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Bihar Village: बेशकीमती और खूबसूरत मूर्तियों का गांव है पत्थरकट्टी, काले पत्थर की नक्काशी का जवाब नहीं

Gaya Village News: पहाड़ियों की गोद में बसे पत्थरकट्टी गांव की 75% आबादी पत्थरों को तराश कर मूर्तियां बनाने का कांम करती है।

paththarkatti gaya village of bihar established 350 years ago by Rani Ahaliyabai


Gaya News: बिहार में घूमने के ऐतबार से कई एतिहासिक और धार्मिक धरोहर मौजूद है। वहीं बिहार में कई ऐसा गांवों भी मौजूद हैं, जहां बेशकीमती चीज़ों का निर्माण किया जाता है। आज हम आपको नालंदा और गया जिले की सीमा पर पहाड़ियों की गोद में बसे पत्थरकट्टी गांव के बारे में बताने जा रहे हैं। इस गांव को है बेशकीमती और खूबसूरत मूर्तियों का गांव भी कहा जाता है। पत्थरकटी गांव की गया शहर से दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। आपको बता दें कि इस गांव का नालंदा ज़िले के बाजारों से भी सरोकार है।

पत्थरकट्टी गांव की 75% फीसद आबादी मूर्तियां बनाने का काम करती है। गांव के लोग पत्थर को तराश कर बेहद खूबसूरत और बेशकमीती मूर्ती बनाते हैं। इन मूर्तियों को देश के विभिन्न राज्यों से लोग खरीदने आते हैं। गांव के बुज़ुर्गों की मानें तो तीन सौ साल पहले इस गांव को बसाया गया था। इंदौर (मध्यप्रदेश) की रानी अहलियाबाई ने गांव को बसाया था, उन्हीं के निमंत्रण पर सैकड़ों ब्राह्मण राजस्थान से यहां पहुंचे थे। परंपरागत तौर पर मूर्ति बनाने का काम गौड़ ब्राह्मणों का था। यहां के पत्थरों की वजह से ही मूर्तिकारों को गांव में बसाया गया था।

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    बेशकीमती और खूबसूरत मूर्तियों का गांव है पत्थरकट्टी,गांव के लोग पत्थर तराश कर बनाते हैं मूर्ती

    ग्रामीणों का मानना है कि गया का मशहूर विष्णुपद मंदिर का निर्माण भी इन्हीं मूर्तिकारों द्वारा ही किया गया था। गौरतलब है कि पत्थरकट्टी गांव में सख्त काले पत्थर को तराश कर अनोखी नक्काशी की जाती है। यहां के कारीगरों को सख्त से सख्त पत्थर ( संगमरमर, ग्रेनाइट और सफ़ेद बलुआ पत्थर) को तराश कर मनचाहा आकार देने में महारत हासिल है। ग़ौरतलब है कि यहां के पत्थर की तराशी मूर्तियों देश से लेकर विदेशों तक बहुत ज़्यादा मांग है। नालंदा के व्यापारी यहां से मूर्तियों को खरीद कर स्थानीय बाज़ार में बेचते हैं।

    पत्थरकट्टी पंचायत की आबादी करीब दस हज़ार लोगों की है, पांच सौ परिवारों के लोगों में शामिल बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों और महिलाओं से लेकर पुरुषों तक सभी किसी ना किसी तरह का काम कर अपनी ज़िंदगी बसर करते हैं। वहीं यहां के ज्यादातर मर्द पत्थरों को तराश कर मूर्ती बनाने का काम करते हैं। महिलाएं और बच्चे मूर्ति को घिस कर पेंटिंग कर आकर्षक रूप देने का काम करते हैं। आपको बता दें कि गांव में सभी देवी, देवताओं और महापुरुषों की मूर्तियों की नक्काशी होती है। 1 हज़ार रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक की मूर्ती आसानी से मिल जाती है। ग़ौरतलब है कि दूसरे जगहों से लोग यहां आकर मूर्तीकारों को मुंह बोला दाम देकर मूर्ती खरीदते हैं।

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