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कौन हैं बिहार की नई विधायक विभा देवी? जो हिंदी में भी नहीं पढ़ पाईं शपथ, करोड़ों की हैं मालकिन

Vibha Devi: बिहार विधानसभा के पहले सत्र में एक दृश्य ऐसा भी दिखा, जिसने सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा छेड़ दी। नवादा से नवनिर्वाचित जदयू विधायक विभा देवी शपथ के दौरान हिंदी में शब्दों को सही तरीके से पढ़ नहीं पाईं। वे बार-बार अटक रहीं थीं और पास बैठी विधायक मनोरमा देवी से शब्द सुन-सुनकर दोहरा रही थीं। थोड़े-थोड़े, टूटे-फूटे शब्दों में ली गई यह शपथ अब वायरल वीडियो बन चुकी है।

सोशल मीडिया पर यूजर लिख रहे हैं कि जो हिंदी में अपना शपथ भी नहीं पढ़ पा रही हैं, वो विधायकी का काम क्या करेंगी। नीतीश कुमार और उनकी पार्टी JDU की भी टिकट देने को लेकर आलोचना हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कौन हैं विभा देवी, जिन्हें नीतीश कुमार ने टिकट दिया और जनता ने भारी मतों से जीताकर सदन तक पहुंचाया?

Who is Vibha Devi

🟡 कौन हैं विभा देवी? (Who is Vibha Devi)

विभा देवी किसी आम परिवार से नहीं आतीं। वे बाहुबली और नवादा के पूर्व विधायक राजबल्लभ यादव की पत्नी हैं, जिनका राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव इलाके में लंबे समय से कायम है। 2016 में पॉक्सो केस में राजबल्लभ यादव को सजा मिलने और उनकी विधानसभा सदस्यता खत्म होने के बाद विभा देवी पहली बार राजनीति में सक्रिय हुईं।

2019 में उन्होंने नवादा लोकसभा सीट से RJD के टिकट पर चुनाव लड़ा, हालांकि तब हार गईं। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने उसी नवादा सीट से आरजेडी उम्मीदवार के रूप में बड़ा उलटफेर किया और 26 हजार से ज्यादा वोट से जीत हासिल की। तब से वे नवादा में एक सशक्त राजनीतिक पहचान बन गईं।

🟡 कितनी है विभा देवी के पास संपत्ति ( Vibha Devi Net Worth)

विभा देवी सिर्फ राजनीतिक चेहरा नहीं हैं, बल्कि करोड़ों की मालकिन भी हैं। चुनावी हलफनामे के मुताबिक उनके पास लगभग 32 करोड़ रुपये की संपत्ति है। यही कारण है कि वे नवादा की राजनीति में खुद को मजबूती से स्थापित कर चुकी हैं।

इस बार के चुनाव में उन्होंने JDU का दामन थामा। जैसे ही चुनाव से ठीक पहले उनके पति जेल से बाहर आए, विभा देवी ने आरजेडी छोड़ जदयू जॉइन किया और नीतीश कुमार ने उन्हें टिकट थमा दिया। जनता ने उन्हें भारी 87,423 वोटों से जीताकर सदन में भेज दिया।

शपथ लेते वक्त भले ही विभा देवी को कठिनाई हुई हो, लेकिन इससे उनके राजनीतिक प्रभाव पर कोई फर्क नहीं पड़ा। कई लोगों का कहना है कि राजबल्लभ यादव की पुरानी राजनीतिक पकड़ और जातीय सामाजिक समीकरणों के कारण विभा देवी की जीत पहले से तय मानी जा रही थी।

🟡 राजबल्लभ परिवार और नवादा की सियासत का 33 साल लंबा रिश्ता

🔹नवादा की राजनीति में यादव परिवार की पकड़ कोई नई बात नहीं है। इस क्षेत्र की सियासत 1990 के दशक से दो बड़े नेताओं-राजबल्लभ यादव और कौशल यादव के बीच घूमती रही है।

🔹1992 में जब लालू यादव की सरकार पर संकट था, तब राजबल्लभ के बड़े भाई कृष्णा यादव ने बीजेपी विधायकों को तोड़कर लालू की सरकार बचाई। इसी घटना के बाद लालू और यादव परिवार का रिश्ता बेहद मजबूत हो गया।

🔹1995 में राजनीति में आए राजबल्लभ यादव ने पहली बार निर्दलीय चुनाव जीता और नवादा की सियासत में बड़ा नाम बन गए। 2000 में वे आरजेडी टिकट पर जीते और लालू ने उन्हें श्रम राज्य मंत्री बना दिया।

🟡 कौशल यादव बनाम राजबल्लभ: दशकों पुरानी कहानी

कौशल यादव और उनकी पत्नी पूर्णिमा यादव भी नवादा और गोविंदपुर की राजनीति में बड़े नाम रहे हैं। 2005 में पूर्णिमा यादव ने राजबल्लभ को नवादा सीट पर हराकर बड़ा उलटफेर किया था। बाद में 2010 में कौशल यादव JDU में शामिल हुए और उन्होंने गोविंदपुर से जीत हासिल की, जबकि उनकी पत्नी नवादा से फिर विधायक बनीं। यानि नवादा की राजनीति पिछले 25 साल से यादव बनाम यादव की लड़ाई बनी हुई है।

🟡 अब विभा देवी नई शक्ति, नए समीकरण

जेल जाने, चुनाव लड़ने और सत्ता में आने के उतार-चढ़ाव के बीच अब विभा देवी इस परिवार की नई राजनीतिक धुरी बन चुकी हैं। पीएम मोदी की रैली में मंच पर दिखने के बाद वे और ज्यादा सुर्खियों में आ गईं और तुरंत बाद वे JDU में शामिल हो गईं। 2025 के चुनाव में नीतीश कुमार ने उन पर दांव लगाया और जनता ने भी उन्हें भारी मतों से जीताकर विधानसभा भेज दिया।

विभा देवी के शपथ पढ़ते समय हकलाने का वीडियो भले ही मजाक का विषय बन गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वे आज नवादा की सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं। पति की राजनीतिक विरासत, करोड़ों की संपत्ति, मजबूत जातीय समीकरण और JDU का समर्थन, ये सभी वजहें उन्हें बिहार की सियासत में लंबे समय तक टिके रहने वाला चेहरा बनाती हैं।

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