कैसे आरबीआई ब्याज दरों से कम करता है महंगाई, बाजार में पैसों पर करता है नियंत्रण
नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी मॉनेटरी पालिसी के तहत बुधवार को ब्याज दरों में बदलाव किए। साल की आखिरी मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए आरबीआई ने ब्याज दरों में कटौती नहीं की थी। रिजर्व बैंक ने एमएसएफ, एलएएफ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसमें बदलाव किया गया है। लेकिन इन शब्दों को हममे कई लोग बस पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं और इसके महत्व को नहीं समझते हैं। तमाम लेख में भी सीधे तौर पर कर्ज कम या ज्यादा हुआ बताया जा सकता है, लेकिन बहुत से लोग इसके वास्तविक मतलब को नहीं जानते हैं और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं होती है कि आखिर इसका क्या उपयोग है। कई लोग तो इन शब्दों को सुनकर यह मानकर आगे बढ़ जाते हैं कि हम हमारे बस की बात नहीं है यह तो बड़े-बड़े आर्थिक जानकारों से जुड़े मामले हैं। लेकिन हकीकत में ये तमाम शब्द आपके लिए काफी मायने रखते हैं, जिसकी जानकारी होना आपके लिए काफी जरूरी है।

बैंक रेट
लॉग टर्म यानि लंबे समय के लिए जो पैसा तमाम बैंक जैसे कि एसबीआई, पीएनबी आदि आरबीआई से लेते हैं उन्हें इसके लिए ब्याज देना होता है, इस ब्याज दर को बैंक रेट कहते हैं। बैंक रेट की खास बात यह होती है कि बैंकों को इस पैसे को लेने के लिए किसी भी तरह की सिक्योरिटी आदि को आरबीआई के पास गिरवी नहीं रखना होता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि जब तमाम बैंक आरबीआई की नियमों का पालन नहीं करते हैं जैसे कि एसएलआर, सीआरआर की निर्धारित सीमा का पालन नहीं करते हैं तो आरबीआई इनपर जुर्माना लगाती है। इस जुर्माने का भुगतान बैंक बैंक रेट के आधार पर करते हैं।

एलएएफ (लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी)- रेपो रेट
आरबीआई के किसी भी ग्राहक जिसमे सभी प्राइवेट, सरकारी बैंक, राज्य सरकार, केंद्र सरकार व अलग-अलग एनबीएफसी (एलआईसी) को अगर कम समय के लिए लोन देती है तो उसे रेपो रेट कहते हैं। यह बैंक रेट से इसलिए अलग है क्योंकि इसमे बैंकों को आरबीआई को अपनी गवर्नमेंट सिक्योरिटी को बेचना होता है। बैंकों को गवर्नमेंट सेक्युरिटी आरबीआई को बेचनी होती है, साथ ही एक री पर्चेज एग्रीमेंट साइन किया जाता है। जिसमे आरबीआई से कुछ दिन बाद इन सेक्यिरिटी को ब्याज सहित खरीदने का वचन दिया जाता है। इस लोन को लेने के लिए जो ब्याज इसपर लगाया जाता है उसे रेपो रेट कहते हैं। कोई भी बैंक कम से कम 5 करोड़ रुपए से कम का लोन नहीं ले सकता है।

मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी
इसे 2011 से लागू किया गया था, इसे सिर्फ शेड्युल कॉमर्शियल बैंक खरीद सकते हैं, जैसे एक्सिस बैंक। इस लोन को लेने के लिए भी री पर्चेज अग्रीमेंट साइन किया जाता है, जिसमे कहा जाता है कि गवर्नेंट सिक्योरिटी को ब्याज सहित तय समय के बाद फिर से खरीद लिया जाएगा। अप्रैल 2016 में इसमे बदलाव किया गया जिसके बाद यह निर्धारित किया गया कि रेपो रेट जितना होगा, एमएसएफ उससे 50 बेसिक प्वाइंट कम होगा। यहां खास बात यह ध्यान रखने वाली है कि इसके तहत बैंक को कम से कम एक करोड़ रुपए का लोन लेना होगा।

एलएएफ( रिवर्स रेपो रेट)
जब आरबीआई को कम समय के लिए पैसा चाहिए होता है तो आरबीआई गवर्नमेंट सेक्युरिटी बैंकों को देकर उनसे लोन लेती है। लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि आरबीआई को पैसों की क्या जरूरत। दरअसल आरबीआई बाजार में अधिक पैसा होने पर उसे कम करने के लिए ऐसा करता है, जिससे कि जब चीजों के दाम अधिक कम होने लगते हैं तो वह रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा देती है। इन तमाम कामों के लिए आरबीआई का ई कुबेर कोर बैंकिंग सोल्युशन प्लेटफॉर्म है, जहां सारे बैंकों का खाता है, और तमाम लेन-देन यही होते हैं। यहां गवर्नमेंट सेक्युरिटी, मैच्युरिटी बिल आदी को खरीदा व बेचा जाता है। महंगाई को रोकने, बाजार में अधिक पैसे को कम करने आदि के लिए यहां लेन-देन किया जाता है।

कैसे कम होती है महंगाई
यहां आपको एक बात और समझने की जरूरत है कि आखिर कैसे महंगाई को कम करने के लिए आरबीआई इन ब्याज दरों का इस्तेमाल करता है। आपको बता दें कि अगर रेपो रेट को बढ़ा दिया जाता है तो, बैंकों का लोन महंगा हो जाता है, ऐसे में अधिक ब्याज दर पर लोग पैसा नहीं लेंगे। मान लीजिए आपको कार खरीदनी है और आरबीआई ने रेपो रेट 20 फीसदी कर दिया है, ऐसे में बैंक अपना मुनाफा जोड़ने के बाद इस दर को 30 फीसदी करके लोगों को ब्याज पर लोन मुहैया कराएगा, लेकिन इतनी अधिक ब्याज दर पर लोन कौनलेगा? ऐसी स्थिति में कार कंपनी अपनी कारों की कीमत में कमी करती है जिससे कि लोगों अधिक ब्याज पर भी लोन लेना फायदे का सौदा लगता है।
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