Hajipur Lok Sabha Seat पर चिराग और पारस दोनों ठोक रहे दावा, लेकिन क्या है मतदाता का मूड
Lok Sabha Election, Hajipur Seat : बिहार में लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दावपेंच शुरू हो चुका है। इसी क्रम में देश की हॉटसीटों में शुमार हाजीपुर लोकसभा सीट पर एनडीए गठबंधन के सहयोगी नेता (चिराग पासवान और पशुपति पारस) दावा ठोक रहे हैं।
एक तरफ़ पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. रामविलास पासवान के भाई केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस सीट पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ स्व. रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान भी सीट पर अपने दावा जताने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

हाजीपुर लोकसभा सीट पर चाचा-भतीजा तो दावा ठोक रहे हैं, लेकिन मतदाता का क्या मूड है यह भी जानना ज़रूरी है। इसी क्रम में वन इंडिया हिंदी की टीम ग्राउंड पर जायज़ा लेने पहुंची। हाजीपुर संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं के मूड को खंगालने की कोशिश की।
हाजीपुर के मतदाताओं से यह जानने की कोशिश की गई कि हाजीपुर लोकसभा सीट पर किस पार्टी का सांसद देखना पसंद करेंगे। अगर चिराग पासवान और पशुपति पारस की बात करें तो किसका प्रतिनिधित्व स्वीकार करेंगे। चाचा-भतीजा में मतदाताओं का झुकाव चिराग पासवान की तरफ़ दिखा।
स्थानीय लोगों ने बताया कि आपातकाल से पहले कांग्रेस का परचम बुलंद था। 1977 में पहली बार हाजीपुर लोकसभा सीट एससी के लिए रिज़र्व की गई थी। कांग्रेस विरोधी लहर में युवा नेता रामविलास पासवान ने कांग्रेस के गढ़ में सेंधमारी करते हुए अपना विरासत क़ायम किया था।
रामविलास पासवान ने अपने पहले संसदीय चुनाव में सबसे ज्यादा 4 लाख 69 हज़ार सात मत हासिल कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाया था। अपने लोकसभा चुनाव के इतिहास में वह सिर्फ दो ही बार इस सीट से हारे थे। आज की तारीख में इस सीट पर स्व. रामविलास पासवान का ही नाम चलता है।
रामविलास पासवान ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भी जीत दर्ज की थी। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन के मुताबिक यह तय हुआ था कि रामविलास पासवान को राज्य सभा भेजा जाएगा। इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई पशुपति पारस पर भरोसा जताया और उन्होंने जीत दर्ज की।
रामविलास पासवान की मौत के बाद चाचा पशुपति कुमार पारस ने अपने भाई के प्रेम का सिला धोखे से दिया और पार्टी के सांसदों को अपने भरोसे में लेकर भाई की पार्टी तोड़ते हुए अपना दावा कर दिया। वह चाहते तो अपने भतीजे को पिता समान प्यार देते हुए आगे बढ़ाते, लेकिन उन्होंने दगा किया।
पशुपति पारस के दगा करने का ये सिला हुआ कि स्व. रामविलास पासवान की बनाई पार्टी दो गुटों में बंट गई उनके बेटे चिराग को अपने पिता की विरासत बचाने के लिए लोजपा रामविलास बनानी पड़ गई। पशुपति पारस चाहते तो यह नौबत नहीं आती इसलिए अगर इस बार चिराग और पारस में किसी एक को चुनना पड़े तो चिराग को चुनेंगे।
चिराग पासवान युवा है, जिस तरह से चाचा की राजनीति से बिखरी विरासत को उन्होंने बचाया है। इससे यह साबित हो गया है कि चिराग में बिहार का भला करने की क्षमता है। पशुपति पारस सिर्फ कुर्सी के भूके हैं, उन्होंने अगर पार्टी नहीं तोड़ी होती तो उनके साथ जाते लेकिन अब नहीं, उन्होंने दगा किया है।












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