कभी भी आ सकती है विनाशकारी बाढ़ क्योंकि... भीषण गर्मी के बीच ISRO ने चेतावनी देते हुए ऐसा क्यों कहा?

झीलें देखने में बेहद खूबसूरत लगती हैं। कई बार जब आप खूबसूरत वादियों में जाते हैं तो झील के किनारे बस बैठ जाने का ही मन होता है और ऐसा लगता है कि बस इस पानी को यूं ही देखते ही रहो। मगर अगर इसी झील का पानी दोगुना हो जाए, तो शायद किसी छोटे शहर को डुबो देने के लिए काफी होगा। शांत सा दिखने वाला ये पानी कब सैलाब बन जाए, ये बात कोई नहीं जानता। मगर इसरो के वैज्ञानिकों को जरूर इस बात का अंदेशा हो चुका है।

जी हां! जिस तरह से तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, ये काफी खतरनाक है। ग्लेशियरों के पिघलने से कुछ ऐसा हो रहा है, जो आम जन की सोच से बहुत परे है। ये आने वाले समय में सिर्फ और सिर्फ तबाही ही लाएगा।

ISRO

बताते चलें कि हिमालयी इलाकों में जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो झीलें बनती हैं। और जब झीलें बनती हैं तो जैसे-जैसे ग्लेशियर और पिघलते हैं, ये झीलें और भी बढ़ती चली जाती हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि हिमालय क्षेत्र में इन झीलों का आकार बहुत ही ज्यादा खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भी इस बात को लेकर चेतावनी दी है कि उपग्रहों से मिले आंकड़ों और दुनियाभर में की गई रिसर्च से पता चला है कि 80वीं सदी में औद्योगिक क्रांति जब शुरू हुई, इसके बाद से ही ग्लेशियर पतले होते जा रहे हैं। यानी कि इनकी बर्फ लगातार पिघल रही है। ग्लेशियर जब पिघलते हैं तो इनसे झीलें बनती हैं और जो झीलें पहले से ही मौजूद हैं, इनका आकार और भी ज्यादा बढ़ जाता है।

चौंकाने और डरा देने वाली बात है कि ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट यानी कि जीएलओएफ के चलते निचले इलाकों में भयंकर बाढ़ आ सकती है और इसके परिणाम भी भयंकर हो सकते हैं। इससे भी डरा देने वाली बात ये है कि इनकी निगरानी नहीं की जा सकती। यानि कि कब बाढ़ आ जाए और कब ये पानी अपने साथ तबाही ले आए, कुछ कहा नहीं जा सकता।

इसरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 से 17 के बीच 2341 झीलों की पहचान की गई थीं, जो कि 10 हेक्टेयर बड़ी थीं। इनमे से 676 ढीलों का आकार बहुत ही ज्यादा बढ़ा है। इनमें से सिंधु बेसिन में 65, गंगा बेसिन में 7 और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 58 झीलें शामिल हैं। झीलों के आकार में भी बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। साथ ही 601 झीलों के आकार भी लगभग दोगुने हुए हैं।

इसरो के मुताबिक, ग्लेशियरों का पिघलना बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन यानी कि क्लाइमेट चेंज का एक बड़ा संकेत है। इन ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ी क्षेत्रों में भयंकर बाढ़ आ सकती है।

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