Bihar Chunav 2025: सीमांचल की लड़ाई तय करेगी पटना की सत्ता, ओवैसी की चाल, PK की एंट्री से क्या बदल गया समीकरण?
Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में सीमांचल एक बार फिर सुर्खियों में है। 11 नवंबर को होने वाले मतदान में इस क्षेत्र की 24 विधानसभा सीटें राजनीतिक दलों के लिए परीक्षा की घड़ी साबित होंगी। मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण सीमांचल का रुख हर बार बिहार की सत्ता का रास्ता तय करता है।
ओवैसी और प्रशांत किशोर ने बदला चुनावी समीकरण
इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प है क्योंकि मैदान में पुराने खिलाड़ी आरजेडी और कांग्रेस के साथ-साथ एआईएमआईएम और प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार हैं। 2020 में सीमांचल की सियासत में ओवैसी ने बड़ा दांव खेला था।

एआईएमआईएम ने अमौर, बहादुरगंज, बायसी, जोकीहाट और कोचाधामन जैसी पांच सीटों पर जीत दर्ज कर महागठबंधन के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा दी थी। यही जीत आरजेडी और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुई थी। अब 2025 में ओवैसी एक बार फिर उसी फॉर्मूले के साथ लौटे हैं, लेकिन इस बार उनके सामने नई चुनौती है, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी, जो सीमांचल में विकास और शासन के मुद्दों को लेकर मैदान में उतरी है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जनसुराज और एआईएमआईएम दोनों का लक्ष्य महागठबंधन के वोट बैंक को कमजोर करना है। जहां ओवैसी धार्मिक पहचान के आधार पर मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश में हैं, वहीं पीके अपनी "गांव-गांव जनसंवाद" रणनीति से विकासशील वर्ग और युवाओं को लुभाने की तैयारी में हैं।
महागठबंधन की चिंता बढ़ी, एनडीए की निगाहें बंटी वोट पर
सीमांचल में आरजेडी और कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट कैसे रखें। ओवैसी और पीके के सक्रिय होने से मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के वोटों में विभाजन की संभावना बढ़ गई है। अगर ऐसा हुआ तो एनडीए इसका सीधा लाभ उठा सकता है। 2020 में एनडीए ने सीमांचल की 24 सीटों में से 12 पर जीत दर्ज की थी, जिनमें 8 सीटें बीजेपी और 4 सीटें जेडीयू के खाते में गई थीं।
सीमांचल का वोट पैटर्न बनेगा सत्ता का पैमाना
इस बार एनडीए का पूरा फोकस "विकास बनाम पहचान" की राजनीति पर है। बीजेपी और जेडीयू सीमांचल में सड़क, शिक्षा और सुरक्षा जैसे स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया ये चार जिले सीमांचल की सियासी पहचान हैं। माइनॉरिटी कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार, किशनगंज में 67%, कटिहार में 42%, अररिया में 41% और पूर्णिया में 37% मुस्लिम आबादी है।
यही वजह है कि सीमांचल में मुस्लिम वोट जिस ओर झुकता है, सत्ता की दिशा भी उसी ओर मुड़ती है। 2020 में मुस्लिम मतों का बिखराव आरजेडी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ था। 2025 में वही समीकरण दोहराया गया तो महागठबंधन को फिर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सीमांचल में सियासी जंग त्रिकोणीय नहीं, चतुष्कोणीय
अबकी बार सीमांचल में मुकाबला सिर्फ महागठबंधन, एनडीए और एआईएमआईएम के बीच सीमित नहीं है। जनसुराज की एंट्री ने इसे चतुष्कोणीय बना दिया है। तेजस्वी यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने मुस्लिम-यादव गठजोड़ को बरकरार रखना है, जबकि नीतीश कुमार "संतुलित राजनीति" के जरिए सीमांचल में विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर, ओवैसी पहचान की राजनीति को पुनर्जीवित करने में लगे हैं और पीके जनता के बीच "सिस्टम बदलने" के संदेश के साथ चल रहे हैं।
सीमांचल तय करेगा 2025 का सत्ता समीकरण
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सीमांचल बिहार की सत्ता का बैरोमीटर है। 2020 में यहीं से महागठबंधन की सरकार बनने से रह गई थी और 2025 में भी यही क्षेत्र यह तय करेगा कि पटना की कुर्सी पर कौन बैठेगा। ओवैसी की सक्रियता, पीके की रणनीति, आरजेडी की मजबूती और एनडीए की संगठनात्मक ताकत - चारों फैक्टर सीमांचल को इस बार का सबसे दिलचस्प राजनीतिक रणभूमि बना चुके हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि सीमांचल की जनता पहचान की राजनीति चुनेगी या विकास के एजेंडे को तरजीह देगी।












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