भारत में बंद हो सकते हैं कागज के नोट, RBI लाने जा रहा है नई करेंसी, बदलने वाला है ₹100, ₹500 और ₹2000 का Note

क्या आपकी जेब में रखा कागज का नोट कभी पानी में भीगकर गला है? या फिर सब्जी मंडी में खरीदारी करते समय फटा हुआ नोट मिलने पर आपकी किसी से बहस हुई है? अगर हां, तो अब इस झंझट से हमेशा के लिए राहत मिलने वाली है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश की करेंसी के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। खबरों की मानें तो सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो बहुत जल्द आपके हाथ में कागज के बजाय प्लास्टिक के चमचमाते कड़क नोट होंगे।

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई ने नोटों की छपाई पर होने वाले भारी-भरकम खर्च को कम करने और फटे-पुराने नोटों की समस्या से निपटने के लिए अपनी एक दशक पुरानी योजना की फाइलें दोबारा खोल दी हैं। पटना और मुंबई में हुई केंद्रीय बैंक की हालिया बोर्ड बैठकों में इस मुद्दे पर बेहद गंभीर चर्चा हुई है। इसके बाद कैश के इस्तेमाल का पूरा तरीका बदलने वाला है।

What Are Polymer Banknotes

क्या होते हैं प्लास्टिक नोट और कागज से ये कैसे अलग हैं? (What Are Polymer Banknotes)

जब हम 'प्लास्टिक नोट' कहते हैं, तो कई लोगों को लगता है कि ये आपके एटीएम कार्ड या क्रेडिट कार्ड की तरह कड़े और वजनी होंगे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसे तकनीकी भाषा में 'पॉलिमर नोट' (Polymer Banknote) कहा जाता है। ये नोट कॉटन (कपास) से बने पारंपरिक कागज के बजाय प्लास्टिक की एक बेहद पतली और लचीली परत (Substrate) पर छापे जाते हैं।

ये नोट दिखने और छूने में काफी हद तक मौजूदा नोटों जैसे ही हल्के और मोड़े जाने वाले होते हैं, लेकिन इनकी ताकत कागजी नोटों से कई गुना ज्यादा होती है। पॉलिमर नोटों के सबसे बड़े फायदे ये हैं...

  • नायाब मजबूती: ये नोट पानी, धूल, मिट्टी और नमी से खराब नहीं होते। इन्हें आसानी से फाड़ा नहीं जा सकता।
  • नकली नोटों पर लगाम: इन नोटों में आर-पार दिखने वाली पारदर्शी खिड़की (See-Through Window), खास होलोग्राम और विशेष स्याही का इस्तेमाल होता है, जिससे इनकी नकल करना या जाली नोट बनाना नामुमकिन हो जाता है।
  • लंबी उम्र: कागज के नोट बहुत जल्दी गंदे होकर फट जाते हैं, जबकि प्लास्टिक के नोट सालों-साल बिना किसी नुकसान के बाजार में घूमते रहते हैं।
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आरबीआई अचानक कागज के नोट क्यों बंद करना चाहता है?

इस फैसले के पीछे का सबसे बड़ा कारण है- पैसा। जी हां, देश में नोट छापने का खर्च और खराब होने वाले नोटों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिसने केंद्रीय बैंक के होश उड़ा रखे हैं।

डेटा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में कागजी नोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो इसके पिछले साल (2023-24) के 5,101.4 करोड़ रुपये के मुकाबले बहुत ज्यादा है। इसके अलावा, अकेले वित्त वर्ष 2025 में 23.8 अरब फटे-पुराने और गंदे नोट बाजार से वापस खींचे गए। यह आंकड़ा पिछले साल से 12.3 फीसदी ज्यादा है। इनमें सबसे ज्यादा खराब होने वाले नोट 500 और 100 रुपये के थे।

एक तरफ जहां देश में डिजिटल पेमेंट (UPI) रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बाजार में नकदी (Cash) की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर है। 15 मई तक देश के बाजार में रिकॉर्ड 42.86 लाख करोड़ रुपये की नकदी घूम रही थी। इस भारी मांग और छपाई के बढ़ते खर्च को काबू में करने के लिए ही आरबीआई अब प्लास्टिक नोटों का सहारा ले रहा है।

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14 साल पहले भी हुई थी कोशिश, तब क्यों फेल हो गया था प्लान?

यह पहली बार नहीं है जब भारत में प्लास्टिक के नोटों की चर्चा हो रही है। आज से करीब 14 साल पहले, यानी साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने देश के 5 अलग-अलग जलवायु वाले शहरों (कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला) में 10 रुपये के करीब 1 अरब प्लास्टिक नोटों का एक फील्ड ट्रायल (पायलट प्रोजेक्ट) शुरू करने की मंजूरी दी थी।

उस समय इस योजना को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था क्योंकि तब हमारे पास इसके अनुकूल तकनीक नहीं थी। सबसे बड़ी समस्या यह आ रही थी कि देश की एटीएम (ATM) मशीनें इन प्लास्टिक नोटों को न तो पहचान पा रही थीं और न ही उन्हें सही तरीके से निकाल पा रही थीं। साथ ही इन्हें मोड़ने और गिनने में भी दिक्कतें आ रही थीं। लेकिन अब सूत्रों का कहना है कि तकनीक बेहद एडवांस हो चुकी है और नई एटीएम मशीनें बिना किसी गड़बड़ी के प्लास्टिक नोटों को प्रोसेस करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

शुरुआत में जेब में आएंगे सिर्फ 10 और 20 रुपये के प्लास्टिक नोट

आरबीआई एक झटके में बाजार से सारे कागजी नोट गायब नहीं करेगा। इसकी शुरुआत एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट से होगी। सबसे पहले 10 रुपये और 20 रुपये के छोटे नोटों को प्लास्टिक (पायलट प्रोजेक्ट) में बदला जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि छोटे नोट रोजमर्रा के लेनदेन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और सबसे पहले गंदे होकर फटते हैं।

अगर छोटे नोटों का यह ट्रायल सफल रहता है और देश की जनता इसे आसानी से स्वीकार कर लेती है, तभी बड़े नोटों को प्लास्टिक में बदलने पर विचार किया जाएगा। आरबीआई ने छोटे नोटों की जगह सिक्कों का चलन बढ़ाने की भी काफी कोशिश की (जिसके तहत वित्त वर्ष 2025 में 5 रुपये के 80 करोड़ सिक्के समेत कुल 1.5 अरब सिक्के सप्लाई किए गए), लेकिन लोगों को सिक्कों से ज्यादा नोट पसंद आते हैं। यही वजह है कि अब प्लास्टिक नोट लाना ही एकमात्र रास्ता बचा है।

दुनिया के किन देशों में पहले से चल रही है प्लास्टिक करेंसी?

अगर आपको लगता है कि प्लास्टिक के नोट सिर्फ भारत की सोच है, तो आपको बता दें कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में यह व्यवस्था पहले से ही सफलतापूर्वक चल रही है।

ऑस्ट्रेलिया: दुनिया का सबसे पहला देश था जिसने साल 1988 में कागज छोड़कर 10 डॉलर का पहला प्लास्टिक नोट जारी किया था।

अन्य देश: इसके बाद सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे विकसित देशों ने भी इसे पूरी तरह अपना लिया।

यूरोप: साल 1998 में रोमानिया प्लास्टिक नोट अपनाने वाला पहला यूरोपीय देश बना था, जबकि यूनाइटेड किंगडम (UK) भी इसका इस्तेमाल करता है। इसके विपरीत, अमेरिकी डॉलर आज भी कपास और लिनन के एक खास मिक्स कपड़े वाले कागज पर ही छपता है।

कुल मिलाकर दुनिया के अनुभवों को देखते हुए यह साफ है कि प्लास्टिक नोट न केवल सरकार का पैसा बचाते हैं, बल्कि आम जनता के लिए भी बेहद सुविधाजनक साबित होते हैं। बहुत जल्द भारत भी करेंसी के इस हाई-टेक युग में कदम रखने जा रहा है।

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