बुंदेलखंड: विधवाओं का एक गांव जिसका दर्द कोई नेता नहीं सुनता

गुढ़ा गांव की विधवाएं आज भी मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं लेकिन इनकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं। इनका दर्द चुनावी मुद्दा न बन सका।

बांदा। उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में बांदा जिले की अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित नरैनी विधानसभा सीट में गुढ़ा एक ऐसा गांव है, जहां पिछले दस सालों में कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी से 76 लोगों की मौतें हो चुकी हैं। उनकी विधवाएं भी मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं, लेकिन इन विधवाओं को न तो कोई सरकारी मदद मिली और न ही उनके 'दर्द' को कोई भी राजनीतिक दल चुनावी मुद्दा ही बना रहे। यहां के निवर्तमान विधायक और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गयाचरण दिनकर दोबारा बसपा के उम्मीदवार हैं।

बुंदेलखंड: विधवाओं का एक गांव जिसका दर्द कोई नेता नहीं सुनता

बांदा जिले का नरैनी विधानसभा क्षेत्र मध्य प्रदेश की सरहद से सटा हुआ है। इसी क्षेत्र में गुढ़ा एक ऐसा गांव है, जहां पिछले दस सालों में कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी के चलते गंभीर बीमारियों से 76 लोगों की मौतें हो चुकी है। इनकी विधवाओं को अब तक कोई सरकारी मदद नसीब नहीं हुई और अब परिवार दो वक्त की रोटी को तरस रहा है। इस सीट के निवर्तमान विधायक गयाचरण दिनकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और दोबारा बसपा के उम्मीदवार भी। हालांकि सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा समेत कुल 13 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, लेकिन किसी ने भी इन विधवा महिलाओं के 'दर्द' को अपने चुनावी मुद्दों में शामिल करने की जरूरत नहीं समझी।

छह हजार की आबदी वाले गुढ़ा गांव में कल्ली, श्यामा, चंपा, शकुंतला, रनिया, कलावती, शिवरानी, संपत सुखरानी, विद्या, जगरानी, चुन्नी, शांति, लीला, गोरीबाई जैसी 27 से 55 साल के बीच की 76 विधवा महिलाएं है, जिनके पति कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी से इलाज के अभाव में दम तोड़ चुके हैं। 27 साल की महिला शांति देवी ने बताया कि 'इलाज के अभाव में 2012 में उसके पति महेश की मौत हो चुकी है, डेढ़ बीघे कृषि भूमि के सहारे वह अपने बाल-बच्चों को पाल रही है।' उसने बताया कि 'पति की मौत के बाद उसे सरकारी मदद के नाम पर फूटी कौड़ी तक नहीं मिली।' इसी गांव की दूसरी 40 साल की विधवा लीला ने बताया कि '2008 में लंबी बीमारी के चलते उसके पति की मौत हो गई थी, उसके नाम तीन बीघे कृषि भूमि है, जो उस समय पांच हजार रुपये में गिरवी थी और पति ऊपर तीन लाख रुपये ज्यादा सरकारी कर्ज लदा था।'

वह बताती है कि 'पति के मौत के बाद वह 'बनी-मजूरी' के सहारे दो वक्त की रोटी का इंतजाम करती है।' रामकली का दर्द अन्य महिलाओं से जुदा है, वह बताती है कि 'पति गांव के साहूकारों का हजारों रुपये कर्ज लिए थे, बीमारी से पति रामस्वरूप की 2010 में हुई मौत के बाद दबंगों ने कर्ज की बदौलत खेती की जमीन पर कब्जा कर लिया। अब उसे गांव में काम भी नहीं मिल रहा है, वह कई रातें भूख से गुजार चुकी है।' इसी प्रकार गांव महिला गोरीबाई बताती है कि 'आर्थिक तंगी से इलाज के अभाव में उसके पति परदेशी की 2007 में टीबी रोग से मौत हो गई थी, अब तक उसे पेंशन तक नहीं नसीब हुई।' इन महिलाओं की जुबानी सिर्फ बानगी है, इस गांव की ऐसी 76 विधवाएं हैं, जो पति की मौत के बाद मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं। इनके दर्द को छूने की कोशिश न तो सरकारी मशीनरी ने की और न ही चुनाव के मैदान में डटे उम्मीदवार ही मददगार बने।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और नरैनी सीट से दोबारा घोषित बसपा प्रत्याशी गयाचरण दिनकर का कहना है कि 'उनकी पांच साल की विधायकी में इन महिलाओं के बारे में किसी ने नहीं बताया, अगर जानकारी होती तो जरूर मदद की जाती।' वह कहते हैं कि 'चुनाव प्रचार के दौरान इन महिलाओं से मिलकर उनके हाल जानने की कोशिश करेंगे।' भाजपा से दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे राजकरण कबीर का कहना है कि 'पिछले पांच साल वह किसी भी पद में नहीं थे, महज भाजपा का एक सिपाही था। अधिकारियों से इनकी मदद की गुजारिश की थी, लेकिन नहीं सुनी गई।' पिछला चुनाव सपा से लड़ चुके और अब गठबंधन से कांग्रेस उम्मीदवार भरतलाल दिवाकर का कहना है कि 'कुछ महिलाओं को पेंशन आदि की सुविधाएं दिलाई गई है, बांकी आवेदन लेकर उनके पास ही आईं नहीं।'

उम्मीदवारों के बोल कुछ भी हों, लेकिन तल्ख सच्चाई यह है कि गुढ़ा गांव की इन महिलाओं के 'दर्द' को राजनीतिक दलों के उम्मीदवार अपने चुनावी मुद्दों में शामिल करने से कतरा रहे हैं। इस गांव के अलावा और कई गांव ऐसे हैं जहां महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे कुपोषण और मुफलिसी की जिंदगी गुजार रहे है, लेकिन 'नेताजी' की 'दिव्यदृष्टि' उन तक नहीं पहुंच पा रही।

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