Success Story: मां बाप चाहते थे कि बेटा बने किसान, लोगों ने भी दिया था ताना, Microsoft ने बदली तस्वीर
Success Story: संतोष कुमार मिश्रा ने बताया कि वह अपने परिवार के एकलौते बेटे हैं। गांव में एक धारणा बनी हुई है कि अगर बच्चे का कुछ अटपटा सा नाम रख दें तो उसकी उम्र लंबी होती है। इसी धारणा की वजह से उनके पिता ने संतोष का..
Success Story: बिहार के छात्रों में प्रतिभा की कमी नहीं है, इसमें कोई दो राय नहीं है। प्रदेश के लाल राज्य से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक अपने हुनर को लोहा मनवा रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही होनहार छात्र के संघर्ष की कहानी से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जिन्होंने काफी मुश्किलों का सामना करते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वन इंडिया हिंदी से संतोष कुमार सिश्रा ने खास बातचीत में अपनी कामयाबी की कहानी बताइ, आइए जानते हैं उन्होंने किस तरह से यह मुकाम हासिल किया।

उपनाम की वजह से लोगों ने दिया ताना
संतोष कुमार मिश्रा ने बताया कि वह अपने परिवार के एकलौते बेटे हैं। गांव में एक धारणा बनी हुई है कि अगर बच्चे का कुछ अटपटा सा नाम रख दें तो उसकी उम्र लंबी होती है। इसी धारणा की वजह से उनके पिता ने संतोष का उर्फी नाम 'महोखा' (बेवकूफ) रख दिया। संतोष को उपनाम की वजह से काफी ताना भी सुन्ने को मिलता था। उन्होंने बताया कि वह किसी कार्यक्रम या समारोह में जाते थे, अगर उनसे कुछ गलती हो जाती थी तो लोग ताना मारते हुए कहते थे, 'जैसा नाम है वैसा ही काम है'। इस तरह का ताना सुनने से काफी निराशा होती थी। इसके बाद ही उन्होंने सोचा की अपनी एक अलग पहचान बनानी है ताकि जो लोग ताना दे रहे हैं। वहीं उन्हें इज़्ज़त से पुकारेंगे।

संतोष कुमार के संघर्ष की कहानी
संतोष कुमार के संघर्ष की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी, संतोष कुमार का जन्म सीवान जिले के सरारी गांव में हुआ था। वह अपने परिवार में अकेला लड़का थे, उस वक़्त बिहार में अपराध काफी चरम पर था। उस समय में अपराधी लोग वैसे युवकों का अपहरण करते जो परिवार में एकलौता होता था। क्योंकि उससे फिरौती की रकम मिलने में आसानी होती थी। संतोष अपने माता-पिता के बहुत लाडले थे, इस वजह से 8 साल की उम्र तक उन्होंने पढ़ाई ही नहीं की। सीधे उन्होंने सरकारी स्कूल में तीसरी कक्षा में दाखिला लिया। वह बच्चों के साथ पढ़ने स्कूल तो जाते थे लेकिन उन्हें पढ़ाई समक्ष में ही नहीं आ रही थी।

सरकारी स्कूलों की लचर व्यवस्था
संतोष ने बताया कि वह जो पढ़ते थे उसे विज्युलाइज करने की कोशिश करते थे कि क्यों, कैसे, क्या हो रहा है। इसके बावजूद वह परीक्षा में फेल हो जाते थे। सरकारी स्कूलों की लचर व्यवस्था की वजह से आगे की कक्षा में दाखिला होता गया। इस तरह से वह सभी छात्रों में सबसे कम रैंक लाते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनकी तालीम हासिल करने का माध्यम हिंदी था। अंग्रेज़ी से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। वहीं संतोष ने एक वाक्या का ज़िक्र करते हुए बताया कि जब वह कक्षा 6 में थे तो उनके पिता (चंद्रशेखर मिश्रा) एक किताब लाए और संतोष से कहा कि आओ तुम्हें गणित पढ़ाते हैं। इस दौरान उन्होंने सवाल किया कि मोहन की मां एक्स रोटी पकाती है, मोहन चार रोटी खाई तो कितनी रोटी बची।

गणित समझने में होती थी दिक्कत
संतोष के पिता जब ये सवाल कर रहे होते थे, तो उस वक्त उनकी मां रोटी पका रही होती थी। तो संतोष मां को रोटी बनाते हुए देखते थे कि मां ने एक रोटी, दो रोटी इस तरह से गिनती की रोटियां बनाई इसमें तो एक्स कहीं आया ही नहीं। तो संतोष ऐसे ही कुछ भी जवाब दे दिया करते थे, गलत जवाब की वजह से उनकी जबरदस्त पिटाई होती थी। ये सिसिला करीब 1 साल तक चला। जब वह 9वीं कक्षा में पहुंचे तो उन्हें जवाब समाझ आया कि उस सवाल का जवाब एक्स घटाव (X-4) होगा। उन्होंने कहा कि 'तारे ज़मीन पर' मूवी की तरह ही उनका कैरेक्टर था, हर चीज़ों को विज्युलाइज़ करते थे। पढ़ाई में उनके साथ वाले बच्चों को अवार्ड वगैरह मिलते थे लेकिन संतोष पढ़ाई में कमज़ोर थे तो उन्हें कुछ भी नहीं मिलता था।

9वीं कक्षा से बदली तस्वीर
संतोष की शिक्षा को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें अपने साथ खेती के काम में लगा लिया। वह पढ़ाई करने के साथ खेती भी करते थे। 9वीं कक्षा में पहुंचने के बाद ज़ेहन में बदला और कुछ-कुछ चीज़ें समझ आने लगी। 10वीं कक्षा में पहुंचने के बाद स्थिति में पहले से काफी सुधार हुआ और 1 हज़ार बच्चों के बीच में उन्होंने तीसरी रैंक हासिल की। गौरतलब है कि जो छात्र शुरू से ही सभी छात्रों से पीछे रहा वह 10वी कक्षा में हज़ार छात्रों के बीच टॉप तीन में जगया बनाया। वहीं से उनकी ज़िंदगी का टर्निंग प्वाइंट आया। उच्च शिक्षा के लिए गांव से बाहर जाने की बात आई तो परिवार वाले सुरक्षा कारणों से जाने नहीं देना चाहते थे। परिवार वाले चाहते थे कि वह उनके घर की खेती संभाले, गांव में ही रहकर वह किसानी करे। लेकिन संतोष ने काफी ज़िद कर के पटना का रुख किया।

गांव में नहीं थी बिजली, सुनते थे रेडियो
संतोष ने बताया कि वह जब पिता की के साथ खेत में काम करते थे, तो उस दौरान रेडियो सुना करते थे। गांव में तो बिजली थी नहीं तो टीवी वगैरह का कोई चलन नहीं था। इसलिए रेडियो में न्यूज़ सुना करते थे। इसी दौरान उन्होंने सोचा की वह आगे चलकर पत्रकार बनेंगे। वहीं 9वीं कक्षा आते-आते उन्हें लगा कि उनकी बायोलोजी अच्छी है तो वह डॉक्टर भी बन सकते हैं। संतोष ने 10वी पास करने के बाद पत्रकार और डॉक्टर का सपना लिए गांव से पटना की तरफ रुख किया। जब वह पटना पहुंचे उन्हें अहसास हुए कि उनकी काम्युनिकेशन स्किल काफी खराब है, न्यूज़ एंकर वगैरह नहीं बन पाएंगे। इसलिए डॉक्टर की तैयारी करते हैं, जब वह उसकी तैयारी कर रहे थे तो देखा की सारी चीज़ें अंग्रेज़ी में है। बायोलोजी भी नहीं कर सकते, फिर उन्होंने सोचा गणित पढ़ते हैं, वहां भी अंग्रेज़ी थी। इस तरह अंग्रेज़ी से हार मानकर पटना से तीन बार गांव की तरफ वापस हो गए।

अंग्रेज़ी से दूर भागते थे संतोष
संतोष ने फिर सीवान से छपरा का रुख किया वहां भी कुछ समझ नहीं आया, फिर उन्होंने पटना का रूख किया। जैसे-तैसे करते हुए 12वीं कर ली। इसके बाद इंजियनियरिंग की बात आई। सब लोग वहीं कर रहे थे तो संतोष ने भी इंजिनियरिंग की तरफ रुख किया। पहली बार में 7 लाख 20 ऑल इंडिया रैंक आया। जबकि जेनरल कैटेगरि से ताल्लुक रखने वाले छात्र को 10 हज़ार के अंदर रैंक लाने पर ही अच्छा कॉलेज मिलता है। फिर संतोष ने देखा कि लोग बैक डोर से पैसा देकर दाखिला ले रहे हैं। उन्होंने भी सोचा कि पिता से बात कर बैक डोर से दाखिला ले लेंगे। फिर उन्होंने तामिलनाडू के एक कॉलेज में दाखिला लेने का सोचा लेकिन वहां भी अंग्रेज़ी का चलन देखा तो वापस लौट आए।

कॉम्पिटिटिव परीक्षा की करते रहे तैयारी
संतोष जब घर वापस आए तो करीब 8 महीने तक पिता के साथ ही खेती में हाथ बंटा रहे थे, फिर उनके पिता डिस्टेंस से बीसीए में दाखिला करवा दिया। वहां से डिग्रि तो ली लेकिन यूनिवर्सिटि की मान्यता भी रद्द हो गई। वहीं वह बीसीए के दौरान इंडियन नेवी, एयरफोर्स, रेलवे, बैंकिंग सेक्टर की परीक्षाएं भी जारी रखीं लेकिन कामयाबी नहीं मिली। लेकिन वह हार नहीं माने और मेहनत जारी रखी। रोज़ाना 18 घंटे तक पढ़ाई करना शुरू किया और फिर उन्होंने एमसीए आईआईटी बीएचयू में ऑल इंडिया रैंक 4 रैंक हासिल की और वह टॉप-10 की सूची में शामिल हो गए। जिस अंग्रेज़ी की वजह से वह भागते रहे एनआईटी त्रिची में पहली बार उन्होंने अंग्रेजी पढ़ने की शुरुआत की की। काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, पहले सेमेस्टर में सब छात्रों से कम 6 नंबर मिले। इस वजह से इंटर्नशिप भी नहीं मिल सकी।

Microsoft में मिली संतोष को नौकरी
संतोष को कम अंक आने से मायूसी तो हाथ लगी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। संतोष ने माइक्रोसॉफ्ट में जॉब करने का सपना संजोया। इस बाबत तैयारी भी शुरू की, संतोष बताते हैं कि वह नौकरी पाने के लिए कई कंपनियों में इंटरव्यू दिया, करीब 15 कंपनियों में वह पहले राउंड भी नहीं निकाल पाए। मेहनत जारी रखी किसी तरह उन्हें एक कंपनी में नौकरी मिली लेकिन पैकेज बहुत ही कम था। वहीं फिर उन्हे दूसरी कंपनी में अच्छी सैलरी मिली। इस तरह वह माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी की तैयारी में जुटे रहे। माइक्रोसॉफ्ट का पहला टेस्ट भी वह नहीं निकाल पाए। लेकिन उन्होंने वहां नौकरी पाने के लिए काफी मेहनत की और आज की तारीख वह माइक्रोसोफ्ट में जॉब कर रहे हैं। जिस गांव में लोग उन्हें उपनाम से ताना मारते थे आज उन्हें वहां इज़्ज़त के साथ लोग बुलाते हैं, समाज में उनकी एक अल पहचान है।
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