दो दशक बाद नक्सलियों के गढ़ में होगी वोटिंग, ग्राउंड से जानिए सिलगेर गोलीबारी की घटना से क्यों डरे हुए वोटर?

Chhattisgarh Assembly Election 2023: सुकमा जिले के कोंटा विधानसभा और बीजापुर के सरहद पर बसे घोर नक्सल प्रभावित गांव सिलगेर में दो दशक बाद मतदान होने जा रहा है। प्रथम चरण में होने वाले मतदान में सिलगेर व आस-पास के 6 गांव के करीब 890 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इसमें से कई ऐसे भी हैं जो पहली बार लोकतंत्र के महापर्व का हिस्सा बनेंगे।

प्रशासन की तरफ से जोर शोर से मतदान कराने की तैयारी की जा रही है लेकिन जिले के अंतिम छोर पर बसे सिलगेर में मतदान को लेकर सन्नाटा पसरा हुआ है। लोगों में मतदान को लेकर कोई रूचि नहीं दिख रहा हैं। साल 2021 में हुए सिलगेर गोली कांड को लेकर आदिवासियों में आज भी नाराजगी नजर आ रही है।

Sukma Konta, 890 voters

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के पहले चरण में बस्तर के 12 सीटों पर 7 नवंबर को निर्वाचन होने हैं। शांतिपूर्ण और सुरक्षित निर्वाचन को लेकर प्रशासन की तैयारियां जारी हैं। सिलगेर में दो दशक बाद मतदान केन्द्र बनाया गया है।

20 साल के बाद हो रहे मतदान को लेकर वन इंडिया हिंदी के संवाद सूत्र सिलगेर गांव पहुंच कर ग्रामीणों से बातचीत की। विधानसभा चुनाव को लेकर ग्रामीणों में खामोशी नजर आई। कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। बातचीत के दौरान पता चला कि सिलगेर के ग्रामीणों ने आखिरी बार 2003 में अपने मताधिकार का प्रयोग किया है।

उसके बाद से क्षेत्र की संवेदनशीलता और प्रशासन की बेरुखी के कारण सिलगेर के मतदाता देश-दुनिया से कट गए। पंचायत, विधानसभा और लोकसभा चुनाव में सिलगेर का मतदान केन्द्र गांव से करीब 10 किमी दूर गोंदपल्ली और जगरगुंडा में शिफ्ट कर दिया गया। माओवादी दहशत और चुनाव बहिष्कार के चलते ग्रामीण निर्वाचन में भाग लेने से वंचित रह गए।

सिलगेर गोली कांड के खिलाफ आंदोलन जारी

सिलगेर गोली कांड को लेकर आज भी गांव के बाहर आंदोलन जारी है। हालांकि आंदोलन का स्वरूप बदल गया है। आचार संहिता लागू होने की वजह से 5 लोगों को धरने पर बैठने की अनुमति दी गई है। जिसके चलते आदिवासी बारी-बारी आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर आंदोलनरत ग्रामीणों ने बताया कि गोलीकांड में मारे गए ग्रामीणों को न्याय मिल सका है और न आर्थिक मदद की पहल की गई है।

बता दें कि मई 2021 पुलिस कैंप के विरोध में आदिवासियों और सुरक्षाबलों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद फायरिंग में 3 ग्रामीणों की जान चली गई। वहां भगदड़ में एक महिला घायल हो गई जिससे 3 दिन बाद मौत हो गई।

बुनियादी सुविधाओं को धरातल पर उतारने की कोशिश जारी

बुनियादी सुविधाओं को तरसता सिलगेर गांव में दशकों बाद प्रशासन ने दखल दी है। पुलिस कैंप की स्थापना के बाद जिला प्रशासन की ओर से सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को धरातल में उतारने का प्रयास जारी है। गांव को चिरते हुए निकली 15 फीट चौड़ी निर्माणाधीन सड़क ने माओवादी दहशत को बहुत हद तक दूर कर दिया है।

सिलगेर में ही सीआरपीएफ की मदद से बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए बालक आश्रम का संचालन किया जा रहा है। जिसमें 100 से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सर्दी-खांसी जैसी मामूली बीमारियों के इलाज के लिए मीलों सफर पर रोक लग गया है। गांव में ही स्वास्थ्य सुविधा मिलने लगी है। ग्रामीण भी गांव में मिल रही सुविधाओं से खुश है लेकिन उनके दिलों में बैठा दहशत उन्हें खुलकर इजहार करने से रोक रहा है।

बस्तर के अंदरूनी इलाकों में आज भी माओवादियों की समानांतर सरकार चलती है। यही वजह है कि माओवादी हर चुनाव का बहिष्कार करते हैं। जिसके चलते नक्सल प्रभावित इलाके के हजारों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह जाते हैं। गोली कांड के बाद देश-दुनिया की नजरों में आने के बाद शासन-प्रशासन द्वारा सिलगेर के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास तो जरूर किया गया।

लेकिन ग्रामीणों में जागरूकता की कमी को दूर करने में प्रशासन विफल साबित हो रहा है। सिलगेर के दर्जनों युवाओं के नाम वोटर लिस्ट में नहीं जोड़े गए। चुनाव को लेकर मतदाता जागरूकता अभियान भी नहीं चलाया गया। पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधि से भी उम्मीदें कैसे करें। ग्रामीणों को सरपंच का चेहरे देखे सालों बीत गए हैं।

संवाद सूत्र: शेख सलीम, सुकमा/छत्तीसगढ़

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