कैसे सुधरेगी असम के चाय बागानों की स्थिति? पाम ऑयल की खेती साबित होगी मील का पत्थर, जानिए कैसे
असम में लंबे से समय से एक भारी भरकम क्षेत्रफल में चाय के खेती की जा रही है। आपूर्ति अधिक होने से ये कृषि फायदे के बजाय कई बार चाय के दाम इतने घट जाते हैं कि लागत के आसपास बेंचना होता है। ऐसे में विकास एजेंसियों के लिए भारत में कंट्री डायरेक्टर जगजीत सिंह कंदल ने बड़ी बात कही है। उन्होंने बताया कि चाय के दामों में ठहराव इसलिए आता है क्यों मांग और आपूर्ति एक बड़ा अंतर है। चाय का उतपादन हर साल इतना होता है कि कम दामों पर ही बेंचना पड़ता है।
आईडीएच जगजीत सिंह कंदल के मुताबिक असम में चाय बागानों के क्षेत्र को लाभकारी बनाने के लिए ऑयल पाम उत्पादन बढ़ावा देकर स्थिति में सुधार किया जा सकता है।

असम के चाय बागानों को कैसे बनाएंगे लाभाकारी
आईडीएच निदेशक ने कहा कि असम में चाय बागान क्षेत्र से 2023 में रिकॉर्ड उत्पदान हुआ। जगजीत कंदल के मुताबिक पिछले 200 वर्षों के मुकाबले 2023 में चाय का काफी उत्पादन हुआ। लेकि इस साल अमसम के चाय बागान अच्छी स्थिति में नहीं और बढ़ती उत्पादन लागत, अपेक्षाकृत स्थिर खपत, कम कीमतों और फसल की गुणवत्ता के मुद्दों जैसे मुद्दों से जूझ रहा है।
असम में चाय निर्यात का कारोबार 3,000 करोड़ रुपए
बता दें कि असम में 823 में, रॉबर्ट ब्रूस ने ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी में उगने वाले जंगली चाय के पौधों की खोज की। इसके बाद, 1833 में तत्कालीन लखीमपुर जिले में एक चाय बागान शुरू किया गया गया था। असम अब प्रतिवर्ष लगभग 700 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन करता है, जो कि भारत के कुल चाय उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा है। राज्य सालाना 3,000 करोड़ रुपये के बराबर विदेशी मुद्रा भारत लाता है।
भारत चाय का चौथा सबसे बड़ा निर्देस देश
लगभग 11 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत, चीन, केन्या और श्रीलंका के बाद चौथा सबसे बड़ा चाय निर्यातक है। कंडल के मुतबिक, "अगर असम में 20 प्रतिशत भूमि उपयोग को चाय से पाम ऑयल में स्थानांतरित कर दिया जाता है, तो इसका दोहरा प्रभाव पड़ेगा। कृषि वस्तुओं में पाम ऑयल सबसे अधिक राजस्व देने वाला है।"












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