Dularchand Yadav: दुलारचंद यादव अपने पीछे कितनी संपत्ति छोड़ गए? पढ़ें अपराध, राजनीति और सत्ता की कहानी
Dularchand Yadav Biography: बिहार के मोकामा विधानसभा क्षेत्र में 30 अक्टूबर 2025 को जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार के दौरान आरजेडी नेता और बाहुबली छवि वाले दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई। कभी लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी रहे दुलारचंद यादव को गोली मारने और फिर गाड़ी चढ़ाकर कुचलने का आरोप जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह के समर्थकों पर लगा है।
इस घटना ने न केवल राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है बल्कि उस दौर की यादें भी ताजा कर दी हैं जब बिहार की राजनीति 'बाहुबल' के सहारे चलती थी। दुलारचंद यादव की कहानी बिहार की राजनीति के उस चेहरें को दिखाती है, जहां ताकत, जाति और सत्ता का संगम होता है।

Dularchand Yadav Net Worth: कितनी संपत्ति छोड़ गए पीछे? 2010 में थे 18 लाख के मालिक
दुलारचंद यादव की मौजूदा संपत्ति का कोई ताज़ा आधिकारिक ब्योरा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि वे कई सालों से चुनावी मैदान से दूर थे। लेकिन 2010 के विधानसभा चुनाव में दिए गए हलफनामे के अनुसार उनकी कुल संपत्ति करीब 18 लाख रुपये थी। उन पर किसी भी बैंक या संस्था का कर्ज नहीं था। यह जानकारी अब पुरानी हो चुकी है और राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक पहुंच और रियल एस्टेट में दखल को देखते हुए माना जा रहा है कि उनकी संपत्ति अब करोड़ों में पहुंच चुकी थी।
who is Dularchand Yadav: कौन थे दुलारचंद यादव? टाल क्षेत्र के 'रॉबिनहुड' से बाहुबली तक का सफर
मोकामा के तारतर गांव में जन्मे दुलारचंद यादव 80 और 90 के दशक में टाल क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में गिने जाते थे। पहलवानी के शौकीन और दबंग छवि वाले दुलारचंद यादव ने अपनी ताकत को राजनीति में बदलने की कला बखूबी सीखी। उनका नाम कई गंभीर मामलों में जुड़ा रहा- हत्या, रंगदारी, अपहरण और आर्म्स एक्ट के केसों से लेकर 1991 के कांग्रेस नेता सीताराम सिंह हत्याकांड तक।
लोग उन्हें 'बाहुबली' कहकर डरते भी थे और 'मसीहा' मानकर सम्मान भी देते थे। उनके समर्थकों का मानना था कि दुलारचंद कमजोर और गरीब वर्ग की आवाज़ उठाते थे, खासकर यादव समुदाय में उनकी गहरी पकड़ थी।
लालू के भरोसेमंद, नीतीश के करीब और फिर जनसुराज के साथ
दुलारचंद यादव की राजनीतिक यात्रा बिहार की बदलती सत्ता की तरह उतार-चढ़ाव भरी रही। उन्होंने 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के साथ राजनीति शुरू की और आरजेडी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने गए। मोकामा से उन्होंने लोकदल (बी) और फिर आरजेडी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके।
बाद में सत्ता की राजनीति को समझते हुए उन्होंने नीतीश कुमार के साथ भी रिश्ते मजबूत किए। 2019 में वे जेडीयू की कई रैलियों में देखे गए। वहीं 2022 के मोकामा उपचुनाव में उन्होंने अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी (आरजेडी प्रत्याशी) का समर्थन किया था। लेकिन 2025 में वे प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के साथ आ गए और यही राजनीतिक समीकरण उनकी जान पर भारी पड़ गया।
अनंत सिंह से दोस्ती टूटी, दुश्मनी बनी जानलेवा
एक समय अनंत सिंह और दुलारचंद यादव अच्छे संबंधों में थे। दोनों टाल क्षेत्र की राजनीति के दो प्रभावशाली चेहरे थे। लेकिन जनसुराज से नजदीकी और अनंत सिंह के खिलाफ सार्वजनिक बयान देने से रिश्ते बिगड़ गए। हत्या से कुछ दिन पहले ही दुलारचंद यादव ने सोशल मीडिया पर अनंत सिंह की आलोचना की थी, जिससे दोनों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया था।
हत्या के आरोप और दोनों पक्षों की FIR
मोकामा कांड के बाद पुलिस ने दुलारचंद यादव के पोते राजेश कुमार के बयान पर जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह, उनके दो भतीजों रणवीर और कर्मवीर समेत पांच लोगों पर हत्या का केस दर्ज किया है। आरोप है कि अनंत सिंह के काफिले ने पहले गोली चलाई और फिर अपनी थार गाड़ी से दुलारचंद को कुचल दिया।
दूसरी ओर, अनंत सिंह ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनके काफिले पर जनसुराज समर्थकों ने हमला किया था। उन्होंने इसे राजद नेता सूरजभान सिंह की "साजिश" बताया।
तेजस्वी यादव बोले- सत्ता संरक्षित गुंडों का राज
इस घटना पर तेजस्वी यादव ने कहा, मोकामा में सत्ता के संरक्षण में पलने वाले गुंडों ने एक सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या कर दी। प्रधानमंत्री को बिहार का गुंडाराज नहीं दिखता। वहीं जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा कि पार्टी की टीम मौके पर भेजी गई है और वे जल्द विस्तृत जानकारी साझा करेंगे।
प्रशासन और पुलिस का बयान
पटना डीएम त्यागराजन एसएम ने कहा कि दो प्रत्याशियों के समर्थकों में झड़प हुई थी, जिसमें दुलारचंद यादव की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। एसपी सिहाग ने बताया कि प्रथम दृष्टया गोली पैर में लगी थी, जिससे मौत संभव नहीं लगती। मेडिकल बोर्ड वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमॉर्टम करेगा ताकि असली कारण सामने आ सके।
दुलारचंद की विरासत-राजनीति, विवाद और ताकत की कहानी
दुलारचंद यादव का जीवन बिहार की राजनीति की उस जटिल परत को उजागर करता है, जहां बाहुबल और जनाधार का अनोखा गठजोड़ सत्ता की सीढ़ी बनता है। वे कभी लालू के सबसे भरोसेमंद लोगों में थे, फिर नीतीश के करीबी बने और आखिर में प्रशांत किशोर के जनसुराज तक पहुंचे। उनकी हत्या केवल एक राजनीतिक वारदात नहीं, बल्कि उस दौर की वापसी का संकेत है जहां वोट से पहले गोलियां चलती थीं और लोकतंत्र में डर का बोलबाला होता था।
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