटकर अभिवादन किया। हम सब छत्तीसगढ़ वासियों की ओर से शुभकामनाएं।

पिता थे आज़ादी के नायक
छत्तीसगढ के राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के पिता का नाम स्वर्गीय परशुराम हरिचंदन है,जो कि एक साहित्यकार, नाटककार और स्वतंत्रता सेनानी थे। 3 अगस्त 1934 को ओडिशा के खोरधा जिले के बानपुर में जन्म लेने वाले विश्वभूषण हरिचंदन ने एस.सी.एस. कॉलेज, पुरी से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री, एम.एस. लॉ कॉलेज, कटक से एल.एल.बी. की डिग्री ली है। उनकी पत्नी का नाम सुप्रभा हरिचंदन है।

पिता थे आज़ादी के नायक
छत्तीसगढ के राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के पिता का नाम स्वर्गीय परशुराम हरिचंदन है,जो कि एक साहित्यकार, नाटककार और स्वतंत्रता सेनानी थे। 3 अगस्त 1934 को ओडिशा के खोरधा जिले के बानपुर में जन्म लेने वाले विश्वभूषण हरिचंदन ने एस.सी.एस. कॉलेज, पुरी से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री, एम.एस. लॉ कॉलेज, कटक से एल.एल.बी. की डिग्री ली है। उनकी पत्नी का नाम सुप्रभा हरिचंदन है।
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आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल रहे, कानून के हैं प्रकांड पंडित
विश्वभूषण हरिचंदन उन्हें जुलाई 2019 में आंध्र प्रदेश का 23वां राज्यपाल नियुक्त किया गया था,अब छत्तीसगढ़ के राज्यपाल हैं। उन्हें 1962 में ओडिशा के उच्च न्यायालय बार और वर्ष 1971 में भारतीय जनसंघ में शामिल हुए। उन्होंने काफी कम समय में अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर एक वकील और एक राजनीतिक नेता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की।
उन्होंने ऐतिहासिक जे.पी. आंदोलन में लोकतंत्र के समर्थन की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिसके लिए उन्हें आपातकाल के दौरान कई महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन एक्शन कमेटी के अध्यक्ष के रूप में हरिचंदन ने 1974 में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के अधिक्रमण के खिलाफ ओडिशा में वकीलों के आंदोलन का नेतृत्व किया।

5 बार रहे हैं विधायक
ओडिशा की राजनीति के दिग्गज हरिचंदन 5 बार ओडिशा की राज्य विधानसभा के लिए वर्ष 1977, 1990, 1996, 2000 और 2004 में चुने जा चुके हैं। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में 95,000 मतों के अंतर से जीत हासिल की थी , जिसने ओडिशा में पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। हरिचंदन ओडिशा सरकार में 4 बार मंत्री रहे हैं।
वर्ष 1977, 1990, 2000 मेेेें तथा 2004 से 2009 तक वे मंत्री बने रहे और अपने मंत्रिस्तरीय कार्यकाल के दौरान उन्होंने राजस्व, कानून, ग्रामीण विकास, उद्योग, खाद्य और नागरिक आपूर्ति, श्रम और रोजगार, आवास, सांस्कृतिक मामले, संसाधन विकास विभाग,मत्स्य पालन और पशु-पालन जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला।

ओड़िसा में किया भाजपा को स्थापित
हरिचंदन 1980 में ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे और 1988 तक तीन और कार्यकालों के लिए अध्यक्ष चुने गए। वे 13 वर्षों तक यानी 1996 से 2009 तक राज्य विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता भी रहे। मंत्री मंडल में रहते हुए उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं निभाई, जिसके लिए वे सदैव जनता की नजरों में भी बने रहे। वह हमेशा लोगों के मुद्दों को उठाते हैं और उनके लिए लड़ते रहें हैं, जिस कारण से प्रशासकों और राजनेताओं द्वारा उनका बहुत सम्मान किया जाता है, भले ही वे किसी भी पार्टी से जुडे़ रहे।

साहित्यकार भी हैं हरिचंदन
उन्होंने छह एकांकी नाटक भी लिखे जो इस प्रकार हैं - मरुभताश, राणा प्रताप, शेष झलक, जो मेवाड के महारानी पद्मिनी पर आधारित है। अष्ट शिखा, जो तपांग दलबेरा के बलिदान, पर आधारित है।
मानसी, (सामाजिक) और अभिशप्त कर्ण, (पौराणिक) नाटक है। उनकी 26 लघु कथाओं के संकलन का नाम ‘‘स्वच्छ सासानारा गहन कथा‘‘ है, तथा ‘‘ये मतिर डाक‘‘ उनके कुछ चुनिंदा प्रकाशित लेखों का संकलन है। ‘‘संग्राम सारी नहीं", उनकी आत्मकथा है, जिसमें उनके लंबे सार्वजनिक जीवन के दौरान राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य क्षेत्रों में उनके संघर्षों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
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