‘अनोखा मंदिर’, नवरात्रि के 9 दिनों तक महिलाओं का मंदिर में प्रवेश रहता है वर्जित, ये है मान्यता
पुजारी पुरेनद्र उपाध्याय ने बताया कि पहले से यह इलाका तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है। तांत्रिक लोग यहां आकर सीधी हासिल करते थे। नवरात्र में के दिनों उसी समय से यहां तांत्रिक पूजा यानी तंत्रियाण होती है।
नालंदा, 25 सितंबर 2022। पूरे देश में नवरात्रि की धूम है, लोग नवरात्रि की तैयारी कर रहे हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों से नवरात्रि की दिलचस्प खबरें देखने को मिल रही है। इसी कड़ी में हम आपको बिहार के नालंदा जिले के एक अनोखे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहा नवरात्रि के 9 दिनों तक महिला का मंदिर में दाखिल होना वर्जित रहता है। घोसरावां गांव (गिरियक प्रखंड) के एक अनोखे मंदिर में नवरात्रि के 9 दिनों मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के दाखिल होने पर पाबंदि रहती है। मंदिर के पुजारियों और ग्रामीणों की तरफ़ से पूरी तरह से मंदिर के गर्भगृह में दाखिल होना प्रतिबंधित रहता है।
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बौद्ध काल में 1800 बौद्ध भिक्षु ने मांगी थी मन्नत
बिहार शरीफ मुख्यालय से महज 15 किमी की दूरी पर मौजूद इस मंदिर में यह प्रथा आदि काल से ही चली आ रही है। पौराणिक प्रथा के मुताबिक इस मंदिर का नाम आशापुरी रखा गया। गांव के बुज़ुर्गों की मानें तो बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध काल में 1800 यहां मन्नत मांगी थी और उनकी मन्नतें पूरी भी हुई थी। पुजारी पुरेन्द्र उपाध्याय ने मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नवरात्र के दिनों में महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित रहता है। प्रतिपदा से लेकर दस दिनों तक विजयादशमी के आरती के पहले तक मंदिर में महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकती हैं।

तंत्रियाण पूजा में महिलाओं का प्रवेश वर्जित- पुजारी
पुजारी पुरेनद्र उपाध्याय ने बताया कि पहले से यह इलाका तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है। तांत्रिक लोग यहां आकर सीधी हासिल करते थे। नवरात्र में के दिनों उसी समय से यहां तांत्रिक पूजा यानी तंत्रियाण होती है। तंत्रियाण पूजा में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित माना गया है। प्रथा आज की नहीं है, काफी पहले से चली आ रही है। मंदिर निर्माण की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वजों की मानें तो राजा घोष ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसलिए गांव का भी नाम घोसरावां रखा गया।ग्रामीणों की मानें तो आशापुरी मां इस इलाके में खुद प्रकट हुईं थी, जिस जगह पर वह प्रकट हुई थी, उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की खास आस्था
बिहार के किशनगंज ज़िले में मौजूद बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की बहुत ही खास आस्था है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई इंसान अपनी मुराद लेकर इस मंदिर में आता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर में मां काली की शरण में जाने के बाद हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। स्थानीय लोगों की मानें तो इस मंदिर में मुराद लेकर आया हुआ व्यक्ति कभी निराश नहीं हुआ है। यहां कई अनंत शक्ति का वास है। सच्चे मन से बूढ़ी काली मंदिर में पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं मां काली पूरा करती हैं।

मूर्ति दान के लिए कई साल करने पड़ता है इंतज़ार
बूढ़ी काली मंदिर में भक्तों में काफी श्रद्धा और विश्वास है, यही वजह है कि इस मंदिर में मूर्ति दान देने के लिए भक्तों को कई साल का इंतजार करना पड़ता है। मंदिर व्यवस्था समिति की मानें तो मंदिर में अगले 21 साल तक मूर्ति दान की बुकिंग हो चुकी है। आज की तारीख में अगर कोई इंसान इस मंदिर में मूर्ति दान की ख्वाहिश रखता है तो उसे 21 वर्षों तक का लंबा इंतज़ार करना होगा। मंदिर के मौजूदा पुरोहित मलय मुखर्जी ने बताया कि उनके पूर्वज यहां पूजा करते थे, तब से लेकर आज तक पूजा करने की यह पंरपरा कायम है।

1902 में हुई थी बूढ़ी काली मंदिर की स्थापना
मलय मुखर्जी (वर्तमान पुजारी) ने बताया कि मनोकामना पूर्ण होने पर यहां बलि भी दी जाती है। मां काली की प्रतिमा के पास स्थापित बलि वेदी में बलि दी जाती है। मनोकामनाएं पूरी होने पर श्रद्धालुओं ( भक्त) बलि देते हैं। इस मंदिर की स्थापना की तारीख 1902 बताई जाती है, लेकिन बुजुर्गों का कहना है यह मंदिर उससे भी ज्यादा पुराना है।

नवाब असद रज़ा ने दी थी मंदिर के लिए ज़मीन
बुज़ुर्गों की मानें तो मुस्लिम नवाब असद रज़ा ने 250 साल पहले इस मंदिर की स्थापना के लिए जमीन दी थी। नवाब असद रज़ा के ज़मीन दान करने के पीछे भी कई बातें बताई जाती है। नवाब असद रज़ा के बारे में बताते हैं कि वह किसी भी मामले में तुरंत ही संज्ञान लेते हैं। उस समय में जब उनसे कहा गया था कि मंदिर के लिए ज़मीन चाहिए तो उन्होंने तुरंत ज़मीन दे दी थी। इलाके के लोग उन्हे काफी मान सम्मान भई देते थे।
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