Moonlighting के फेर में जा सकती है आपकी नौकरी? क्यों बरपा हंगामा, क्या कहता है भारतीय कानून?

नई दिल्ली। अगर आप नौकरी की शिफ्ट ख़त्म करने के बाद, यूट्यूब पर व्यूज जुटाकर, इंस्टा पर लाइक्स बढ़ाकर या ऑनलाइन-ऑफलाइन ट्यूशन पढ़ाकर या कोडिंग का कमाल दिखाकर थोड़ी एक्स्ट्रा कमाई करते हैं तो ये खबर आपको निश्चित तौर पर पढ़नी चाहिए। सैलरी के बाद कुछ एक्स्ट्रा मिले तो किसे बुरा लगता है? लेकिन इस चक्कर में नौकरी ही चली जाए तो? जी हां हाल ही में आईटी कंपनी विप्रो(Wipro) के 300 कर्मचारियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। देश की दिग्गज आईटी कंपनी विप्रो ने अपने 300 कर्मचारियों पर मूनलाइटिंग का आरोप लगाते हुए उन्हें नौकरी से निकाल दिया। जिस मूनलाइटिंग(Moonlighting) की वजह से 300 लोगों की नौकरी एक झटके में चली गई, उसे समझना जरूरी है। ये मूनलाइटिंग आख़िर है क्या और ये शब्द आया कहां से? पिछले कुछ दिनों ने 'मूनलाइटिंग' शब्द काफी प्रचलित है। टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स और आईटी कंपनियों के बीच इसे लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। अगर आप नौकरीपेशा हैं तो आपको भी इसके बारे में जरूर जानना चाहिए। हम आपको आज न केवल मूनलाइटिंग के बारे में बता रहे हैं बल्कि भारतीय कानून इसे लेकर क्या कहता है इसकी भी जानकारी देते रहे हैं।

 क्या है मूनलाइटिंग

क्या है मूनलाइटिंग

साधारण भाषा में समझे तो जब कोई कर्मचारी अपनी नियमित नौकरी के साथ ही बिना कंपनी को जानकारी दिए चोरी-छिपे दूसरी जगह भी काम करता है तो उसे तकनीकी तौर पर 'मूनलाइटिंग' कहा जाता है। कोरोना महामारी के दौरान जब कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की शुरुआत की तो भारत में मूनलाइटिंग में तेजी से विस्तार हुआ। इसके खिलाफ मोर्चा खोलने वाले विप्रो के चेयरमैन ऋषद प्रेमजी (Rishad Premji) कहते हैं कि इससे न केवल कर्मचारियों की कार्यकुशलता प्रभावित होती है, बल्कि कंपनियों की सुरक्षा भी खतरे में आ जाती है।

 क्यों हो रही है Moonlighting की चर्चा

क्यों हो रही है Moonlighting की चर्चा

भारत में इन दिनों मूनलाइटिंग की खूब चर्चा हो रही है। आईटी प्रोफेशनल्स के बीच इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है। जहां कुछ कंपनियां इसका समर्थन कर रही है तो वहीं बड़ी आईटी कंपनियां इसका विरोध कर रही है। जिसके कारण खासकर आईटी सेक्टर में नई बहस शुरू हो गई है। जब विप्रो (Wipro) ने अपने 300 कर्मचारियों को मूनलाइटिंग के आरोप में नौकरी से बाहर निकाला तो भारत में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया। विप्रो के इस कदम के बाद आईटी कंपनी इंफोसिस( Infosysy), आईबीएम (IBM) और टीसीएस (TCS) ने भी अपने कर्मचारियों को इंटरनेट मेल लिखकर इसके बारे में आगाह किया है।

 कहीं समर्थन तो कहीं विरोध

कहीं समर्थन तो कहीं विरोध

जहां बड़ी आईटी कंपनियां इसका विरोध कर रही है तो वहीं हाल ही में फूड डिलीवरी कंपनी स्विगी (Swiggy) ने अपने यहां मूनलाइटिंग को मंजूरी दी है। कंपनी ने कहा कि वर्किंग ऑवर्स के बाद कर्मचारी चाहे तो दूसरे प्रोजेक्ट पर काम कर सकते हैं। स्विगी के अलावा टेक महिंद्रा के सीईओ सीपी गुरनानी ने इसका समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि हमें समय के साथ बदलते रहना चाहिए और अगर कर्मचारी आवर के घंटे खत्म होने के बाद दूसरा काम करते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं। कंपनियों के साथ-साथ केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एंड स्किल डेवलपमेंट मंत्री राजीव चेंद्रशेकर ने बड़ा बयान देते हुए मूनलाइटिंग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि कंपनियों को कर्मचारियों के सपनों पर लगाम नहीं लगाना चाहिए।

 क्या कहता है कानून

क्या कहता है कानून

बहस के बाद ये जानना भी जरूरी है कि मूनलाइटिंग को लेकर कानून क्या कहता है। भारत में कारखाना अधिनियम, 1948 के तहत दोहरे रोजगार पर प्रतिबंध है। हालांकि देश के कई राज्यों में आईटी कंपनियों को इस नियम से छूट दी गई है। वहीं भारतीय श्रम कानूनों में मूनलाइटिंग के संबंध में कोई विशेष क़ानून नहीं है। यानी स्पष्ट है कि अगर हम कानून की बात करें तो इसे लेकर कोई खास कानून नहीं है, जो भी नियम है वो फैक्ट्री और लेबर्स के लिए हैं, जिसके मुताबिक अगर आपके जॉब कॉन्ट्रैक्ट में सिंगल एम्पॉयमेंट या नॉन कम्पीट है तो आप मूनलाइटिंग यानी सेकेंड जॉब नहीं कर सकते हैं। ऐसा करते हुए पाए जाने पर आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वहीं अगर आपके जॉब कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा कोई क्लॉज नहीं है तो आप तो आप सेकेंड जॉब कर सकते हैं, लेकिन ये जरूरी है कि आप सबसे पहले अपने कॉन्ट्रैक्ट को ध्यान से पढ़ें।

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