क्या बिहार में खिसकेगी नीतीश की जमीन या 2024 में बदलेगा गेम, आखिर क्या हैं इस नए उलटफेर के मायने

नई दिल्ली, 10 अगस्त। बिहार में जिस तरह से एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी और जनता दल युनाइटेड के रिश्ते खत्म हो गए हैं उसके बाद बिहार की आगे की राजनीति क्या होगी इसको लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं जो दल बदलने से गुरेज नहीं रखते हैं। इससे पहले 2015 में भी नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन खत्म करके राजद और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया था और महागठबंधन किया था। 2015 में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार फिर से प्रदेश के मुख्यमंत्री बने जबकि राजद चीफ तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन यह गठबंधन लंबा नहीं चला।

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    क्या है नीतीश की राजनीति का मंत्र

    क्या है नीतीश की राजनीति का मंत्र

    राजद और कांग्रेस के साथ नीतीश कुमार का साथ लंबा नहीं चला। 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन खत्म कर दिया और भाजपा के साथ फिर से हाथ मिलाकर सरकार का गठन कर लिया। जिस तरह से बिहार की राजनीति में बदलाव देखने को मिल रहा है उसके बाद नीतीश कुमार की राजनीति का मूल मंत्र क्या है और आखिर राजनीति में नीतीश किस तरह से अपनी रणनीति को तैयार करते हैं, आज हम इसे समझने की कोशिश करेंगे।

    प्रदेश में अपना CM चाहेगी भाजपा

    प्रदेश में अपना CM चाहेगी भाजपा

    कम सीटें होने के बाद भी भाजपा उन्हें गठबंधन में मुख्यमंत्री की कुर्सी देती आई है। ना सिर्फ भाजपा बल्कि राजद भी उन्हें मुख्यमंत्री की सीट देती आई है। भाजपा का इसके पीछे का मूल मंत्र यह था कि वह नीतीश कुमार की लोकप्रियता और जदयू के आधार पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहती थी और जमीनी ताकत बढ़ाना चाहती थी। लेकिन भाजपा इस नीति को लेकर लगातार काम कर रही है कि जल्द ही प्रदेश में उसका अपना मुख्यमंत्री हो।

    राजनीति में कोई स्थायी मित्र नहीं

    राजनीति में कोई स्थायी मित्र नहीं

    नीतीश कुमार दल बदल के लिए जाने जाते हैं, राजनीति में उनका कोई स्थायी मित्र नहीं है, यह उन्होंने अपने पिछले कुछ दशकों की राजनीति से स्पष्ट कर दिया है। सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश कुमार ने कई बार दल बदले हैं। बिहार मे उन्होंने भाजपा के साथ भी मिलकर सरकार चलाई है, और एनडीए छोड़ने के बाद राजद के साथ भी मिलकर सरकार चलाई है। दोनों ही दलों को वह धोखा भी दे चुके हैं और अपना भी चुके हैं।

    पीएम की कुर्सी

    पीएम की कुर्सी

    राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के प्रतिद्वंदी के तौर पर नीतीश कुमार खुद को लंबे समय से स्थापित करना चाहते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नीतीश कुमार 2024 के चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी आगे बढ़ाना चाहते हैं। । उन्हें भरोसा है कि अगर कांग्रेस अच्छा नहीं करती है और प्रदेश में राजद-जदयू किसी तरह से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो वह राजनीतिक जोड़-गुणा से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकते हैं।

    सत्ता के साथ छवि भी बदली

    सत्ता के साथ छवि भी बदली

    जिस तरह से एक के बाद एक नीतीश कुमार ने दल बदल किया उसके बाद नीतीश कुमार की छवि भी काफी बदली है। 2013 की तुलना में 2022 में नीतीश कुमार की छवि में काफी अंतर आ चुका है। उनके सामने तेजस्वी यादव एक बेहतर और मजबूत नेता के तौर पर उभरे हैं। ऐसे में इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह नीतीश कुमार पर पूरी तरह से भरोसा करेंगे। मुमकिन है कि नीतीश सरकार के खिलाफ जनविरोध को भी बिना अपनी शर्तों के तेजस्वी ना स्वीकार करें। महाराष्ट्र में जिस तरह से भाजपा ने सत्ता परिवर्तन किया उसके बाद नीतीश कुमार का यह कदम विपक्षी दलों को ताकत देने का जरूर काम करेगा।

    भाजपा के लिए चुनौती

    भाजपा के लिए चुनौती

    बिहार में लंबे समय की राजनीति की बात करें तो भाजपा निसंदेह बड़ा गठबंधन बनाना चाहेगी, लेकिन गठबंधन में खुद सबसे बड़ा दल बनने की कोशिश करेगी। वह नीतीश कुमार के धोखे का इस्तेमाल करके प्रदेश में जनाधार को अपने पक्ष में लाने की कोशिश करेगी। लेकिन भाजपा इस बात को भी बखूबी जानती है कि 2024 के चुनाव में नीतीश के बिना जाना लोगों के बीच अच्छा संदेश नहीं देगा। लिहाजा भाजपा एक बार फिर से लालू के जंगल राज को लोगों को याद कराएगी।

    कांग्रेस के पास विकल्प

    कांग्रेस के पास विकल्प

    कांग्रेस की बात करें तो उसके पास बिहार में सीमित विकल्प हैं। उसके पास हिंदी भाषी राज्यो में बड़े दलों के साथ गठबंधन करने के अलावा दूसरे विकल्प नहीं नजर आते हैं। लेकिन कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि विपक्षी नेताओं में नीतीश कुमार का नाम राष्ट्रीय राजनीति में जुड़ जाएगा। जहां पहले से ही ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं।

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