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अंतरिक्ष यात्रा का इंसान के शरीर पर क्या होता है असर

वैज्ञानिकों को इस संबंध में जानकारी मिली है कि अंतरिक्ष से लौटने के बाद अंतरिक्ष यात्री एनीमिक क्यों हो जाते हैं यानी उनमें खून की कमी क्यों हो जाती है.

कनाडा के शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतरिक्ष में शरीर की 50 प्रतिशत ज़्यादा लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और मिशन के चलने तक ऐसा होता रहता है.

What is the effect of space travel on the human body

उन्होंने कहा कि इसके कारण चांद, मंगल या उससे दूर की अंतरिक्ष यात्राएं करना एक बड़ी चुनौती हैं.

लेकिन, उनकी खोज का पृथ्वी पर इसी तरह की बीमारी से पीड़ित मरीजों को फायदा मिल सकता है.

अंतरिक्ष में जाने पर ख़ून का खून कम होने यानी 'स्पेस एनीमिया' के बारे में वैज्ञानिक अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटे पहले अभियान के समय से जानते हैं. लेकिन ऐसा क्यों होता है अब तक ये एक रहस्य बना हुआ था.

पूरे मिशन के दौरान नष्ट हुई कोशिकाएं

14 अंतरिक्ष यात्रियों पर किए गए एक अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ओटावा के शोधकर्ताओं को इस बारे में और जानकारी मिली है. जिन अंतरिक्ष यात्रियों को अध्ययन में शामिल किया गया था उनमें ब्रिटेन के टिम पेक भी थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर छह महीने बिताए हैं और स्पेस में वहां अलग-अलग विषयों पर शोध किया है.

इस अभियान के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के खून और सांसों के सैंपल लिए गए ताकि शोधकर्ता उनके शरीर में कम हुईं लाल रक्त कोशिकाओं को संख्या नाप सकें.

ये कोशिकाएं फेफड़ों से ऑक्सीजन को पूरे शरीर में पहुंचाती हैं और ये जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.

इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और हॉस्पिटल फ़िजिशियन डॉक्टर गाय ट्रूडल ने बताया, "इस अध्ययन में हमें पता चला कि अंतरिक्ष में पहुंचने पर ज़्यादा रक्त कोशिकाएं नष्ट हो रही हैं और ऐसा पूरे मिशन के दौरान भी होता रहा."

लेकिन अंतरिक्ष में वजन महसूस ना होने के कारण ये बड़ा मसला नहीं है. लेकिन पृथ्वी पर वापस आने के बाद इस कारण अंतरिक्ष यात्री कमज़ोर और थका हुआ महसूस करते हैं और उनकी मांसपेशियां की मजबूती कम हो जाती है.

अंतरिक्ष में हर सैकेंड में शरीर में 30 लाख लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं जबकि ज़मीन पर दो लाख लाल रक्त कोशिकाएं ही नष्ट होती हैं. हालांकि, शरीर इसकी भरपाई कर लेता है. अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में बहुत बीमार पड़ जाते.

लेकिन शोधकर्ता इसे लेकर निश्चित नहीं हैं कि शरीर लगातार कितने समय तक इसकी भरपाई कर सकता है, ख़ासतौर से तब, जब अंतरिक्ष यात्री लंबे वक्त तक किसी मिशन पर हों.

महिला और पुरुष अंतरिक्ष यात्री समान रूप से हुए प्रभावित

अध्ययन में पाया गया कि अंतरिक्ष यात्रियों के वापस धरती पर लौटने पर ये समस्या ठीक नहीं हो पाई. एक साल बाद भी उनके शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं तेज़ी से ख़त्म हो रही थीं.

लेकिन इसके बावजूद उनका शरीर ठीक से काम कर रहा है. इस समस्या से महिला और पुरुष दोनों ही अंतरिक्ष में समान रूप से प्रभावित हुए.

डॉक्टर ट्रूडल ने कहा, "अगर हम ये पता लगा सकें कि एनीमिया वाकई में क्यों होता है, तो उसे ठीक करने या रोकने का उपाय खोजा जा सकता है. इससे अंतरिक्ष यात्रियों और पृथ्वी पर मौजूद मरीज़ों को इसका फायदा हो सकता है."

डॉक्टर ट्रूडल मानते हैं कि अंतरिक्ष यात्रा में हुआ एनीमिया उसी तरह के मरीजों के अनुभव जैसा है जो कोविड जैसी बीमारी के इलाज में आईसीयू में महीनों बिताते हैं. इस दौरान उनका शरीर निष्क्रीय होता है.

एनीमिया उन्हें व्यायाम करने और ठीक होने से भी रोकता है. शोधकर्ताओं की टीम अब इस बात पर शोध करेगी कि यह तंत्र भविष्य के अध्ययनों में कैसे काम करता है.

ये शोध नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है. इसके नतीजों के मुताबिक़ ज्यादा दूरी वाले अंतरिक्ष यात्रा अभियानों में हिस्सा लेने वालों को अपनी डाइट में ज़्यादा आयरन लेना चाहिए. साथ ही ऊर्जा के लिए ज़्यादा कैलोरी लेनी चाहिए.

शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतरिक्ष यात्रा से पहले अंतरिक्ष यात्रियों में खून और स्वास्थ्य पर एनीमिया के प्रभाव की जांच करना भी ज़रूरी हो सकता है.

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