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Naxalite news: कांग्रेस की नरमी से मोदी सरकार की सख्ती तक, जानें कैसे बदला भारत का नक्सल विरोधी अभियान

Naxalite news: भारत में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर है। जिस संघर्ष ने वर्षों तक निर्दोष लोगों की जान ली, विकास को रोका और देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दी, अब वही जंग मजबूती और स्पष्ट रणनीति के साथ लड़ी जा रही है।

जहां एक ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग (UPA) शासन के दौरान भ्रम, ढुलमुल नीति और वैचारिक दुविधा ने नक्सलियों को फलने-फूलने का मौका दिया। वहीं आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रहा है।

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यूपीए शासन विफल रणनीति से भारी नुकसान

2004 से 2014 तक के कांग्रेस शासनकाल में नक्सलवाद से निपटने में नीतिगत स्पष्टता का अभाव था। नक्सलियों के साथ बार-बार वार्ता की विफल कोशिशों ने उन्हें regroup करने का मौका दिया। 2010 में दंतेवाड़ा हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत और 2013 में दरभा घाटी हमला, जिसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मारे गए, नीतिगत विफलता के ज्वलंत उदाहरण हैं।

यूपीए सरकार के निर्णयों में न तो सख्ती थी और न ही समन्वय। ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसी मुहिमें बिना मजबूत योजना और राजनीतिक इच्छा के चलती रहीं। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) में कुछ ऐसे सदस्य थे जो माओवादी विचारधारा के प्रति नरम रुख रखते थे।

2004 में जहां 1,533 नक्सली घटनाएं हुई थीं, वहीं 2010 में यह संख्या बढ़कर 2,213 हो गई। नक्सली हमलों में मौतों का आंकड़ा भी 566 से बढ़कर 1,005 हो गया।

मोदी सरकार का दृष्टिकोण: सुरक्षा के साथ विकास का दोहरा प्रहार

2014 के बाद मोदी सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए बहु-आयामी रणनीति अपनाई। 2015 में शुरू की गई "नेशनल पॉलिसी एंड एक्शन प्लान" के तहत एक ओर जहां नक्सलियों पर निर्णायक कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी विकास को गति दी गई।

जनवरी 2024 में शुरू हुआ ऑपरेशन कागर, अब तक का सबसे बड़ा नक्सल विरोधी अभियान है, जिसका लक्ष्य मार्च 2026 तक नक्सलियों का सफाया करना है। इस अभियान में 24,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी, उन्नत ड्रोन, खुफिया तंत्र और स्थानीय जानकारी के सहारे नक्सल गढ़ों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है।

अब तक 1,600 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, दर्जनों शीर्ष नेता मारे गए हैं और उनकी कमांड संरचना टूट रही है। कर्रगुट्टालू जैसे इलाकों में हथियारों के भंडार, विस्फोटक और यहां तक कि गुप्त अस्पताल भी जब्त किए गए हैं।

विकास के जरिए विश्वास की बहाली

सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ सरकार ने सड़क, संचार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास कार्य किए हैं। अब तक 7,700 मोबाइल टावर, हजारों किलोमीटर सड़कें, नए स्कूल, अस्पताल और कौशल केंद्र बनाए जा चुके हैं। इससे नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 के 35 से घटकर 2025 में सिर्फ 6 जिलों तक सिमट गई है।

जब सरकार decisive phase में है, कांग्रेस और वामपंथी दल फिर से उनसे बात चीत की बात कर रहे हैं। यह वही गलती है जो अतीत में कई बार हो चुकी है, जब बातचीत के नाम पर नक्सलियों को regroup करने का मौका मिला। कांग्रेस के कुछ नेता तो अब भी नक्सलियों के लिए हमदर्दी जताते हैं, जो न केवल सुरक्षाबलों के मनोबल को गिराता है बल्कि देश की छवि को भी नुकसान पहुंचाता है।

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार का आक्रामक रुख

छत्तीसगढ़ में उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट कर दिया है कि जब नक्सली पीछे हट रहे हैं, तब किसी भी प्रकार की वार्ता नहीं की जाएगी। राज्य में दर्जनों नए सुरक्षा कैंप खोले गए हैं, अंतरराज्यीय अभियानों में तेजी आई है और नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए हर स्तर पर दबाव बनाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सरकार ने यह साबित कर दिया है कि मजबूती, रणनीति और विकास से नक्सलवाद को हराया जा सकता है। अब लड़ाई केवल सैन्य नहीं है, यह भरोसे, विकास और न्याय की लड़ाई है।

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