Mukesh Sahani 'बिहार की सियासत' का बड़ा चेहरा नहीं!,जनता के वोट से कभी नहीं जीते, न ही पार्टी के पास 1 भी MLA
Mukesh Sahani Bihar Politics: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियों ने सियासी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। वहीं विभिन्न रणनीतियों के मद्देनज़र अलग-अलग समुदाय के वोट बैंक के साथ होने का हवाला देते हुए सीटों की बार्गेनिंग भी जारी है।
राजनीतिक दांव पेंच के बीच बिहार में अपने फायदे के लिए पाला बदलने वाले नेताओं के नाम पर भी चर्चा तेज़ हो चुकी है। इस फेहरिस्त में बिहार के सीएम नीतीश कुमार अव्वल नंबर पर हैं, उनके पाला बदलने को लेकर तो सियासी गलियारों में यह चर्चा है कि नीतीश सियासी फ़िज़ा बदलने की हैसियत रखते हैं, तो पाला बदलने का फ़ायदा भी होता है।

बिहार में कुछ नेता ऐसे भी हैं जो सिर्फ पाला बदलकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं, आज तक जनता ने उन्हें मत देकर जिताया तक नहीं है और ना ही अपनी पार्टी के विधायक हैं। इसके बावजूद खुद को ऐसा दिखाते हैं जैसे जिधर वह चले जाएं वह गठबंधन जीत जाएगी, हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं हैं।
चुनावी रणनीतिकार बद्रीनाथ ने वनइंडिया हिंदी से बात करते हुए कहा कि बिहार में विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी का भी हाल कुछ इसी तरह का है। उनके सियासी सफर पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि उनका कोई जनाधार ही नहीं है। एनडीए गठबंधन में शामिल थे, तो भाजपा की वजह से MLC बनाकर उन्हें बिहार सरकार में मंत्री पद मिला था।
2013 में सियासी सफ़र की शुरुआत करने वाले मुकेश सहनी ने खुद को 'सन ऑफ मल्लाह' के नाम से पहचान दिलाने की कोशिश करते हुए अपने समुदाय (निषाद) पर ध्यान केंद्रित कर राजनीति करने लगे। सेट डिजाइनर का काम और बॉलीवुड इंडस्ट्री के सहारे कुछ संपत्ति बनाई और फिर राजनीति में क़दम रखा।
पैसों के दम पर पॉलिटिक्स में एंट्री करने वाले मुकेश सहनी को साल 2015 में थोड़ी पहचान भाजपा के लिए चुनावी प्रचार के दौरान मिली। सहनी ने प्रचार तो ज़रूर किया लेकिन बीजेपी को हार मिली। इसके बाद मुकेश सहनी ने साल 2018 में विकासशील इंसान पार्टी (VIP) का गठन किया। राजद का सहारा लेकर महागठबंधन का रुख किया।
चुनाव के दौरान 'सन ऑफ मल्लाह' के नाम से खुद की ब्रांडिंग की लेकिन निषाद समुदाय पर कोई ख़ास पकड़ नहीं बना पाए। बिहार में इस समुदाय की करीब 8 फीसदी आबादी है, इसमें 10 जातियां शामिल हैं, जिन्हें अति पिछड़ी जातियों की कैटेगरी में रखा गया है। देखा जाये तो सहनी बिहार की सियासत के कोई बड़े चेहरा नहीं है। आइए इसका गणित भी समझते हैं।
मुकेश सहनी आज तक एक भी चुनाव में खुद के नाम जीत का परचम नहीं लहरा पाए हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में 8 फीसद के करीब वोट बैंक का हवाला देते हुए मुकेश सहनी ने भाजपा के साथ 11 सीटों पर बार्गेनिंग की थी, लेकिन वह अपनी ही सीट (सहरसा जिला की सिमरी बख्तियारपुर विधानसभा सीट) से हार गए थे। ग़ौरतलब है कि भाजपा के समर्थन के बावजूद राजद की टिकट से युसुफ सलाउद्दीन ने सियासी मात दी थी।
2015 विधानसभा चुनाव के दौरान मुकेश सहनी ने भाजपा के निषाद समुदाय का वोट मांगा था, लेकिन भाजपा कुछ भी फ़ायदा नहीं हुआ और वह हार गई। भाजपा ने 'सन ऑफ मल्लाह' मुकेश सहनी के सियासी क़द का अंदाज़ा लगा लिया और दूरी बनानी शुरू कर दी। 2020 में भी भाजपा ने मल्लाह समुदाय के वोट की लालच में सहनी पर दांव खेला लेकिन हाथ खाली रहे।
भाजपा ने मुकेश सहनी की सियासी ज़मीन को भांपते हुए 2020 में VIP को 11 सीटें तो ज़रूर दीं लेकिन ज़्यादा तर सीटों पर विकासशील इंसान पार्टी के बैनर पर अपना उम्मीदवार उतारा, मुकेश सहनी जो भाजपा पर अपनी पार्टी के विधायक तोड़ने का आरोप लगाते हैं, वह दरअसल भाजपा के ही सिपहसालार थे।
2018 में बनी विकासशील इंसान पार्टी 2020 तक महागठबंधन में शामिल रही लेकिन तवज्जोह नहीं मिली। राजद के सीट पर सहनी चुनावी दांव खेलना चाहते थे लेकिन तेजस्वी यादव ने तरजीह नहीं दी। मुकेश सहनी की दाल नहीं गली तो वह तेजस्वी पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपना फ़ायदा देखते हुए एनडीए के साथ चले गए।
एनडीए के संग चुनावी दांव खेला और पार्टी के चार विधायक जीते लेकिन सहनी खुद हार गए। वही विधायक भाजपा के पाले में चले गए, जिससे से नाराज़ होते हुए मुकेश सहनी ने एनडीए से किनारा किया और खुद के फ़ायदे के लिए नए सियासी समीकरण में जुटे हुए हैं, लेकिन उन्हें निषाद समुदाय भी सीरियस नहीं ले रहा है।
बिहार में विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही एक बार फिर मुकेश सहनी खुद की ब्रांडिंग में जुटे हुए हैं। निषाद समुदाय के वोट बैंक का खुद को रहनुमा बताते हुए महागठबंधन से प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हैं, अगर महागठबंधन में दाल नहीं गली तो फिर वह खुद के फ़ायदे के लिए NDA में जा सकते हैं। हालांकि ज़मीन पर उनकी कोई ख़ास पकड़ नहीं है और ना ही वह बिहार की राजनीति में कोई बड़ा चेहरा हैं।
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