हाजीपुर सीट का उत्तराधिकारी कौन? चाचा-भतीजे की दावेदारी, बीजेपी पर न पड़ जाए भारी

महाराष्ट्र के बाद बिहार में भी चाचा-भतीजे की सियासी लड़ाई के चलते घमासान की आशंका बढ़ गई है। यहां लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के नेता चिराग पासवान की एनडीए में वापसी की चर्चा है, लेकिन इसकी वजह से उनके चाचा पशुपति कुमार पारस (राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी) की असहजता बढ़ती दिख रही है।

पशुपति पारस अभी केंद्र में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हैं और वे चिराग के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के छोटे भाई हैं। लेकिन, चाचा-भतीजे के बीच बिहार की हाजीपुर लोकसभा सीट को लेकर तकरार बढ़ गई है। यह सीट परंपरागत तौर पर राम विलास पासवान की सीट थी, जिसका प्रतिनिधित्व 2019 से पशुपति पारस कर रहे हैं।

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भाई ने मुझे राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया- पशुपति पारस
पारस ने ईटी से कहा है, 'जब मेरे भाई रामविलास पासवान जीवित थे, उन्होंने चिराग पासवान से नहीं, मुझसे हाजीपुर......अपने चुनाव क्षेत्र से लड़ने को कहा था। उन्होंने मुझे अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। अब कैसे चिराग हाजीपुर सीट पर दावा कर सकते हैं?'

चिराग के केंद्र में मंत्री बनने की चर्चा
दरअसल, चिराग पासवान के एनडीए में वापसी और मोदी कैबिनेट में जगह दिए जाने की चर्चाओं को तबसे और बल मिला है, जब केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने पटना में उनसे मुलाकात की है। सोमवार को एलजेपी (राम विलास) के प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी ने बताया कि उन्हें एक कैबिनेट मंत्री पद का ऑफर मिला है और 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर सीटों के बंटवारे पर भी चर्चा हुई है।

चाचा-भतीजे का मतभेद दूर कराना चाहती है बीजेपी
तिवारी के मुताबिक उनकी पार्टी बिहार में हाजीपुर समेत 6 लोकसभा सीट और एक राज्यसभा सीट की मांग कर रही है। दरअसल, 2020 में राम विलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी बेटे और भाई की पार्टियों में बंट चुकी है। पशुपति के मुताबिक बीजेपी ने भी उनसे संपर्क किया है कि 2024 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए वे अपने भतीजे के साथ सारे मतभेदों को दूर करें।

हाजीपुर की दावेदारी पड़ सकती है भारी
लेकिन, लगता है कि हाजीपुर सीट की दावेदारी चाचा-भतीजे की सियासी दूरी को आसानी से कम नहीं होने देगी। पारस का कहना है कि 'चिराग की लोकप्रियता को मीडिया ने बहुत ज्यादा हाइप दिया है, जबकि जमीनी सच्चाई अलग है।' पारस के मुताबिक उनकी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी चिराग पासवान की ओर से उम्मीदवार देने के बावजूद एमएलसी की एक सीट जीती है।

लालू-तेजस्वी के खिलाफ नहीं बोलते चिराग-पशुपति
उन्होंने भतीजे पर राजद से साठगांठ का भी आरोप लगाया है। 'वे (चिराग) आरजेडी के साथ डील की कोशिश में थे। सभी ने देखा कि वह नीतीश कुमार पर तो हमला करते रहे हैं, लालू प्रसाद को अपना अभिभावक और तेजस्वी यादव को छेटा भाई बताते रहे हैं। जब पिछले साल राजद और जदयू साथ आ गए तो उन्होंने फिर से बीजेपी से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया।'

पशुपति को मंत्री बनाने में मानी जाती है नीतीश की भूमिका
जून, 2021 में एलजेपी के 6 में से पांच सांसद पशुपति कुमार पारस की अगुवाई में पार्टी से अलग हो गए थे और वह केंद्रीय मंत्री बने थे। इस तरह से चिराग पासवान अपनी पार्टी के अकेले सांसद रह गए थे। गौरतलब है कि रामविलास पासवान राज्यसभा सांसद थे और उनकी एलजेपी एनडीए की सहयोगी थी। केंद्रीय मंत्री रहते हुए ही उनका निधन हुआ था। ऐसा माना जाता है कि पारस को मंत्री बनवाने में नीतीश की बड़ी भूमिका थी। क्योंकि, 2020 के विधानसभा चुनावों में अपनी जेडीयू के बहुत ही खराब प्रदर्शन के लिए वह चिराग को सबक सिखाना चाहते थे।

नीतीश के मुखर विरोधी हैं चिराग पासवान
जदयू का आरोप रहा है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनावों में चिराग ने जानबूझकर जेडीयू की सीटों पर भाजपा के बागी उम्मीदावरों को उतारा था, जिससे उनकी पार्टी बहुत कम सीटों पर सिमट गई और बीजेपी के एहसान से ही वह फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ सके थे।

अब नीतीश भाजपा गठबंधन से अलग हो चुके हैं। इसलिए बीजेपी चिराग पर दांव खेलना चाहती है, जो कि उनके विरोध में मुखर रहे हैं। हालांकि, एनडीए से अलग रहकर भी उन्होंने कम से कम तीन विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार किया है, जिसमें से दो वह जीती भी है। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक, 'चिराग के एनडीए में लौटने से बिहार में गठबंधन की 4% पासवान वोट पर पकड़ मजबूत होगी। राज्य में दलितों में पासवान आक्रामक मतदाता माने जाते हैं, जिनका वोट एकजुट होकर पड़ता है। '

लेकिन, भाजपा के लिए चुनौती चाचा-भतीजे को एकसाथ लेकर चलने की है। क्योंकि, अगर दोनों का मतभेद दूर नहीं हुआ तो चिराग के चक्कर में पारस नाराज हो सकते हैं और जीतन राम मांझी के महागठबंधन से निकलने के बाद नीतीश को भी किसी प्रभावी दलित नेता की दरकार बढ़ गई है।

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