ईद पर बकरे की कुर्बानी छोड़ बाढ़ पीड़ितों की ऐसे की मदद...
'जिस तरह गरीब भूख के कारण छटपटा रहे थे वो हमसे देखा नहीं गया और हमने इस साल बकरे की कुर्बानी नहीं देने और इस पैसे से बाढ़ पीड़ितों की मदद का संकल्प लिया।'
पटना। किसी भी धर्म के लोग अपने पर्व, त्योहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। सबसे खास मुसलमानों की ईद और बकरीद देखी जाती है जहां बकरीद में बकरे की कुर्बानी देना इनकी पुरानी परंपरा है। हर मुसलमान बकरीद के अवसर पर अपनी हैसियत के मुताबिक बकरा खरीदता है और उसकी कुर्बानी देता है। लेकिन बिहार के भागलपुर जिले में एक मुस्लिम परिवार ने इस बकरीद के अवसर पर बकरे की कुर्बानी देने के बजाय उस पैसे से बाढ़ पीड़ित लोगों की मदद करने का फैसला लिया और बकरे खरीदने के लिए रखे गए 60 हजार रुपए को बाढ़ पीड़ितों के बीच बांट दिया। उसके इस काम में पूरे परिवार वालों ने साथ दिया और 60 हजार की राहत सामग्री खरीदकर, उसे पैककर बच्चे बाढ़ पीड़ितों के बीच उसे बांटते दिखे।

जानकारी के मुताबिक ये काम बिहार के भागलपुर जिले के गोराडीह के रहने वाले 65 वर्षीय किसान मोहम्मद कमरुज्जमा करते हुए एक मिसाल कायम की। बकरे की कुर्बानी छोड़ बाढ़ पीड़ितों की मदद करने के बारे में जब उनसे बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से बिहार में खासकर कोसी क्षेत्र में आई बाढ़ की तबाही देख हम विचलित हो रहे थे। जिस तरह गरीब भूख के कारण छटपटा रहे थे वो हमसे देखा नहीं गया और हमने इस साल बकरे की कुर्बानी नहीं देने और इस पैसे से बाढ़ पीड़ितों की मदद का संकल्प लिया। मोहम्मद कमरुज्जमा ने कहा कि हमारी पत्नी इस बात को सुनकर साथ देने को तैयार हो गई और बकरे खरीदने के लिए रखे गए 60 हजार रुपए से खाने की राहत सामग्री लाई गई। जिसे बच्चों के हाथों बंटवाकर उन्हें बड़ा सुकून मिला।
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परिवार के मुताबिक - हमारे समाज के लोग पिछले 2 दिनों से बकरे खरीदने में लगे हुए थे तभी हमारे मन में ये ख्याल आया कि इस साल बकरे की कुर्बानी देने से अच्छा है इंसानियत को बचाना। फिर हमने संकल्प लिया और इस बार बकरीद पर बकरे की कुर्बानी ना देते हुए गरीब बाढ़ पीड़ितों की मदद की। हालांकि बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण हम बाढ़ पीड़ितों के बीच नहीं जा सके। लेकिन हमारे इंजीनियर बेटे ने उन लोगों के बीच जाकर ये राहत सामग्री दी। जिसमें प्रत्येक पैकेट में 5 किलो चूड़ा, 1.25 किलो चना, एक किलो चीनी, एक टॉर्च, एक किलो मसूर दाल, आधा किलो नमक आदि था।

इस मदद को लेकर मोहम्मद कमरुज्जमा ने कहा कि इस तरह की प्रेरणा वाली बात हमेशा हमें बचपन से ही मां के द्वारा सिखाई जाती थी। जिसे आज हमने पूरा किया। जिससे हमारा पूरा परिवार गौरवांवित महसूस कर रहा है। बचपन में भी हमारी मां स्वर्गीय बीबी रुबेदा गरीब होने के बाद भी दूसरों की मदद करती थी।पटना। किसी भी धर्म के लोग अपने पर्व, त्योहार को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। सबसे खास मुसलमानों की ईद और बकरीद देखी जाती है जहां बकरीद में बकरे की कुर्बानी देना इनकी पुरानी परंपरा है। हर मुसलमान बकरीद के अवसर पर अपनी हैसियत के मुताबिक बकरा खरीदता है और उसकी कुर्बानी देता है। लेकिन बिहार के भागलपुर जिले में एक मुस्लिम परिवार ने इस बकरीद के अवसर पर बकरे की कुर्बानी देने के बजाय उस पैसे से बाढ़ पीड़ित लोगों की मदद करने का फैसला लिया और बकरे खरीदने के लिए रखे गए 60 हजार रुपए को बाढ़ पीड़ितों के बीच बांट दिया। उसके इस काम में पूरे परिवार वालों ने साथ दिया और 60 हजार की राहत सामग्री खरीदकर, उसे पैककर बच्चे बाढ़ पीड़ितों के बीच उसे बांटते दिखे।
जानकारी के मुताबिक ये काम बिहार के भागलपुर जिले के गोराडीह के रहने वाले 65 वर्षीय किसान मोहम्मद कमरुज्जमा करते हुए एक मिसाल कायम की। बकरे की कुर्बानी छोड़ बाढ़ पीड़ितों की मदद करने के बारे में जब उनसे बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से बिहार में खासकर कोसी क्षेत्र में आई बाढ़ की तबाही देख हम विचलित हो रहे थे। जिस तरह गरीब भूख के कारण छटपटा रहे थे वो हमसे देखा नहीं गया और हमने इस साल बकरे की कुर्बानी नहीं देने और इस पैसे से बाढ़ पीड़ितों की मदद का संकल्प लिया। मोहम्मद कमरुज्जमा ने कहा कि हमारी पत्नी इस बात को सुनकर साथ देने को तैयार हो गई और बकरे खरीदने के लिए रखे गए 60 हजार रुपए से खाने की राहत सामग्री लाई गई। जिसे बच्चों के हाथों बंटवाकर उन्हें बड़ा सुकून मिला।
परिवार के मुताबिक - हमारे समाज के लोग पिछले 2 दिनों से बकरे खरीदने में लगे हुए थे तभी हमारे मन में ये ख्याल आया कि इस साल बकरे की कुर्बानी देने से अच्छा है इंसानियत को बचाना। फिर हमने संकल्प लिया और इस बार बकरीद पर बकरे की कुर्बानी ना देते हुए गरीब बाढ़ पीड़ितों की मदद की। हालांकि बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण हम बाढ़ पीड़ितों के बीच नहीं जा सके। लेकिन हमारे इंजीनियर बेटे ने उन लोगों के बीच जाकर ये राहत सामग्री दी। जिसमें प्रत्येक पैकेट में 5 किलो चूड़ा, 1.25 किलो चना, एक किलो चीनी, एक टॉर्च, एक किलो मसूर दाल, आधा किलो नमक आदि था।
इस मदद को लेकर मोहम्मद कमरुज्जमा ने कहा कि इस तरह की प्रेरणा वाली बात हमेशा हमें बचपन से ही मां के द्वारा सिखाई जाती थी। जिसे आज हमने पूरा किया। जिससे हमारा पूरा परिवार गौरवांवित महसूस कर रहा है। बचपन में भी हमारी मां स्वर्गीय बीबी रुबेदा गरीब होने के बाद भी दूसरों की मदद करती थी।












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